Who are deprived of franchise, what about them? | जो मताधिकार से वंचित हैं, उनका क्या?
जो मताधिकार से वंचित हैं, उनका क्या?

(रमेश ठाकुर-लेखक)

पहले चरण का चुनाव संपन्न हो चुका है. वोटरों में सियासी जागरूकता आने के बाद वे अपने मत की कीमत समझने लगे हैं. लेकिन वे लोग एक बार फिर मुंह ताकते रह गए जिन्हें चुनावी अव्यवस्था ने वोट डालने के लिए अयोग्य ठहरा रखा है.

जनगणना 2011 के मुताबिक समूचे हिंदुस्तान की तकरीबन दस फीसदी जनसंख्या मताधिकार से वंचित बताई गई, जिसमें घुमंतू समाज से ताल्लुक रखने वाले लोग सबसे ज्यादा हैं. पूरे देश में करीब दस से पंद्रह करोड़ लोग आज भी टाट-पट्टी में रह कर अपना जीवन बिता रहे हैं. पूर्व सांसद हरिभाऊ  राठोड़ ने प्रधानमंत्री और चुनाव आयुक्त से मुलाकात कर वंचित मतदाताओं का मुद्दा उठाया था, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा.  

घुमंतुओं के वोटिंग में शामिल नहीं होने के पीछे भी एक कारण है. दरअसल उनका कोई स्थायी ठिकाना नहीं होता, आज यहां तो कल वहां. इनके जीवन सुधार के लिए कई मर्तबा केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा बोर्ड-आयोग बने, लेकिन सभी सफेद हाथी साबित हुए. आयोगों को बजट की फूटी कौड़ी तक नहीं दी गई. सवाल उठता है चुनावी समर में मतदान करने से वंचित ये लोग चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बनते? घुमंतू समुदाय से ताल्लुक रखने वाली तकरीबन 840 जातियां सदियों से हाशिए पर हैं, जिनमें गुआर, नट, बंजारे, भाट, कंजर, बावरिया, जागा, भोपा, मारवाड़ी, सांसी, जोगी, लुहार, गड़िया, औसरिया प्रमुख रूप से शामिल हैं. 

जनजातियों की स्थिति के अध्ययन के लिए फरवरी 2006 में बने आयोग के अध्यक्ष बालकिशन रेनके के अनुसार केंद्र सरकार के पास इन्हें राहत देने के लिए कोई कार्य योजना नहीं है, इसलिए इन्हें राज्यों के अधीन कर दिया गया है. पहली और तीसरी पंचवर्षीय योजना तक इनके लिए प्रावधान था लेकिन किसी कारणवश यह राशि खर्च नहीं हो सकी, तो इन्हें इस सूची से ही हटा लिया गया. काका कालेलकर आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि कुछ जातियां अनुसूचित जाति, जनजाति एवं पिछड़ी जातियों से भी पिछड़ी हैं. उनके लिए अलग से प्रावधान होना चाहिए. सरकारी-गैरसरकारी नौकरियों पर निगाह डाली जाए तो इनकी भागीदारी एक प्रतिशत भी नहीं है. सियासी दलों ने इनके लिए दिलचस्पी इसलिए भी नहीं दिखाई कि उनका वोट उन्हें नहीं मिलता. हर बार की तरह इस बार भी यह लोग चुनावी समर में खुद को बेगाना समझ रहे हैं


Web Title: Who are deprived of franchise, what about them?
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