झारखंड में बीते नौ दिनों में एक हाथी ने 22 लोगों की जान ले ली है. उत्तराखंड में साल 2025 के दौरान वन्यजीवों ने 45 लोगों की जान ली. उत्तरप्रदेश में मानव-वन्यजीव संघर्ष में 60 से अधिक लोगों ने अपनी जान गंवाई. राज्य के बहराइच, बिजनौर, लखीमपुर, पीलीभीत और सीतापुर में जंगली जानवरों का आतंक चरम पर है. पिछले साल के पहले छह माह में केरल के पहाड़ी इलाकों में जंगली जानवरों के हमलों में 25 लोगों की मौत हुई. यही हाल राजस्थान, ओडिशा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश आदि का भी है.
उत्तराखंड से केरल तक के आंकड़े साफ करते हैं कि देश के अनेक राज्यों में जंगली जानवरों का आतंक बढ़ा है. महाराष्ट्र के मुंबई, पुणे, नासिक, नागपुर जैसे बड़े शहरों के रिहाइशी इलाकों तक तेंदुए पहुंच जाते हैं. हालांकि बाद में उन्हें पकड़ कर जंगल में छोड़ दिया जाता है, किंतु उनके आतंक का लंबा खेल चलता है. राज्य के ग्रामीण भागों में भी अनेक लोग उनके शिकार हो रहे हैं. साफ है कि जंगल में कुछ हलचल है, जो मूलत: मानव निर्मित है. जंगल कटने से शाकाहारी जानवरों के भोजन की समस्या बढ़ रही है.
हाईवे बनने से उनके रास्तों में अवरोध पैदा हो रहे हैं. नहर, सुरंग, रेलवे लाइन के नाम पर धमाके हो रहे हैं, जिनसे जानवरों के मन में डर पैदा हो रहा है और वे आक्रामक हो रहे हैं. उन्हें हमले के लिए पहले मानव ही दिखेंगे. जानकारों का मानना है कि मानव द्वंद्व के आंकड़े आने वाले वर्षों में और बढ़ेंगे. दरअसल सिमटते जंगलों के बीच जानवरों का वहां रहना मुश्किल होता जा रहा है. उनके रास्ता बदलने से भटकने की बड़ी गुंजाइश बन रही है. विकास के नाम पर वन्य जीवों के सहअस्तित्व के प्रकृति के नियमों की खुलेआम अनदेखी की जा रही है. दावा यह किया जाता है कि पेड़ों को काटने के बाद उनको दूसरे स्थान पर कई गुना विस्तार दिया जाएगा. किंतु पेड़ों के साथ जीवन जीने वालों को तत्काल कोई हल नहीं मिलता है.
पेड़ों को पनपने में कई साल लगते हैं. निश्चित ही विकास भी मानव की आवश्यकता है. आधारभूत सुविधाओं में अभी भी देश विकसित देशों की तुलना में कई साल पीछे है. मगर देश की प्रकृति का अपना अलग महत्व है, जिसे विकास की बलि नहीं चढ़ाया जा सकता.
वन्य जीवों का बार-बार जंगलों से भागकर मनुष्यों की आबादी में आना सुरक्षा की दृष्टि से जितना चिंताजनक है, उतना ही वन्यजीवों की नजर से भी गंभीर है. प्राकृतिक संतुलन को केवल अपनी सुविधा के लिए तोड़ा न जाए. उसे बनाए रखना यदि अन्य जीवों के लिए आवश्यक है, तो मानव के लिए भी जरूरी है. प्रकृति सह-जीवन में ही कायम रह सकती है.
असंतुलन विनाश की घंटी है, जिसकी चेतावनी वन्यजीवों के हमले दे रहे हैं. उन्हें केवल रोका नहीं जाना चाहिए, बल्कि विकास के साथ जल-जमीन-जंगल का आपसी तालमेल बनाया जाना चाहिए.