congress is suffering from uncle syndrome special eye on bihar | ‘अंकल सिंड्रोम’ से कांग्रेस को हो रही परेशानी!

हरीश गुप्ता
राहुल गांधी पार्टी के ‘अंकलों’ को लेकर बहुत ज्यादा अशांत हैं, जो पार्टी लाइन से बाहर जाकर बोलते रहते हैं और मोदी-शाह ब्रिगेड को पार्टी के सारे किए-धरे पर पानी फेरने का मौका दे देते हैं. बहुत मुश्किल से उन्होंने ‘अंकल’ मणिशंकर अय्यर से छुटकारा पाया था, जिन्होंने मोदी के खिलाफ ‘चायवाला’ की टिप्पणी करके 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के अभियान को अकेले ही भारी नुकसान पहुंचाया था. राहुल गांधी ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से बार-बार अनुरोध किया है कि वे सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर बोलते समय सावधानी बरतें और पार्टी लाइन पर ही चलें. जब वरिष्ठ कांग्रेस नेता सैफुद्दीन सोज ने जम्मू-कश्मीर से संबंधित टिप्पणी की तो राहुल गांधी बहुत क्षुब्ध हुए. टिप्पणी के समय ने राहुल को नाराज किया, क्योंकि भाजपा और पीडीपी के बीच टकराव चल रहा था और कांग्रेस अभी अपनी नीति तैयार करने की प्रक्रिया में ही थी. सोज बम ने कांग्रेस के उद्देश्य को भारी नुकसान पहुंचाया. लेकिन बदतर स्थिति तो मानो अभी आने को ही थी, जब राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद ने विभिन्न मुद्दों पर सोज का समर्थन करने का विकल्प चुना. राहुल गांधी को समझ में नहीं आया कि क्या करें, क्योंकि दादी इंदिरा गांधी के समय से ही गुलाम नबी आजाद उनके ‘अंकल’ रहे हैं. वे फोन उठाकर उनसे यह भी नहीं कह सके कि उन्होंने कुछ गलत किया है. समझा जाता है कि राहुल गांधी ने अपनी मां सोनिया गांधी को फोन कर उनसे बात करने के लिए कहा. पता चला है कि उन्होंने गुलाम नबी आजाद से बात की और उन्हें बताया कि इस मुद्दे को उठाने का यह सही समय नहीं है. बाद में आजाद ने सोज से शांत रहने तथा मीडिया से दूरी बनाए रखने को कहा. इसी पृष्ठभूमि में कश्मीर के मुद्दे पर बैठक पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के घर हुई थी और राहुल गांधी ने उसकी अध्यक्षता नहीं की.


जयराम रमेश की पहेली
राहुल गांधी को पार्टी में जयराम रमेश की पहेली का सामना भी करना पड़ रहा है. हालांकि वे विद्वान हैं और उच्चशिक्षित भारतीय अर्थशास्त्री हैं जिन्होंने 1957-77 के दौरान कार्नेगी मेलॉन विश्वविद्यालय में अध्ययन किया था. 1991 के आसपास वे पहली बार तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव के सलाहकार बने. उसके बाद से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और 2004 से राज्यसभा के सदस्य हैं तथा केंद्रीय मंत्री के पद पर भी रह चुके हैं. वे राहुल गांधी के करीब समङो जाते हैं और वर्ष 2004 से ही चुनावों के दौरान कांग्रेस के वॉर रूम का हिस्सा रहे हैं. चुनाव में सोनिया गांधी की जीत के साथ ही उनका ग्राफ ऊपर चढ़ता गया. वे वस्तुत: अपने आप में एक पूरी सेना हैं और अपने लैपटॉप, जो हमेशा उनके हाथ में रहता है, के जरिए नेता के लिए भाषण-दर-भाषण उगल सकते हैं. इसलिए, भारतीय उद्योगपतियों के गलत पक्ष में होने और सत्ता के गलियारों में यह कानाफूसी होने के बावजूद कि वे चीनी हाथों में खेल रहे हैं, रमेश ने अपनी राजनीतिक यात्र में कभी भी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. लेकिन उन्होंने हाल ही में राहुल गांधी की मर्जी के खिलाफ काम किया और अपनी उंगलियां जला बैठे. पता चला है कि उन्होंने सैफुद्दीन सोज की कश्मीर पर लिखी विवादास्पद पुस्तक के लोकार्पण समारोह में भाग न लेने के कांग्रेस के संकेत की अवहेलना की. गौरतलब है कि पी. चिदंबरम, जिन्हें आमंत्रण के हिसाब से मुख्य आकर्षण होना चाहिए था, आयोजन से दूर रहे. यहां तक कि डॉ. मनमोहन सिंह ने भी समारोह में जाने की प्रारंभिक मंजूरी देने के बाद अपने कदम वापस खींच लिए. लेकिन रमेश ने अपनी उपस्थिति दर्ज की और राहुल इससे खुश नहीं हैं. पता चला है कि रमेश अब प्रियंका गांधी के जरिए ‘सीपी’ (कांग्रेस प्रेसिडेंट) को शांत करने की कोशिश कर रहे हैं. 

