वेदप्रताप वैदिक का ब्लॉग: अंग्रेज राज से भी ज्यादा खतरनाक है अंग्रेजी राज

By वेद प्रताप वैदिक | Published: November 23, 2021 03:07 PM2021-11-23T15:07:33+5:302021-11-23T15:07:33+5:30

असलियत यह है कि पिछले 74 साल से शिक्षा के क्षेत्र में कोई मौलिक परिवर्तन नहीं हुए. इंदिरा गांधी के जमाने में शिक्षामंत्री त्रिगुण सेन और भागवत झा आजाद ने कुछ सराहनीय कदम जरूर उठाए थे.

Ved Pratap Vaidik blog: English rule is more dangerous than British rule | वेदप्रताप वैदिक का ब्लॉग: अंग्रेज राज से भी ज्यादा खतरनाक है अंग्रेजी राज

वेदप्रताप वैदिक का ब्लॉग: अंग्रेज राज से भी ज्यादा खतरनाक है अंग्रेजी राज

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भाजपा सरकार ने मानव-संसाधन मंत्रालय नाम बदलकर उसे फिर से शिक्षा मंत्रालय बना दिया, यह तो अच्छा ही किया लेकिन नाम बदलना काफी नहीं है. असली सवाल यह है कि उसका काम बदला कि नहीं? शिक्षा मंत्रालय ने यदि सचमुच कुछ काम किया होता तो पिछले सात साल में उसके कुछ परिणाम भी दिखाई पड़ने लगते. 

शिक्षा मंत्रालय का काम बदला कि नहीं लेकिन सात साल में उसके चार मंत्री बदल गए. यानी कोई भी मंत्री औसत दो साल भी काम नहीं कर पाया. इस बीच कई आयोग और कई कमेटियां बनीं लेकिन शिक्षा की गाड़ी जहां खड़ी थी, वहीं खड़ी है. 

अब एक नई घोषणा यह हुई है कि प्राथमिक शिक्षा से उच्च-शिक्षा और शोध-कार्य तक भारतीय भाषाओं को प्रोत्साहित किया जाएगा. यह नई शिक्षा नीति (2020) के तहत किया जाएगा. लेकिन पिछले डेढ़-दो साल सरकार ने खाली क्यों निकाल दिए?

असलियत तो यह है कि पिछले 74 साल से शिक्षा के क्षेत्र में कोई मौलिक परिवर्तन नहीं हुए. इंदिरा गांधी के जमाने में शिक्षामंत्री त्रिगुण सेन और भागवत झा आजाद ने कुछ सराहनीय कदम जरूर उठाए थे, वरना शिक्षा की उपेक्षा सभी सरकारें करती रही हैं. लॉर्ड मैकाले की शिक्षा-पद्धति की नकल आज भी ज्यों की त्यों हो रही है. 

इसीलिए कई एशियाई देशों के मुकाबले भारत आज भी पीछे है. विदेशी भाषाओं और विदेशी चिंतन का लाभ उठाने में किसी को भी चूकना नहीं चाहिए लेकिन स्वभाषाओं को जो नौकरानी और विदेशी भाषा को महारानी बना देते हैं, वे चीन और जापान की तरह समृद्ध और शक्तिशाली नहीं बन सकते. 

भारत जैसे दर्जनों राष्ट्र, जो ब्रिटेन के गुलाम थे, आज भी क्यों लंगड़ा रहे हैं? इसीलिए कि आजादी के 74 साल बाद आज भी भारत में यदि किसी को ऊंची नौकरी चाहिए, उपाधि चाहिए, सम्मान चाहिए, पद चाहिए तो उसे अंग्रेजी की गुलामी करनी पड़ेगी. अंग्रेज तो चले गए लेकिन अंग्रेजी हम पर लाद गए. 

अंग्रेज के राज से भी ज्यादा खतरनाक है, अंग्रेजी का राज!  जब तक शिक्षा, चिकित्सा, कानून, सरकारी कामकाज और सामाजिक जीवन से सरकार अंग्रेजी की अनिवार्यता यानी शहंशाही नहीं हटाएगी, उसके भारतीय भाषाओं को बढ़ाने के सारे दावे हवा में उड़ते रहेंगे. आज तक दुनिया का कोई भी राष्ट्र विदेशी भाषा के जरिये महाशक्ति या महासंपन्न नहीं बन पाया है. 

इस रहस्य को सबसे पहले आर्यसमाज के प्रवर्तक महर्षि दयानंद ने उजागर किया, फिर महात्मा गांधी ने इसे जमकर दोहराया और फिर स्वतंत्र भारत में गुलामी के इस गढ़ को गिराने का तेजस्वी अभियान डॉ. राममनोहर लोहिया ने चलाया. लेकिन हमारे आजकल के नेताओं में इतना आत्मविश्वास ही नहीं है कि वे अंग्रेजी की अनिवार्यता के खिलाफ खुला अभियान चलाएं और स्वभाषाओं का मार्ग प्रशस्त करें.

Web Title: Ved Pratap Vaidik blog: English rule is more dangerous than British rule

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