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Ram Navami 2026: आइए श्रीराम को जीवन में स्थापित करें!

By गिरीश्वर मिश्र | Updated: March 27, 2026 17:41 IST

Ram Navami 2026: जीवन में आने वाले संघर्षों के समाधान के लिए श्रीराम एक नीतिज्ञ के रूप में अपनी दैहिक, दैविक और भौतिक सभी तरह की शक्तियों को संयोजित करते हैं.

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ठळक मुद्देRam Navami 2026: परंपरा का स्पष्ट संदेश है कि पृथ्वी पर श्रीराम का आविर्भाव और अवतरण मात्र लोक कल्याण के हित हुआ था.Ram Navami 2026: श्रीराम का पूरा जीवन ही विभिन्न भूमिकाओं के आपसी द्वंद्वों और उससे जुड़ी तरह-तरह की चिंताओं से भरा हुआ जीवन है.Ram Navami 2026: रामायण के कई पात्रों में उनके प्रति ईर्ष्या, द्वेष, संदेह और घृणा के भाव भी उपजते रहे.

Ram Navami 2026: शाश्वत मूल्य बोध के विग्रह स्वरूप श्रीराम भारतीय संस्कृति के एक ऐसे लोक-विश्रुत मानवीय उत्कर्ष हैं जो पढ़े-लिखे और अनपढ़ समाज के हर वर्ग के लिए युगों-युगों से प्रेरणा के स्रोत बने हुए हैं . साहित्य जगत ने राम-कथा में कल्पना और रस का अजस्र स्रोत ढूंढ़ा है और पिछली पीढ़ियों के कवियों व लेखकों ने अपने सृजन का आधार बनाया. साहित्य की यह परंपरा आज भी अप्रतिहत रूप से चल रही है. इस परंपरा का स्पष्ट संदेश है कि पृथ्वी पर श्रीराम का आविर्भाव और अवतरण मात्र लोक कल्याण के हित हुआ था.

उनको अयोध्या के राजा के पुत्र दशरथनंदन के व्याज से मानुष भाव में प्रतिष्ठित करते हुए भारतीय मनीषा मनुष्यता की चुनौतियों, उसके द्वंद्वों, संघर्षों और उपलब्धियों से परिचित कराती है. यह विचारणीय है कि श्रीराम का पूरा जीवन ही विभिन्न भूमिकाओं के आपसी द्वंद्वों और उससे जुड़ी तरह-तरह की चिंताओं से भरा हुआ जीवन है.

पुत्र, शिष्य, पति, भाई, युवा, मित्र, योद्धा और राजा आदि विभिन्न रूपों में श्रीराम लगातार एक से बढ़ कर एक चुनौती का सामना करते हैं. उन्हें लगातार पीड़ा सहनी पड़ती है और दुख उठाने पड़ते हैं. एक प्रतापी राजा के युवराज होने पर भी उनके धैर्य की परीक्षा कदम-कदम पर जीवन भर निरंतर ली जाती रही. रामायण के कई पात्रों में उनके प्रति ईर्ष्या, द्वेष, संदेह और घृणा के भाव भी उपजते रहे.

राक्षसराज लंकापति रावण के रूप में उनके सम्मुख चरम जटिलता वाली चुनौती उपस्थित होती है . ज्ञानी और समृद्ध राजा होकर भी धर्म का विरोध करने की दुर्बुद्धि रावण को श्रीराम का शत्रु बना देती है. जीवन में आने वाले संघर्षों के समाधान के लिए श्रीराम एक नीतिज्ञ के रूप में अपनी दैहिक, दैविक और भौतिक सभी तरह की शक्तियों को संयोजित करते हैं.

वे नर हों या वानर सबका सहयोग लेते हैं और धर्म की रक्षा करने का जतन करते हैं. वे स्वयं मर्यादा का निर्वाह करते हैं और उसके उल्लंघन को दंडित करना उनकी नीति है. उनकी धर्म-व्यवस्था बड़े मूल्यों के सापेक्ष है और परिस्थिति की विशेषताओं को ध्यान में रखती है. शायद श्रीराम के धर्म की गत्यात्मकता ही उनकी लोकप्रियता का मुख्य कारण है.

तभी भारत और एशिया के कंबोडिया और इंडोनेशिया जैसे कई देशों में श्रीराम लोकप्रिय हुए. वे जन-स्मृति का हिस्सा बनते गए और उनकी कथा सबके मानस में गहरे उतरती गई. आज के परिवेश में श्रीराम का स्मरण हमें अपने स्वभाव और कर्म पर विचार करने को उद्यत करता है. आज विश्व में युद्ध, आतंक और हिंसा की तीव्र और ऊंची लहरें सतत उठ रही हैं.

यह एक निराशाजनक स्थिति है जब संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन निष्प्रभावी या बे-असर होते जा रहे हैं. कुल मिला कर यह परिदृश्य मनुष्यता को अपने विचार और कर्म पर विचार करने को बाध्य कर रहा है. श्रीराम का धर्म-भाव आदर्श, मर्यादा, धैर्य, सहनशीलता, त्याग, समानता, प्रेम, विनम्रता और क्षमा के आचरण में प्रकट होता है. इस राम भाव को आत्मसात करने में ही मनुष्यता का भविष्य छिपा है. आइए हम इसका माध्यम बनें.

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