Question on the intent to change the name | नाम बदलने की मंशा पर उठते सवाल
नाम बदलने की मंशा पर उठते सवाल

(जाने-माने स्तंभकार-विश्वनाथ सचदेव)

बहुत पुरानी कहावत है ‘नाम में क्या रखा है’। फिर शेक्सपीयर भी तो कह गए हैं कि गुलाब को कुछ भी नाम दे दो, रहेगा तो वह गुलाब ही। तो फिर ‘दलित’ को ‘परिगणित’  कहने से क्या फर्क पड़ जाएगा? 
हां, यह भी एक सवाल है जो अकारण ही हवा में उछाल दिखाया गया है। भारत के सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने एक विज्ञप्ति जारी करके निर्देश दिया है कि अब देश के ‘दबे-कुचले’ तबके को दलित नहीं कहा जाए, इस शब्द की जगह ‘परिगणित जाति’ शब्द काम में लिया जाए। निर्देश सरकारी विभागों के लिए तो है ही, मीडिया से भी यह अपेक्षा करता है कि इसका पालन हो। मंत्रालय ने इस आशय के निर्देश अदालत के सुझाव पर दिए हैं। देखा जाए तो अभी यह एक परामर्श है, आदेश नहीं और स्वयं दलितों समेत अन्य कई वर्ग भी इस परिवर्तन के औचित्य पर सवाल उठा रहे हैं। दलितों को ‘परिगणित जाति एवं जनजाति’ का हिस्सा बनाने के कुछ कानूनी कारण हो सकते हैं, लेकिन ‘दलित’ शब्द के प्रति यह व्यवहार कुछ शंकाएं और कुछ सवाल खड़े करता है। 

हमारे संविधान में धारा 341 में दलितों को परिगणित जातियों में ही शामिल किया गया है। यह भी सही है कि स्वयं डॉ। बाबासाहब आंबेडकर ने समाज के इस वर्ग के लिए ‘डीप्रेस्ड क्लास’ और ‘ब्रोकनमैन’ अर्थात् ‘दलित वर्ग’ और ‘टूटे हुए व्यक्ति’ शब्द काम में लिए थे। सदियों से हमारे समाज का एक बहुत बड़ा तबका दमन का शिकार होता रहा है। बाबासाहब आंबेडकर और महात्मा गांधी जैसी विभूतियों के प्रयासों ने स्थिति को बदलने की एक दिशा दी। स्वतंत्र भारत ने अपने संविधान में हर नागरिक को समानता का अधिकार देकर एक समता-मूलक समाज के निर्माण का मार्ग-प्रशस्त किया। आजादी के बाद हमने एक सपना देखा था उस भारत का जिसमें सब स्वतंत्र होंगे, सबको समान अधिकार और समान अवसर होंगे, सबको न्याय मिलेगा और सब बंधुता की एक डोर में बंधे होंगे।

ऐसे सपने आसानी से पूरे नहीं होते। लेकिन एक जिद जरूरी होती है किसी नए समाज को बनाने के ऐसे सपनों को पूरा करने के लिए। शर्त यह भी होती है कि ऐसी जिद पूरे समाज की जिद हो। सदियों से दबे-कुचले लोगों में तो इस आकांक्षा और उसे पूरा करने की जिद होना स्वाभाविक है, लेकिन उस वर्ग को जिसे हमेशा यह अहसास कराया जाता रहा हो कि वह शेष समाज से ऊंचे आसन का अधिकारी है, सामाजिक समता के इस यज्ञ में अपने स्वार्थों की आहुति देना आसान नहीं होता। पर असंभव नहीं है यह। इसीलिए स्वतंत्र भारत में इस दिशा में लगातार प्रयास जारी हैं। शहरी इलाकों में छुआछूत जैसी चीज अब

नहीं दिखती, लेकिन ग्रामीण अंचलों में अभी भी जाति-प्रथा के अभिशाप का साया मंडराते देखा जा सकता है। सदियों से शोषितों-पीड़ितों को समानता का अधिकार देने की दिशा में पहला संवैधानिक प्रयास 1935 के भारत सरकार कानून में परिगणित जाति शब्द को जोड़कर किया गया था। स्वतंत्र भारत ने अपने संविधान में परिगणित जातियों-जनजातियों को विशेष अधिकार देकर समता के प्रयासों को गति दी। संविधान के माध्यम से समूचे भारतीय समाज को समानता का अधिकार देकर हमारे संविधान-निर्माताओं ने एक जमीन तैयार की। स्वयं शोषित समाज भी अपने अधिकारों के प्रति सजग और सक्रि य हुआ। सजगता और सक्रियता की इस मुहिम में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन स्वयं इसी समाज के  जागरूक नागरिकों ने किया। दलित-चेतना का विकास इन जागरूक नागरिकों का लक्ष्य था। इन्होंने स्वयं को दलित कहना शुरू किया। पिछली सदी के सत्तर के दशक में दलित पैंथर नाम से एक आंदोलन शुरू हुआ। दलित समाज के रचनाकारों ने दलित-लेखन के माध्यम से अपने समाज में तो जागृति का शंख फूंका ही, शेष भारतीय समाज को भी दलितों की पीड़ा और भावनाओं का परिचय मिला। दलित शब्द परिवर्तन और क्र ांति के विचार का प्रतीक बन गया।     

 ‘दलित’ शब्द ने हमारे समाज के कथित निचले वर्ग को एक पहचान दी है। अपने अधिकारों के प्रति सचेत बनाया है। उन्हें पाने के लिए संघर्ष की प्रेरणा दी है। इसीलिए यह सवाल उठ रहा है कि ‘दलित’ शब्द को बदलने की आवश्यकता किसी को क्यों महसूस हो रही है? किसे कष्ट है इस ‘दलित’ शब्द से? जैसे सिर्फ नारों से बदलाव नहीं आता वैसे ही शब्दों को बदलने से स्थितियां नहीं बदलतीं। नाम में बहुत कुछ रखा है। यह सही है कि गुलाब की गंध तो वही रहेगी, चाहे नाम कुछ भी दे दो, पर वह नाम एक चित्र दिमाग में बनाता है-चित्र जो गंध की तरह ही तृप्ति देता है। इस तृप्ति से किसी को वंचित करने की आवश्यकता क्यों महसूस हो रही   है? सवाल सिर्फ दलितों के   वर्तमान  और भविष्य का नहीं है, सवाल  एक भारतीय भाव और पहचान का है।    


Web Title: Question on the intent to change the name
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