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जिला परिषद चुनावः अब राजनीति से दूर विकास की बात होनी चाहिए

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: February 9, 2026 05:21 IST

मतों की चाहत में नेताओं ने किसी भी स्तर तक जाने में स्वयं को रोका नहीं है. जिसका प्रभाव लंबे समय तक जितना ग्रामीण स्तर पर रहेगा, उतना शहरी क्षेत्र में नहीं रहता है.

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ठळक मुद्देभविष्य में चुनावी सरगर्मी के ठंडा होने से दूसरे आवश्यक मुद्दों की ओर ध्यान आकर्षित किया जा सकेगा.लोकसभा-विधानसभा के प्रतिनिधियों के पास चुनाव आचार संहिता का बहाना रहा. संसद से पंचायत तक के कामों से बचने का कोई कारण नहीं मिल पाएगा.

सोमवार को जिला परिषद चुनाव के परिणाम आने के बाद राज्य के 12 जिलों में जिला और पंचायत समिति स्तर तक जनप्रतिनिधि मिल जाएंगे. बीते वर्ष 2024 से राज्य किसी न किसी चुनाव को देख रहा था. करीब पौने दो साल की अवधि में लोकसभा से लेकर पंचायत समिति तक के चुनाव हुए. अब आने वाले समय में कुछ वर्ष तक चुनाव नहीं होंगे. यद्यपि बीच-बीच में विधान परिषद और राज्यसभा चुनाव अवश्य होते रहेंगे, किंतु उनका सीधा असर नहीं देखा जाएगा. भविष्य में चुनावी सरगर्मी के ठंडा होने से दूसरे आवश्यक मुद्दों की ओर ध्यान आकर्षित किया जा सकेगा.

बीते अनेक सालों में स्थानीय निकायों ने प्रशासक राज का सामना किया है. वहीं दूसरी ओर लोकसभा-विधानसभा के प्रतिनिधियों के पास चुनाव आचार संहिता का बहाना रहा. आने वाले कुछ सालों तक संसद से पंचायत तक के कामों से बचने का कोई कारण नहीं मिल पाएगा. राज्य में बड़े पैमाने पर जहां एक ओर जनसमस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं, वहीं दूसरी ओर अवरोधों के चलते विकास को सीधी दिशा नहीं मिल रही है.

उन्नति-प्रगति के नाम पर जो दिख रहा, वह शहरी क्षेत्र में ही आता है. राज्य के तीन प्रमुख शहरों में मेट्रो की बात हो या बुलेट ट्रेन या फिर बनते महामार्ग हों, सभी का संबंध शहरों और उनसे जुड़े औद्योगिक क्षेत्रों से है. ग्रामीण भागों के रास्ते लगातार मुश्किल पैदा करते रहते हैं. बरसात के मौसम में आना-जाना तक थम जाता है.

ऐसे में कृषि उपज से लेकर शिक्षा-स्वास्थ्य तक की गतिविधियां ठप हो जाती हैं. चुनावों के बाद ग्रामीण भागों के प्रतिनिधियों से अपने क्षेत्र की समस्याओं को पुरजोर ढंग से उठाने और उनका समाधान करने की अपेक्षा रहेगी. केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक की योजनाएं और उनकी राशि के लोगों तक पहुंचने में हो रही दिक्कतों को दूर किया जा सकेगा.

सामाजिक सुधार से जुड़े कार्यों की दिशा में कदम उठाना संभव होगा. बीते दिनों की चुनावी राजनीति में धार्मिक और समाज स्तर पर वैमनस्य पैदा करने के अनेक प्रयास किए गए. मतों की चाहत में नेताओं ने किसी भी स्तर तक जाने में स्वयं को रोका नहीं है. जिसका प्रभाव लंबे समय तक जितना ग्रामीण स्तर पर रहेगा, उतना शहरी क्षेत्र में नहीं रहता है.

उसे मिलकर सद्भाव और सहयोग का वातावरण तैयार करने की आवश्यकता होगी. इसमें जनप्रतिनिधियों के साथ सामाजिक नेतृत्व की भूमिका महत्वपूर्ण होगी. फिलहाल सभी की जन अपेक्षाओं पर खरे उतरने की परीक्षा होगी. राजनीति से परे विकास और सुधार के मुद्दों पर समाधान ढूंढ़ने पर नजर बनी रहेगी.

राजनीतिक दलों के समक्ष चुनावों से दूर अपने प्रतिनिधियों के जमीनी धरातल पर काम की समीक्षा का अवसर रहेगा, जिससे वह भी भविष्य की रणनीति बना सकेंगे. चुनाव के बाद तंग वातावरण और स्वार्थ से आगे कुछ नया और सकारात्मक करने का अवसर रहेगा. निश्चित ही अपेक्षाओं के अंबार की चुनौती सभी के समक्ष होगी. जिसके बाद मिली सफलता का स्वाद अवश्य ही सभी के लिए मीठा होगा. 

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