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अवधेश कुमार का ब्लॉग: मसूद मामले में अमेरिका का असाधारण कदम

By अवधेश कुमार | Updated: March 30, 2019 06:43 IST

अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जो नया मसौदा प्रस्ताव भेजा है उसमें पाकिस्तान स्थित जैश-ए-मोहम्मद के सरगना अजहर मसूद को प्रतिबंधित करने की बात की गई है

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मसूद अजहर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने के लिए अमेरिका का नया कदम यह बताता है कि भारत की कूटनीति कितनी सघन है. वास्तव में यह असाधारण कदम है. इसके पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि अमेरिका किसी दूसरे देश में हमला कराने वाले आतंकवादी को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कराने के लिए इस तरह आक्रामक हुआ हो.

अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जो नया मसौदा प्रस्ताव भेजा है उसमें पाकिस्तान स्थित जैश-ए-मोहम्मद के सरगना अजहर मसूद को प्रतिबंधित करने की बात की गई है. मसौदा प्रस्ताव में पुलवामा आत्मघाती हमले की निंदा की गई है और कहा गया है कि अजहर को संयुक्त राष्ट्र के अल-कायदा एवं इस्लामिक स्टेट प्रतिबंधों की काली सूची में रखा जाएगा.

जैसा हम जानते हैं इसके पहले जितने भी प्रस्ताव आए वो पारित नहीं हुए. इससे यह प्रश्न उठता है कि आखिर नए प्रस्ताव में ऐसा क्या है जिसे पहले के प्रस्तावों से अलग माना जाए?

वास्तव में पहले और अब के प्रस्ताव में अंतर है. अभी तक संयुक्त राष्ट्र की ओर से अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने के लिए गठित समिति यानी 1267 अल कायदा प्रतिबंध के तहत सुरक्षा परिषद में अजहर के खिलाफ प्रस्ताव लाया जाता था. सुरक्षा परिषद के सदस्य देशों को प्रस्ताव लाने के 10 दिनों के भीतर इस पर अपनी सहमति दर्ज करानी होती है या विरोध करना होता है.

चीन का अड़ंगा 

इस समिति के तहत कोई एक सदस्य विरोध में मतदान कर दे तो वह रद्द हो जाता है. पिछले 13 मार्च को प्रस्ताव के पक्ष में 15 में से 14 सदस्य थे लेकिन चीन ने इस पर रोक लगा दी. चार बार लाए गए इस प्रस्ताव पर चीन अड़ंगा लगा चुका है. केवल चीन के कारण ही वह प्रस्ताव आज तक पारित नहीं हुआ.

अमेरिका ने इस बार सीधे सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव रख दिया है. इसमें अनापत्ति अवधि का प्रावधान नहीं है. सदस्य देश इस पर चर्चा करेंगे और फिर मतदान की तिथि और समय निश्चित होगा. पहले ऐसा हो ही नहीं पाता था. अमेरिका के तेवर को देखते हुए लगता है कि उसने इस मामले पर चीन से टकराव मोल लेने का मन बना लिया है.

यह सीधे-सीेधे चीन को कहना है कि हम मसूद को हर हाल में आतंकवादी घोषित करने का मन बना चुके हैं, आप तय कर लीजिए कि क्या करना है. 

स्वाभाविक ही चीन को यह नागवार गुजर रहा है. चीन ने जिस तरह अमेरिका के इस कदम की आलोचना की है उससे उसकी मंशा समझी जा सकती है. उसने अमेरिका से अपनी ताकत का इस्तेमाल न करने का आग्रह तो किया ही है, यह भी कहा है कि यह मुद्दे को बातचीत से सुलझाने का तरीका नहीं है.

चीन ने कहा है कि मसूद अजहर को आतंकवादी घोषित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में  अमेरिका का मसौदा प्रस्ताव जबर्दस्ती पेश करने की श्रेणी में आता है. अमेरिका इस मुद्दे को जटिल नहीं बनाए. चीन का तर्क देखिए. वह यह भी कह रहा है कि अमेरिका ने प्रस्ताव पेश कर संयुक्त राष्ट्र आतंकवाद रोधी समिति के अधिकार को कमजोर किया है.

इसी तरह पाकिस्तान की प्रतिक्रिया स्वाभाविक ही पक्ष में नहीं हो सकती. उसने भी इससे प्रतिबंध व्यवस्था ही कमजोर होने की बात कह दी है.

 चीन और पाकिस्तान जिस तरह का रवैया अपना रहे हैं उसमें रास्ता क्या है? मुद्दे को जटिल बना कौन रहा है? चीन. इसमें बातचीत क्या हो सकती है? चीन को अपनी जिद और अपना दोष नजर ही नहीं आता. इसलिए वह अमेरिका की आलोचना पर उतर आया है.

अमेरिका का प्रस्ताव 

चीन भूल रहा है कि प्रस्ताव अमेरिका ने अवश्य लाया है लेकिन इसके समर्थन में सुरक्षा परिषद के लगभग सभी देश हैं. अगर उसको कोई संदेह है तो फिर प्रस्ताव पर बहस के दौरान सब कुछ साफ हो जाएगा. जैश-ए-मोहम्मद की भारत में आतंकवादी हमलों में भूमिका स्पष्ट होने के बावजूद यदि मसूद अजहर सुरक्षा परिषद में प्रतिबंधित नहीं होता है तो फिर अलकायदा समिति का कोई मतलब नहीं है.

अगर चीन अपना रवैया बदलने को तैयार ही नहीं है तो क्या इस भय से कि उसके साथ टकराव हो सकता है, आगे कदम बढ़ाया ही नहीं जाए? हालांकि इस प्रस्ताव को भी चीन वीटो कर सकता है लेकिन यह सीधे अमेरिका से टकराने जैसा होगा. 

भारत भी नहीं चाहता कि कोई टकराव हो. किंतु हमारे लिए सर्वाधिक वांछित आतंकवादी को वह आतंकवादी मानने को तैयार नहीं है तो अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत जितने भी रास्ते और विकल्प हमारे पास हैं उनको अपनाया जाएगा. अमेरिका का प्रस्ताव नियमों के अनुरूप है.

चीन भले इसे वीटो से रोक दे लेकिन उस पर सदस्य देशों की बात रखने से सब कुछ रिकॉर्ड में आ जाएगा जो उसे प्रतिबंधित करने का भविष्य में आधार बनेगा.

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