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वरुण गांधी का ब्लॉगः क्यों नहीं दुनिया के शीर्ष विश्वविद्यालयों में जगह बना पा रही हैं भारत की यूनिवर्सिटियां?

By लोकमत समाचार हिंदी ब्यूरो | Updated: April 11, 2018 08:03 IST

दुनिया के शीर्ष सौ विश्वविद्यालयों में कोई भारतीय विश्वविद्यालय नहीं है (क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग, 2018) और 2016 में भारत में केवल 46904 पेटेंट दर्ज किए गए, जबकि इसी अवधि में चीन में दस लाख से ज्यादा पेटेंट दर्ज किए गए।

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भारत को अनुसंधान एवं विकास (आर एंड डी) पर खर्च के मामले में अच्छी स्थिति में होना चाहिए, क्योंकि हमारे यहां शोधकर्ताओं की संख्या कम नहीं हुई है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी में पीएचडी हासिल करने वालों की संख्या के मामले में हमारा देश दुनिया में तीसरे स्थान पर है और ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स में भी हमारी रैंकिंग में सुधार हुआ है तथा हम 66 से 60वें स्थान पर आ गए हैं। इसके बावजूद दुनिया के शीर्ष सौ विश्वविद्यालयों में कोई भारतीय विश्वविद्यालय नहीं है (क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग, 2018) और 2016 में भारत में केवल 46904 पेटेंट दर्ज किए गए, जबकि इसी अवधि में चीन में दस लाख से ज्यादा पेटेंट दर्ज किए गए।

2005 से 2015 के बीच एक दशक में अनुसंधान और विकास पर भारत का सकल व्यय तीन गुना बढ़ा है, जो 2016-17 में एक लाख करोड़ रुपये को पार कर गया है। 2015 में केंद्र ने कुल खर्च राशि में 45.1 प्रतिशत का योगदान किया, जबकि निजी उद्योगों ने 38.1 प्रतिशत का योगदान किया। पश्चिम की तुलना में अनुसंधान एवं विकास में उच्च शिक्षा संस्थानों का योगदान कम रहा। अनुसंधान एवं विकास में सरकार का खर्च अमेजन या अल्फाबेट जैसी कंपनियों के इस मद में खर्च के बराबर है, जबकि अनुसंधान एवं विकास पर खर्च करने वाली दुनिया की शीर्ष 2500 कंपनियों में भारत की केवल 26 कंपनियां हैं। 

हमारी अनुसंधान एवं विकास की गतिविधियां बाजार केंद्रित होने के बजाय अभी भी अलग-थलग हैं। जीडीपी के प्रतिशत के रूप में भारत का अनुसंधान एवं विकास खर्च अभी भी बहुत कम है, जो 2015 में 0.69 प्रतिशत था। यह आंकड़ा पिछले एक दशक से स्थिर रहा है। यहां तक कि ब्रिक्स के अन्य देशों के बीच, केवल दक्षिण अफ्रीका ही अनुसंधान एवं विकास खर्च के मामले में भारत से पीछे है। अनुसंधान एवं विकास खर्च से पेटेंट में वृद्धि नहीं हो पाने के लिए संस्थागत बाधाएं भी जिम्मेदार हैं। पेटेंट के लिए किए जाने वाले आवेदनों में से केवल 28 प्रतिशत ही पंजीकृत हो पाते हैं। इसके अलावा, भारत में पेटेंट हासिल करने के लिए लगने वाला समय दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे ज्यादा है तथा आवेदन करने से लेकर पेटेंट हासिल करने तक में करीब 6-7 साल लग जाते हैं। इसकी तुलना में, द. कोरिया और चीन में क्रमश: 16 और 22 माह का समय ही लगता है। खर्च के अलावा, उद्योगों में परिवर्तनकारी नवीनता की कमी एक ऐसी चीज है जिसके बारे में भारत को चिंतित होना चाहिए। 77 प्रतिशत से अधिक भारतीय पूंजीपति उद्यमियों का मानना है कि भारत में अभिनव व्यवसाय मॉडल या नई प्रौद्योगिकियां नहीं हैं। अनुसंधान एवं विकास, एक पेशेवर कार्य के रूप में, शीर्ष प्रतिभाओं को आकर्षित करने में विफल रहता है। प्रति दस लाख लोगों में हमारे यहां शोधकर्ताओं की संख्या 216 है, जबकि चीन में यह संख्या 1177, रूस में 3131 और अमेरिका में 4232 है। 2009 में वैश्विक शोध प्रकाशनों की संख्या 62955 थी, जो 2013 में बढ़कर 106065 हो गई। जबकि भारत का इसमें हिस्सा जो वर्ष 2000 में 2।2 प्रतिशत था, 2013 में सिर्फ 3।7 प्रतिशत तक ही पहुंच पाया। विकास और आर्थिक चुनौतियों के समाधान हासिल करने के लिए हमें एक नवप्रवर्तन (इनोवेशन) संस्कृति के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है।

भारत की शिक्षा नीति को पुनर्रचित किए जाने की जरूरत है, जिसमें रटने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करने वाली शिक्षा पर ध्यान देने की बजाय ज्ञान-संबंधी क्षमताओं के निर्माण पर ध्यान देना चाहिए। अटल इनोवेशन मिशन एक उत्साहजनक शुरुआत है, जो नवाचार को शुरुआत में ही प्रोत्साहित करने के लिए स्कूल स्तरीय वित्तीय अनुदानों को सुगम बनाने पर केंद्रित है। लेकिन हमें इससे आगे बढ़कर डाटा एनालिटिक्स बूम का लाभ उठाने पर ध्यान केंद्रित करने और संपूर्ण विश्वविद्यालयीन प्रणाली के लिए, उत्कृष्टता के हमारे मौजूदा द्वीपों से परे, शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार करने की जरूरत है। एक ऐसे देश में, जिसे सार्वजनिक बहसों के दौरान अक्सर हमारे ऐतिहासिक और पौराणिक अतीत में नवाचारों के लिए याद किया जाता है, अनुसंधान एवं विकास कार्यों पर विशेष रूप से ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

(लेखक, वरुण गांधी भारतीय जनता पार्टी के सांसद हैं)

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