Republic Day 2026: आजादी की लड़ाई के दौरान गणतंत्र का स्वप्न केवल राजनीतिक सत्ता-परिवर्तन तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि इसमें आर्थिक, सामाजिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय सभी दृष्टियों से देश में स्वराज की ओर अग्रसर होने की तीव्र आकांक्षा भी हिलोरें ले रही थी. सन् 1947 में स्वतंत्रता मिलने के बाद यह आकांक्षा 26 जनवरी 1950 को मूर्त आकार ले पाई जब देश ने संविधान को अपनाया था. राष्ट्र नायकों के मन में एक ऐसे गणतंत्र की छवि थी जो समाज में व्याप्त असमानताओं, गरीबी और अशिक्षा को दूर कर हाशिये पर स्थित उपेक्षितों को आगे ले चलने के साथ समग्र उन्नति का मार्ग प्रशस्त कर सके. इसकी पृष्ठभूमि में सर्वोदय की गूंज थी और संविधान उसका उपकरण समझा गया था.
महान जननायक महात्मा गांधी के सपनों के अनुरूप देश में समरसता, समावेशिता, समानता, बंधुत्व और समता ले आने के प्रति जागरूक प्रतिबद्धता संविधान का मुख्य स्वर बना था. इस उद्देश्य से व्यवस्था के खाके को लेकर संविधान सभा में देश के प्रतिनिधियों के बीच लंबा और गहन विचार-विमर्श हुआ था. अंत में लोकतंत्र में सबका विश्वास और भी दृढ़ हुआ.
फलत: अंग्रेजों के जाने के बाद स्वतंत्र देश ने शासन के लिए गणतंत्र की पद्धति को चुना. इसके तहत एक संघीय ढांचा सोचा गया और उसके संचालन के लिए एक अत्यन्त विस्तृत लिखित संविधान भी रचा गया और उसे विधिवत अपनाया गया. यह सब बड़े अनुशासन के साथ हुआ. निश्चय ही ये नेता दूरदर्शी थे और उन्होंने बहुत हद तक भविष्य की चुनौतियों का भी अनुमान लगाया था और उसे ध्यान में रखते हुए जरूरी प्रावधान भी किए थे. शासन की दृष्टि से संविधान की गरिमा स्थापित करते हुए कानूनी रूप से उसे निर्णायक दर्जा दिया गया.
आज भी सरकार चलाने वाले मंत्री और अधिकारीगण अपना दायित्व संभालने के पहले इस संविधान के लिए अपनी पूरी प्रतिबद्धता की शपथ लेते हैं. भारतीय संविधान ही सब तरह से सर्वोपरि स्वीकार किया गया. यह गौरव का विषय है कि तमाम विघ्न-बाधाओं के बीच आधुनिक गणतंत्र के रूप में देश 76 वर्षों की यात्रा पूरी कर आगे बढ़ रहा है.
भारत विश्व में सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश बन चुका है. आज पश्चिमी देशों (और चीन भी) के सामाजिक ढांचे में लोग जहां तेजी से बुढ़ा रहे हैं, भारत एक युवा देश है और आगे भी काफी समय तक युवा बना रहेगा. यह बड़ा अवसर हो सकता है बशर्ते युवा वर्ग को सुशिक्षित, सच्चरित्र और सुयोग्य बनाया जाए. इसके लिए शिक्षा में बड़े निवेश और पर्याप्त सुधार की जरूरत है.
इस अवधि में देश के भीतर और बाहर अनेक परिवर्तन आए हैं और कई मोर्चों पर चुनौतियां भी मिली हैं जिन्होंने इस क्षेत्र के इतिहास और भूगोल दोनों पर असर डाला है. इस बीच देश की राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति में भी बड़े परिवर्तन हुए . लोकतंत्र में जन भागीदारी बढ़ी है और लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा स्थापित हुई.
दूसरी ओर वैश्विक परिदृश्य में भी बड़े उतार-चढ़ाव आए . पड़ोसी देशों में बहुत समय से अस्थिरता बनी हुई है. आज विश्व के अनेक क्षेत्रों में अशांति है और कई जगह लंबे समय से युद्ध की स्थितियाँ बनी हुई हैं. पश्चिम के देश अपने दबदबे को बनाये रखने के लिए नए-नए हथकंडे अपना रहे हैं और उनके समीकरण बन बिगड़ रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका भी प्रश्नांकित हो रही है. प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ ही सत्ता और शक्ति के संतुलन जटिल, अस्थायी और बहु आयामी होते जा रहे हैं. साथ ही दूसरे देशों के साथ आपसी रिश्ता किसी देश के लिए पहले से ज़्यादा महत्वपूर्ण होता जा रहा है. अब किसी देश के लिए अलग-थलग रहना कठिन है.