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पीयूष पांडे का ब्लॉग: किसान आंदोलन और द्विपक्षीय वार्ता

By पीयूष पाण्डेय | Updated: December 19, 2020 13:54 IST

पंचतंत्न की महान कहानी में जब दो बिल्लियां आपस में लड़ रही थीं, तब अचानक बंदर घुस आया था. द्विपक्षीय अब कुछ नहीं है. ना मुहब्बत, ना लड़ाई. फिर, द्विपक्षीय वार्ता का एक एंगल उसके बोरिंग होने से भी जुड़ा है. दो पक्ष मिलकर बात किए जा रहे हैं बस.

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राजधानी दिल्ली में इन दिनों जिधर देखो उधर ही जाम है. किसानों ने बॉर्डर सील कर दिए हैं, और लोग ‘कोलम्बस’ बने हुए हैं. सरकार चाहती है कि किसानों का कोई नेता हो, जिसके साथ द्विपक्षीय वार्ता कर मुद्दा सुलझाया जा सके. द्विपक्षीय वार्ता अच्छी सोच है लेकिन ऐसी वार्ता अब अमूमन संभव नहीं होती. किसान आंदोलन मामले में तो इतने पक्ष घुस चुके हैं कि मामला बहुत जटिल हो गया है. 

मैं स्वयं द्विपक्षीय वार्ता की थ्योरी के खिलाफ हूं. बात उन दिनों की है, जब ‘सौदागर’ फिल्म का ईलू-ईलू सुनकर हमें पहली बार मुहब्बत हुई थी. पहली मुहब्बत को परवान चढ़ाने की चाहत में हमने एक प्रेम पत्न लड़की तक पहुंचवाया.

पत्न में स्पष्ट लिखा था- ‘कृपया मामला द्विपक्षीय रखा जाए.’ लेकिन, लड़की ने नितांत द्विपक्षीय मामले को बहुपक्षीय बना दिया. लड़की के पिता, मामा से होते हुए मामला हमारे बापूजी तक पहुंचा और द्विपक्षीय प्रेम की तमाम संभावनाएं जूतों से पिटाई के बाद दम तोड़ गईं.

मूलत: ये समाज द्विपक्षीय वार्ता की समूची अवधारणा के खिलाफ है. दो पक्ष आपस में बात करें, उससे पहले ही कोई तीसरा पक्ष कान घुसाकर मुंह, फिर हाथ और फिर सशरीर मामले में घुस जाता है. मामला त्रिपक्षीय-चार पक्षीय होते-होते बहुपक्षीय हो जाता है. इस कदर कि फिर सभी पक्ष आपस में कंफ्यूज हो जाते हैं कि कौन किस पक्ष में है.

जहां दो पक्ष बेहद गोपनीय तरीके से द्विपक्षीय वार्ता करते हैं, वहां भी न जाने किस सैटेलाइट तस्वीर के जरिए तीसरा पक्ष घुस आता है. मसलन, आप यूनिवर्सिटी में नंबर बढ़वाने जाइए. एक पक्ष से आपकी सारी सेटिंग हो जाएगी. बाबू और आपके बीच द्विपक्षीय वार्ता चल रही होगी कि कितने नंबर के लिए कितने का रेट है कि अचानक ऊपर से फरमान आएगा कि ऐसा संभव नहीं है और ऐसा चाहते हैं तो एक पक्ष मामले में और सम्मिलित होगा.

पशु समाज भी ऐसा ही है. दो कुत्ताें की लड़ाई में कई कुत्ताें को बीच में घुसते आप रोज देख सकते हैं. पंचतंत्न की महान कहानी में जब दो बिल्लियां आपस में लड़ रही थीं, तब अचानक बंदर घुस आया था. द्विपक्षीय अब कुछ नहीं है. ना मुहब्बत, ना लड़ाई. फिर, द्विपक्षीय वार्ता का एक एंगल उसके बोरिंग होने से भी जुड़ा है. दो पक्ष मिलकर बात किए जा रहे हैं बस.

कोई हंगामा नहीं, जोर-आजमाइश नहीं. द्विपक्षीय वार्ता एक लिहाज से आर्ट फिल्म टाइप की हो जाती है और आजकल जमाना कमर्शियल फिल्मों का है. सरकार को भी समझना चाहिए कि अब बहुपक्षीय वार्ता का फैशन है, तो अपने मंत्रियों को इस वार्ता की ट्रेनिंग दिलाए.

टॅग्स :किसान आंदोलनदिल्ली
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