Maharashtra local bodies: विधानसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र में महागठबंधन की सरकार बनने के बाद यह तय था कि अब जल्द स्थानीय निकाय चुनाव होंगे, क्योंकि लंबे समय से राज्य के अनेक जिलों में जिला परिषद, नगर परिषद से लेकर महानगर पालिका के चुनाव लंबित थे. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सहयोगी शिवसेना एकनाथ शिंदे गुट और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी(राकांपा अजित) के साथ बेहतर तालमेल स्थापित होने के बाद चुनावों की तैयारी आरंभ होनी थी. दीपावली के बाद नगर परिषद-नगर पंचायत चुनाव की घोषणा हुई और उनके पूरे होते-होते महानगर पालिका के चुनावों की घोषणा हो गई. उसके बाद जिला परिषद चुनाव घोषित कर दिए गए. यदि राज्य में सरकार गठन से निकाय चुनावों के समय का फासला देखा जाए तो पूरा एक साल दिखाई देता है.
किंतु इस अवधि में किसी ने लोकसभा-विधानसभा की चुनावी थकान को उतारा और किसी ने पारिवारिक झगड़ों को समाप्त करने में इतना समय लगाया कि जमीन पर काम करने का समय नहीं बचा. विधानसभा चुनाव की गलतियां दूर करने की बजाय सहानुभूति को मजबूत हथियार समझा गया. लोकसभा चुनाव परिणामों से भिन्न रहे विधानसभा चुनावों को झूठा साबित करने में पूरी ऊर्जा लगाई गई.
नतीजे दो निकायों के चुनाव परिणाम के रूप में सामने हैं. जिनको लेकर मतदान में गड़बड़ी से लेकर परिणामों में हेर-फेर तक के सवाल उठाए जाने आरंभ हो गए हैं. मगर चुनावों को लेकर संगठनात्मक दृष्टि से विचार-विमर्श शून्य नजर आता है, बाकी मतदाता के मन की बात या फिर उसकी आकांक्षा समझना बहुत दूर मालूम पड़ती है.
शुक्रवार को घोषित 29 महानगर पालिका के चुनावों में मालेगांव, परभणी, ठाणे, भिवंडी, चंद्रपुर जैसी कुछ महानगर पालिकाओं को छोड़ दिया जाए तो लगभग दो दर्जन स्थानों पर महागठबंधन कब्जा करने के लिए तैयार है, जिनमें से कुछ स्थानों पर भाजपा को अकेले बहुमत प्राप्त है. कुछ स्थान ऐसे भी हैं, जहां उसे दशकों के बाद सत्ता पाने का अवसर मिल रहा है.
कुछ मनपा ऐसी भी हैं, जिनमें सालों से उसने दूसरे स्थान पर समझौता किया. इस बार लगभग सभी मनपा में वह नंबर वन की पार्टी बनकर उभरी है. जिससे उसका ‘ट्रिपल इंजन’ की सरकार का सपना पूरा होने की संभावना है. इस प्रयास में उसके दस साल के परिश्रम को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. हर चुनाव के बाद धांधली के आरोपों को सहते हुए अगले चुनाव की तैयारी में जुटने की कला भाजपा ने सिखाई.
विधानसभा चुनाव के समय एक प्रदेशाध्यक्ष और निकाय चुनाव के आरंभ होने के पहले दूसरा अध्यक्ष बन जाने के बाद समान परिणाम संगठन कौशल का प्रमाण हैं. नए अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण ने जिस प्रकार दूसरे दलों के नेताओं के लिए स्वागत द्वार खोला, उससे सहयोगी दलों तक में बेचैनी थी. जिसे अनदेखी कर निचले स्तर तक जिला-तहसील तक नेताओं-कार्यकर्ताओं को अंतिम समय तक जोड़ना जारी रखा.
नौबत यह भी आई, जब चुनाव के टिकट बंटने आरंभ हो गए थे तब भी कुछ आगंतुकों को पार्टी में शामिल कर उम्मीदवार बनाया जा रहा था. जिसको लेकर आक्रोश भी था और हंगामा भी हुआ. मगर परिणामों से पार्टी ने अपनी रणनीति को साफ कर दिया. चुनाव में केवल एक ही योग्यता ‘विजय’ थी. जिसके पास वह थी, उसे प्रत्याशी बनाया गया. इसके लिए पहले से ‘होम वर्क’ किया गया.
