पिछले सप्ताह बीएलए यानी बलूचिस्तान लिबरेशन फोर्स ने एक साथ करीब एक दर्जन जगहों पर हमले किए और दावा किया कि पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के 80 से ज्यादा जवानों को मार गिराया है. बहुतों को बंधक भी बना लिया. इधर पाक सरकार कह रही है कि उसने करीब डेढ़ सौ हमलावरों को मार गिराया है. दोनों के दावों से यह तो स्पष्ट है कि भीषण खून-खराबा हुआ है. मगर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में उतना हो-हल्ला नहीं मचा जितना मचना चाहिए था. क्या यह बलूचिस्तान की आवाज को दबाने का षड्यंत्र है? लेकिन पहले जानिए कि हालात क्यों बिगड़े हैं! यह तो सभी को मालूम है कि बलूचिस्तान को बड़ी चालाकी से पाकिस्तान ने हड़प लिया था और तभी से वहां स्वतंत्रता की आग धधक रही है. इस आग पर काबू पाने के लिए दमन के जितने रास्ते अपनाए जा सकते थे, वह सब पाकिस्तान ने अपना लिया है.
न जाने कितने छात्र वहां के विश्वविद्यालयों से गायब किए जा चुके हैं. न जाने कितने लोगों की हत्याएं हो चुकी हैं. विरोध के स्वर की यदि आशंका भी हो तो उसे मौत के घाट उतार दिया जाता है. इसके बावजूद विद्रोह की आग कभी कम नहीं हुई. यदि भौगोलिक दृष्टि से देखें तो पाकिस्तान के कुल क्षेत्रफल में लगभग 44 प्रतिशत हिस्सा बलूचिस्तान का है.
जबकि पाकिस्तान की आबादी का कुल जमा 5 प्रतिशत ही यहां रहता है. मगर यह इलाका प्राकृतिक संसाधनों से भरा पड़ा है और इसे खनिजों की दृष्टि से अमीर इलाका भी कहते हैं लेकिन यहां के लोग गरीबी रेखा से भी काफी नीचे जी रहे हैं. पाकिस्तान यहां संसाधनों का दोहन तो खूब करता है लेकिन बलूचों को कुछ नहीं देता.
अनुमान है कि यहां के रेको दिक इलाके में सोने और तांबे का इतना बड़ा खजाना है कि उसका उत्खनन हो जाए तो कई ट्रिलियन डॉलर की कमाई हो सकती है. इसके अलावा तेल, प्राकृतिक गैस, लोहा, जस्ता, क्रोमाइट, जिप्सम, कोयला, मार्बल और ग्रेनाइट जैसे बहुत सारे खनिजों का भंडार है. कुछ रिपोर्ट्स कह रही हैं कि बलूचिस्तान में रेयर अर्थ मिनरल्स भी मिल सकते हैं.
बस यही कारण है कि इस इलाके में चीन और अब अमेरिका की धमक भी सुनाई दे रही है. डोनाल्ड ट्रम्प ने तो कहा भी था कि अमेरिका खनिजों की खुदाई करेगा तो पाकिस्तान की किस्मत बदल जाएगी. रेको दिक में तांबा और सोने के भंडारों के उत्खनन में बलूचिस्तान को 20 प्रतिशत हिस्सा देने की बात कही गई थी लेकिन बलूचों का अनुभव है कि वह हिस्सा कभी नहीं मिलने वाला.
बलूच नेता कहते भी हैं कि उनके इलाके में जो बिजली बनती है, वह पाकिस्तान के दूसरे इलाकों में भेज दी जाती है. बलूचिस्तान के 56 प्रतिशत लोगों के पास बिजली है ही नहीं. आप जानकर हैरान रह जाएंगे कि पूरे पाकिस्तान में जितनी गैस का उपयोग होता है, उसका 17 प्रतिशत हिस्सा बलूचिस्तान से आता है, लेकिन बलूचिस्तान को 7 प्रतिशत भी नहीं मिल पाता है.
