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व्यालोक का ब्लॉग: जेएनयू का यह आंदोलन दरअसल बेकाबू छात्रों का 'बलवा' है

By व्यालोक | Updated: November 12, 2019 19:25 IST

दिल्ली स्थिति केंद्रीय विश्वविद्यालय जेएनयू के छात्र हॉस्टल फ़ीस में बढ़ोतरी और मेस ड्रेस मैनुअल में बदलाव इत्यादि मुद्दों को लेकर आंदोलनरत हैं।

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जेएनयू एक बार फिर से सुर्खियों में है। सारी ग़लत वजहों से। हमेशा की तरह। वामियों-कौमियों की साज़िश और षडयंत्र ने एक बार फिर इस महान शिक्षण-संस्थान का गला जकड़ दिया है। हमारे समय की एक दिक्कत यह भी है कि इस ‘ट्विटर-काल’ (या फिर, क्षणजीवी) खबरों के दौर में किसी के पास इतनी फुरसत नहीं है कि वह तथ्यों का पता लगा ले। फिर, मेहनत से तो वैसे भी आजकल सबको चिढ़ ही है, तो ‘त्वरित प्रतिक्रिया’ देने के फेर में अक्सर क्या होता है कि अर्थ का अनर्थ और ख़बरों का अचार बन जाता है, जो आपको परोस दिया जाता है।

आप सभी पिछले दो दिनों से जेएनयू के छात्र-छात्राओं की भीड़ को वाटर-कैनन के सहारे तितर-बितर करती पुलिस को देख रहे होंगे, दीक्षांत समारोह के दौरान छात्रों के प्रदर्शन की तस्वीरें और खबरें पा रहे होंगे और आपकी आंखों से सहानुभूति के आंसू और दिल में दर्द का समंदर उभर रहा होगा। पर रुकिए। क्या आप मुद्दे को जानते हैं? क्या सचमुच मुद्दा वह फीस-बढ़ोतरी ही है, जिसे लेकर जेएनयू के ये सरकश और बदतमीज़ बच्चे सड़कों पर उतरे हुए हैं।

यह लेखक 1997 से 2001 तक जेएनयू का छात्र था। यह कैंपस के गरीब छात्रों में था, क्योंकि इसके पिता तब बिहार में प्रोफेसर थे और लालू यादव का जंगलराज पूरे उरूज पर था। पिताश्री को छह-सात महीनों पर वेतन (वह भी कभी 60 तो कभी 70 फीसदी) मिलता था। मुझे 1000 रुपये महीने मिलते थे, जिसमें से मेरा मेस बिल 600 से 750 तक जाता था, मैं 300 रुपए में कैंपस का राजा था। अस्तु, यह बात आगे करेंगे, पहले समझिए, मुद्दा क्या है? क्या आपने जेएनयू के छात्रों का घोषणापत्र देखा है। 

आइए, एक नज़र इनके मसलों पर डालते हैं। मसला नंबर एक है- इनके स्वयंभू JNUSU को प्रशासन द्वारा स्वीकृति मिलना, रिकग्नाइज़ किया जाना। यदि आपकी स्मृति हिंदुओं की तरह क्षीण नहीं हुई हो, तो याद होगा कि पिछले चुनाव के समय जेएनयूएसयू का मामला कोर्ट में चला गया था और वह विचाराधीन है। न्यायालय ने मई 2020 की तारीख दी है, तो इस बीच में भला स्वयंभू जेएनयूएसयू को कहां से मान्यता दी जाए?

जेएनयू मेस में ड्रेस कोड का मुद्दा

जेएनयू की इस अनियंत्रित भीड़ ने मेस में ड्रेस-कोड को मुद्दा बनाया है, जो वाकई है ही नहीं। हमारे समय भी मैनुअल में यह लिखा होता था। फर्क सिर्फ ये है कि हमारे समय Appropriately dressed  लिखा होता था, अब  Properly dressed लिखा हुआ है। हालांकि, हू केयर्स। हॉस्टल के गेट्स लगाने का मसला भी नॉन-इशू है, क्योंकि जब लाइब्रेरी सारी रात खुली रहती है, तो हॉस्टल बंद करने का तुक क्या है? और हां, जो जेएनयू-हेटर्स लड़कियों के जाने-आने, कंडोम की गिनती करने और इस यूनिवर्सिटी को सेक्स और शराब का अड्डा बताने में लगे हैं, उनको बता दूं कि हमारे समय भी नियम तो खिलाफ ही थे, कोई नया नियम नहीं बना है। उस समय भी सब आंखें मूंदते थे और आप जब नरक मचाने पर आ जाते थे, तो फाइन भी हो जाता था, शिकायत भी होती थी।

(यह विषयांतर होगा, पर बता दूं कि हमारे समय एक महीने मेस-बिल जमा न करने पर रूम-लॉक भी होता था। आजकल, जेएनयू के अधिकांश छात्र एक ही बार में बिल भरते हैं, जब उनको रजिस्ट्रेशन लेना होता है, लेकिन प्रशासन उनका रूम ल़ॉक नहीं कर सकता, मेस बंद नहीं कर सकता, क्योंकि यह उनका प्रजातांत्रिक अधिकार है।)