बाद में ‘फील्ड वर्क’ किया गया. जिसमें हर स्तर का नेता अपनी क्षमता अनुसार शामिल हुआ. रूठे को मनाया और अनुशासनहीन को निष्कासित कर संदेश दिया गया. यदि भाजपा की एक साल की तैयारी को देखा जाए तो बाकी दलों की कोशिशों में कमी साफ नजर आती है.
मूल दलों से अलग होकर बने शिवसेना(शिंदे गुट) और राकांपा(अजित पवार गुट) ने कुछ खुन्नस और कुछ भाजपा की संगत में रहकर निचले स्तर पर जाकर प्रयास किए. कार्यकर्ताओं और नेताओं को संगठित और एकजुट किया. उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और अजित पवार ने जिलों के दौरे किए. उनके अध्यक्ष और बड़े नेता-मंत्रियों आदि ने बैठकें और सभाएं कीं,
जिससे उन्हें अपनी स्थिति बनाए रखने में सफलता मिली. उस तुलना में राकांपा(शरद पवार गुट), शिवसेना(ठाकरे गुट) और कांग्रेस बहुत सुस्त नजर आए. उन्होंने एक स्थान से ही सारे सूत्र संचालित करने में भरोसा दिखाया. शिवसेना(ठाकरे गुट) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना(मनसे) ने पारिवारिक गतिविधियां और बंधु मिलन को एक रणनीति का भाग माना,
लेकिन उसके बाद संघर्ष चुनावी मैदान में होना था. जिसकी बिसात घर पर बिछाई गई और ‘वर्क फ्रॉम होम’ का मुकाबला ‘वर्क फ्रॉम फील्ड’ से हुआ. अब परिणामों ने सिद्ध कर दिया है कि राजनीति घर बैठ कर नहीं हो सकती. रिश्तों की दुहाई देकर मत हासिल नहीं किए जा सकते हैं. भाजपा ने अपनी स्थापना के साथ हार-जीत से अधिक संगठन की मजबूती पर ध्यान दिया.
लगातार नए-नए अध्यक्ष बनाए. कार्यकर्ताओं का महत्व बढ़ाया. परिवारवाद को किनारे किया. शिवसेना ने भी अपने पार्टी चरित्र को छोटे-छोटे लोगों को बड़ा नेता बनाने वाले के रूप में विकसित किया. एक तरफ भाजपा बढ़ती चली गई और दूसरी ओर शिवसेना का विघटन होता चला गया. दरअसल शिवसेना में टूट-फूट के बाद नए सिरे से पार्टी को मजबूत बनाने का काम होना चाहिए था.
परंतु पार्टी ने अपनी नीति के तहत बगावती लोगों पर हमले कर संगठन की कमजोरी को दूर नहीं किया. छगन भुजबल, नारायण राणे, राज ठाकरे से लेकर एकनाथ शिंदे तक पतन को गद्दारी की उपमा दी गई, लेकिन उससे निपटने के उपाय भावनात्मक ही ढूंढ़े गए. शिंदे के अलग होने के बाद राज ठाकरे की वापसी कुछ ऐसा ही कदम रही.
जिसमें यह बात नहीं सोची गई कि नेता के साथ कार्यकर्ता के जाने का खतरा होता है. वही पार्टी को खोखला कर जाता है. असल तौर पर यह बात विघटन के बाद व्यापक दौरों से समझी और सुलझाई जा सकती है. मगर शिवसेना(ठाकरे गुट) और मनसे ने घर से ही ‘रिमोट कंट्रोल’ पर संगठन चलाया. जिसके परिणाम सामने हैं. विधानसभा के बाद स्थानीय निकायों से भी नियंत्रण छूट चुका है.
कभी जिन निकायों पर कब्जा कर शहरी पार्टी समझी जाती थी, वहां वह अपने प्रतिनिधि ढूंढ़ने के लिए मोहताज हो चली है. यह पूरी तौर पर अदूरदर्शिता और राजनीतिक अपरिपक्वता का उदाहरण है, जिससे लगातार बढ़ती मुश्किलों के बीच भविष्य का अनुमान लगाना भी कठिन हो चला है. फिलहाल अब रोशनदानों से राजे-रजवाड़े चलाने के दिन लद चुके हैं.