जब इस तरह का दोहरा व्यवहार अपनाया जा रहा हो और साथ में पाकिस्तानी फौज अपहरण, उत्पीड़न और हत्याएं करती हो तो विद्रोह का और सशक्त होते जाना लाजमी है. इधर हाल के वर्षों में बलूचों को यह महसूस हो रहा है उनके इलाके को लूटने में पहले तो केवल पाकिस्तान ही लगा हुआ था, अब इसमें चीन और अमेरिका भी भागीदार हो रहे हैं तो गुस्सा उनके खिलाफ भी है.
चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर का बलूचिस्तान में विरोध होता रहता है. चीन यहां ग्वादर पोर्ट पर भी है और खनन परियोजनाओं में भी है, अब बलूच लिबरेशन आर्मी के हमले के बाद चीन ने ग्वादर पोर्ट से सभी चीनी कर्मचारियों को हटा लिया है. हालात ऐसे हैं कि जमीनी रास्ते से चीन अपने लोगों को वापस नहीं ला सकता था तो उसने विशेष विमानों का उपयोग किया.
उसे डर था कि जमीन से उसके कर्मचारी लौटेंगे तो बीएलए का हमला हो सकता है. बीएलए का इतना खौफ है कि जब ग्वादर में बने एयरपोर्ट का उद्घाटन होना था तो न पाकिस्तानी नेता गए और न ही चीनी अधिकारी पहुंचे. उद्घाटन ऑनलाइन हुआ. दरअसल पूरे बलूचिस्तान में चीन विरोधी भावना कट्टर स्वरूप ले चुकी है.
इधर अमेरिका भी चाहता है कि इस इलाके में चीन का हस्तक्षेप ज्यादा न बढ़े. इसलिए पाकिस्तान को उसने चीन की गोद से उठा कर अपनी गोद में बिठाने की कोशिश की है. वैसे पाकिस्तान फितरती है और वह दोनों की गोद को भ्रम में रख रहा है कि वह उनकी ही गोद में है. ट्रम्प ने अपनी रणनीति के तहत पाकिस्तान को बहला लिया है.
आपको याद होगा कि सितंबर 2025 में ही अमेरिकी कंपनी यूएस स्ट्रैटेजिक मेटल्स ने पाकिस्तान के साथ एक खास समझौता किया कि बलूचिस्तान में महत्वपूर्ण खनिजों के उत्खनन के लिए अमेरिका 500 मिलियन डॉलर निवेश करेगा. अगले ही महीने यानी अक्तूबर में खनिजों की पहली खेप अमेरिका पहुंच चुकी थी.
अब एक महीने में समझौता और उत्खनन कैसे संभव हुआ? इसका मतलब है कि समझौते के पहले ही अमेरिका काम शुरू कर चुका था! अमेरिका के लिए बलूचिस्तान का महत्व इस बात से भी है कि यह अफगानिस्तान से जुड़ा हुआ है और बलूच मानते हैं कि उनका एक हिस्सा ईरान ने दबा रखा है.
अमेरिका की सोच बड़ी लंबी होती है. वह शतरंज के माहिर खिलाड़ी की तरह दर्जनों चालें एक साथ सोचता है. तो क्या अमेरिका इस इलाके में किसी नई चाल पर अमल कर रहा है? जो भी हो लेकिन अमेरिका हो या चीन, दोनों को यह समझ लेना चाहिए कि बलूचों का इतिहास आत्मसम्मान का रहा है.
वे किसी के आगे झुकने वाले नहीं हैं. वे बहुत ताकतवर हैं. आज नहीं तो कल, बलूचिस्तान अपना हक लेकर रहेगा! जब तक उन्हें उनका हक नहीं मिल जाता तब तक बलूचिस्तान में स्वतंत्रता की आग धधकती रहेगी.