सिक्योरिटी-मनी को 5500 से बढ़ाकर 12000 रुपए करने के पीछे यही वजह है, ताकि मेस को बंद करने की नौबत न आए। सप्लायर को भुगतान होता रहे।

फी-हाइक, यानी शुल्क में बढ़ोतरी तो उनका (स्वयंभू जेएनयूएसयूनीत छात्रों का) आखिरी एजेंडा है। वह भी कितनी बढ़ गयी है, भाई फी। अभी जो मेस-बिल 2300 से 2800 रुपए महीने आता है, उसमें 1700 रुपए बढ़ेगा। अभी बिजली के बिल पर आगे बात करेंगे, पहले ये बताइए कि महीने में तीन बार नॉन-वेज और एक दिन स्पेशल डिनर (जिसमें मुर्गे के दो आइटम, गोलगप्पे की ठेली, आइसक्रीम, तंदूर आदि सब कुछ शामिल है) के बाद ये पैसे कितने अधिक हैं? हमारे समय के लोग याद कर सकते हैं कि स्पेशल डिनर में हमें क्या मिलता था, यह तो हॉस्टल नाइट हो रही है, महीने में एक बार।

फ़ीस बढ़ोतरी के अलावा जेएनयू के छात्र हॉस्टल मैनुअल के ड्रेस कोड में बदलाव पर भी नाराज हैं।
जहां तक बिजली बिल (वह भी एक्चुअल) देने की बात है, तो एक विद्यार्थी कितनी बिजली जला लेगा- एक ट्यूब लाइट और पंखे का। हां, विद्यार्थी के नाम पर पल रहे लोग चूंकि फ्रिज रखते हैं, ब्लोअर और हीटर चलाते हैं तो उनको ही दिक्कत हो रही है। कूलर चलाने पर भी बिल अधिक नहीं आएगा, मित्रों। यह भी इसलिए कि यूजीसी ने जेएनयू की बिजली का बिल देना बंद कर दिया है...इन्हीं महाशयों की मेहरबानी से। 

तो, कुल जमा यदि उच्चतम स्तर पर देखा जाए तो आज भी जेएनयू के औसत छात्र या छात्रा का खर्च 5000 रुपए मासिक से अधिक नहीं है, फिर इतना बवाल क्यूं? बदले में जेएनयू और यूजीजी यहाँ के छात्रों को फ्रीशिप के अलावा क्या देता है, देखिए:-

- एमसीएम यानी मेरिट कम मीन्स- इसकी रकम 2000 रुपए मासिक है, जो आय प्रमाणपत्र जमा करने पर दी जाती है।  - नेट/जेआरएफ स्कॉलरशिप—इसकी रकम आज लगभग एक अच्छे भले एक्ज्क्यूटिव के बराबर है। - राजीव गांधी फेलोशिप—यह जेआरएफ के बराबर है, और एससी-एसटी छात्रों के लिए है। - मौलाना आज़ाद फेलोशिप—यह मुसलमानों के लिए है, इसमें भी जेआरएफ के बराबर रकम मिलती है। - इसके अलावा नॉन नेट स्कॉलरशिप है, जो जेएनयू अपने सभी एमफिल और पीएचडी छात्रों को देता है। इसमें पीएचडी में 8000 रुपए मासिक और एमफिल में 5000 रुपए मासिक मिलते हैं। (यानी, आप एडमिशन लीजिए और सरकार आपकी पढ़ाई का खर्च उठाएगी।)

'हिंसक होता छात्र-आंदोलन'

समस्या यह है कि स्वयंभू जेएनयूएसयू के नेतृत्व वाला छात्र-आंदोलन अब हिंसक हो चुका है। प्रदर्शनकारी छात्रों पर जिस तरह के आरोप लगे हैं उनकी एक झलक आप भी देखिए-

पहले इन्होंने डीन उमेश कदम का एंबुलेंस रोका, उनके छुट्टी पर जाने की स्थिति में जो वंदना मिश्र डीन का काम देख रही हैं, कल उनके साथ अभद्रता हुई, वह बेहोश तक हो गयीं और इन गिरोहबंद प्रदर्शनकारियों ने उनके कपड़े तक फाड़ने की कोशिश की। इसके अलावा, एक वार्डन की तीन वर्षीया बेटी को उनके घर के आगे प्रदर्शन करते हुए उठा लिया, एक वार्डन के घर के आगे इतना शोर और हंगामा किया कि उसकी छोटी बच्ची डर के मारे उल्टियां करने लगी, सो नहीं पायी, प्रोवोस्ट को धमकाया और पूरी यूनिवर्सिटी को इन्होंने बंधक बना रखा है। 

यह लेखक जेएनयू की ही खदान का उत्पाद है और यह आज जो कुछ भी है, उसका श्रेय अपने अल्मा-मेटर को ही देता है। यह न तो जेएनयूको शराब और सेक्स का अड्डा मानने को तैयार है, न ही उसे दूध में धुला हुआ स्वर्ग मानता है। किसी भी संस्थान की तरह इसकी भी तमाम अच्छाई-बुराई है किंतु उपर्युक्त सारे तथ्य हैं। यदि आपमें धैर्य और स्थैर्य है तो जाकर पता कर सकते हैं। 

टॅग्स :जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू)
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