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पश्चिम बंगाल विधानसभाः कांग्रेस के इस फैसले से आखिर किसे फायदा मिलेगा?

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: February 11, 2026 05:52 IST

West Bengal Assembly: ज्यादातर राज्यों में हाल के वर्षों में कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने के बजाय दूसरे दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ा ताकि भाजपा को सत्ता से दूर रखा जा सके.

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ठळक मुद्देअभी बिहार के चुनाव में कांग्रेस की दुर्दशा सामने आई.गठबंधन की राजनीति छोड़कर अपने बलबूते पर चुनाव लड़ना चाहिए. कोई भी पार्टी ऐसी नहीं है जो भाजपा को चुनौती दे सके.

West Bengal Assembly: पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव अकेले लड़ने का हिम्मत भरा फैसला आखिर कांग्रेस ने ले ही लिया! अब सबके जेहन में एक ही सवाल है कि इस फैसले का लाभ क्या कांग्रेस को मिलेगा या फिर इससे सबसे ज्यादा फायदा भारतीय जनता पार्टी को होगा? दोनों सवालों के जवाब अलग-अलग हैं. ज्यादातर राज्यों में हाल के वर्षों में कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने के बजाय दूसरे दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ा ताकि भाजपा को सत्ता से दूर रखा जा सके. मगर यह रणनीति कारगर नहीं रही. अभी बिहार के चुनाव में कांग्रेस की दुर्दशा सामने आई.

कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ता लगातार कहते रहे हैं कि कांग्रेस को गठबंधन की राजनीति छोड़कर अपने बलबूते पर चुनाव लड़ना चाहिए. इससे तात्कालिक लाभ भले ही न मिले लेकिन संगठन मजबूत होगा और भविष्य में कांग्रेस सत्ता की प्रबल दावेदार बन सकती है. राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के अलावा कोई भी पार्टी ऐसी नहीं है जो भाजपा को चुनौती दे सके.

मंगलवार को जब पश्चिम बंगाल की 294 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला लिया तो सवाल यह भी उठा कि क्या इससे भाजपा विरोधी वोट नहीं बंटेंगे? क्या इससे ममता बनर्जी और वामपंथी दलों को नुकसान नहीं होगा? निश्चय ही होगा लेकिन कांग्रेस तो खुद का सोचेगी! यदि हम इतिहास पर नजर डालें तो 2006 में कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में अकेले चुनाव लड़ा था और उसे 21 सीटें मिली थीं.

2011 में कांग्रेस ने ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के साथ गठबंधन किया और कांग्रेस को 42 सीटें मिली. वाम मोर्चे की 34 साल पुरानी सत्ता को खत्म करने में ममता के साथ कांग्रेस की भी अहम भूमिका थी. 2016 में कांग्रेस ने वाम दलों के साथ हाथ मिलाया. गठबंधन को मिली 77 सीटों में से 44 सीटें कांग्रेस को मिलीं लेकिन 2021 के विधानसभा चुनाव में गठबंधन को एक भी सीट नहीं मिली.

यही कारण है कि कांग्रेस ने इस बार अकेले लड़ने का निर्णय लिया है. अभी कहना मुश्किल है कि कांग्रेस को इसका कितना लाभ मिलेगा. मगर मौजूदा परिस्थितियों का विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट लग रहा है कि तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी दलों की नींव कांग्रेस जरूर कमजोर करेगी.

भाजपा विरोधी वोट बंटेंगे और इसका सीधा लाभ भाजपा को मिलेगा लेकिन मतदाताओं के मन का क्या ठिकाना कि वे कौन सा फैसला सुना दें. चुनाव के बाद ही पता चल पाएगा कि कांग्रेस का निर्णय किसके लिए लाभकारी और किसके लिए हानिकारक होगा !

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