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एन. के. सिंह का ब्लॉग: न्याय की दुनिया में सर्वसम्मत फैसला बनेगा बड़ा मकाम

By एनके सिंह | Updated: November 10, 2019 06:23 IST

बहरहाल, देश की सबसे बड़ी अदालत का यह सर्वसम्मति से दिया गया फैसला इन न्यायमूर्तियों और न्याय की दुनिया में एक बड़ा उदाहरण बनेगा क्योंकि कुल 22 जटिल प्रश्नों पर सभी पांच जजों का एकमत होना शायद दुनिया में पहली बार हुआ है.

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सदियों पुराने राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद पर देश की सबसे बड़ी अदालत का फैसला आ गया. विवादित जमीन पर राम लला का हक मानते हुए सुप्रीम कोर्ट की पांच-सदस्यीय पूर्णपीठ ने सर्वसम्मति से यह फैसला दिया. इतने जटिल और विवादित मुद्दे पर, जिसमें हर सवाल पेंच-दर-पेंच थे, पीठ के सभी पांच जजों का एकमत होना इन जजों की मानसिक दृढ़ता, न्यायिक परिपक्वता और संवैधानिक नैतिकता का दुनिया में आने वाली पीढ़ियों के लिए जीता-जागता उदाहरण बनेगा.

 कुल 1045 पृष्ठ के इस सर्वसम्मत फैसले में पांचों जजों के हस्ताक्षर के बाद एक 116 पृष्ठ का संलग्नक भी शामिल है. फैसले में सरकार से कहा गया है कि एक ट्रस्ट बना कर इस जमीन का प्रबंधन और मंदिर निर्माण का कार्य उसे दे और साथ ही  सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में कहीं प्रमुख जगह पर पांच एकड़ जमीन भी मस्जिद के लिए दी जाए. फैसले का आधार पुरातत्व विभाग (एएसआई) की उत्खनन के बाद दी गई रिपोर्ट है जिसमें विवादित मस्जिद के नीचे कोई ढांचा होना बताया लेकिन यह भी कहा कि इस रिपोर्ट से यह सिद्ध नहीं हुआ कि मंदिर गिरा कर मस्जिद बनी. हालांकि रिपोर्ट से सिद्ध होता है कि नीचे मिला ढांचा गैर-इस्लामिक था.

यह फैसला देश के  इतिहास को बदलने वाला है, क्योंकि इस मुद्दे के हल नहीं हो पाने से हिंदू-मुसलमानों के बीच मेलजोल में बाधा पैदा हो रही थी. अदालत ने जमीन की मिल्कियत के निर्मोही अखाड़े के दावे को हालांकि खारिज कर दिया, फिर भी निर्मोही अखाड़े के आंशिक दावे को बहाल रखते हुए मंदिर निर्माण के लिए बनाए जाने वाले ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़े को भी शामिल करने का  आदेश दिया है.

कुछ अंतर्जात सत्य को छोड़कर, जैसे शांति व प्रेम का संचरण तथा क्रोध व घृणा का परित्याग, सभी अन्य सत्य दिक्काल सापेक्ष होते हैं. इन सत्य को देखने के अनेक दृष्टिकोण होते हैं और हर कोण से और हर काल में यह सत्य बदला नजर आता है इसीलिए जरूरत होती है निष्पक्ष अदालतों की और उनके माध्यम से निरपेक्ष सत्य को जानने की. लेकिन चूंकि अदालतें भी मानव-संचालित हैं लिहाजा अक्सर उनका सत्य भी नीचे से ऊपर अदालत-दर-अदालत, और बेंच-दर-बेंच बदलता रहता है. फिर भी समाज से अपेक्षित होता है कि अंतिम तौर पर अदालत के फैसले को ही सत्य माने, भले ही वह आपके सत्य से इतर हो. शंकराचार्य का ‘मायावाद’ और उसके तहत ‘सर्प-रज्जु भ्रम’ का अकाट्य उदाहरण पश्चिमी दर्शनशास्त्न में भी वही मान्यता रखता है.

अयोध्या विवाद पर अंतिम फैसला 135 साल तक नहीं आ सका था. वैसे अदालत के सामने प्रश्न जमीन की मिल्कियत को लेकर था लेकिन सबसे बड़ी अदालत के सामने समस्या जटिल थी- फैसले देने में इतिहास के तथ्य भी देखने थे, एक समाज के भावनात्मक अतिरेक को भी ध्यान में रखना था और दूसरी ओर प्रजातंत्न के इस मूल सिद्धांत को भी कि बहुमत का शासन हो लेकिन अल्पसंख्यक के अधिकारों की सुरक्षा भी हो.

बहरहाल, देश की सबसे बड़ी अदालत का यह सर्वसम्मति से दिया गया फैसला इन न्यायमूर्तियों और न्याय की दुनिया में एक बड़ा उदाहरण बनेगा क्योंकि कुल 22 जटिल प्रश्नों पर सभी पांच जजों का एकमत होना शायद दुनिया में पहली बार हुआ है. ध्यान रहे कि फैसला हर जज को इतिहास में अमर करने वाला है और हर जज आम तौर पर चाहता है कि इतिहास उसकी बातों को अलग से समझे.

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