प्रशांत किशोर का साथ
पहले एक बार बाहर का दरवाजा दिखा देने के बाद, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर से चुनाव विश्लेषक और रणनीतिकार प्रशांत किशोर के साथ बातचीत शुरू की है. पता चला है कि अलग-थलग पड़े नीतीश कुमार को मैदान कठिन लग रहा है क्योंकि भाजपा उन्हें बिहार में 2019 के लोकसभा चुनाव अभियान का नेतृत्व सौंपने के लिए तैयार नहीं है. हालांकि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ सीटों के बंटवारे पर वार्ता 12 जुलाई को होनी है, लेकिन नीतीश को इसका कोई अनुकूल परिणाम आने की उम्मीद नहीं है. निराश होकर उन्होंने लालू प्रसाद यादव का हालचाल पूछने के बहाने उन्हें फोन करते हुए राजद का रुख जानने की कोशिश की. लेकिन लालू के दोनों बेटों ने नीतीश के इस कदम पर कटु प्रतिक्रिया व्यक्त की और कहा कि उनके लिए दरवाजे स्थायी रूप से बंद हो चुके हैं. इसके चलते नीतीश ने प्रशांत किशोर के पास पुन: वापस लौटने का फैसला किया है. यह किशोर ही थे जिन्होंने 2015 में जद(यू)-राजद-कांग्रेस गठबंधन को बड़ी जीत दिलाने में प्रमुख भूमिका निभाई थी. बाद में, नीतीश कुमार ने किशोर को बाहर का रास्ता दिखा दिया. अब जद(यू) के दो नेता के.सी. त्यागी और पवन वर्मा ने कड़ी मेहनत की और किशोर को नीतीश के खेमे में लौटने के लिए राजी किया. हालांकि इसके परिणाम की भविष्यवाणी करना अभी जल्दबाजी होगा, लेकिन किशोर ने अतीत में जिसका भी साथ दिया है वह भाग्यशाली रहा है; चाहे वह 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी रहे हों या 2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार. 2014 की ऐतिहासिक जीत के तत्काल बाद ही मोदी कैम्प से किशोर चुपचाप बाहर निकल गए थे. 

कांग्रेस की पसंद नीतीश 
कांग्रेस बिहार की गतिविधियों पर बारीकी से नजर रख रही है और सावधानीपूर्वक ही कोई कदम उठाना चाहती है. यहां तक कि भाजपा-नीतीश के बीच जब अपने को श्रेष्ठ साबित करने की होड़ है और नीतीश कुमार पर लालू के बेटे कटु हमले कर रहे हैं, कांग्रेस शांति के साथ सब देख रही है. वरिष्ठ कांग्रेस नेता अशोक गहलोत ने कहा, कांग्रेस और राजद, जद(यू) के ‘स्वाभाविक सहयोगी’ हैं. उन्होंने यहां तक कहा कि नीतीश कुमार का 2017 में महागठबंधन से बाहर जाने का फैसला उनकी ‘सबसे बड़ी गलती’ थी. हालांकि उन्होंने और कुछ कहने से इंकार कर दिया, लेकिन एक हल्का संकेत दिया कि कांग्रेस फिर से नीतीश कुमार से हाथ मिलाने के खिलाफ नहीं है. आखिरकार, कांग्रेस जानती है कि बिहार में 40 लोकसभा सीटें दांव पर हैं और वह 2019 में 2015 को दोहराने के लिए उत्सुक है. कांग्रेस को पूरा विश्वास है कि वह राजद को मनाने में सफल होगी. गहलोत ने कहा कि नीतीश कुमार ने गठबंधन छोड़ दिया, उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था. यह उनकी सबसे बड़ी भूल थी. एक ऐसा व्यक्ति यह कैसे कर सकता है जिसने 2013 में मोदी को भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने पर मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ दी थी और अलग होकर महागठबंधन का गठन किया था. गहलोत ने कहा कि यह उनकी समझ के परे है.  जाहिर है कि बिहार में हर कोई रात-दिन एक कर रहा है.

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