Increasing Challenges for India in Afghanistan | अफगानिस्तान में भारत के लिए बढ़ती चुनौतियां

लेखक- राजेश बादल
 अब संशोधित कार्यक्रम के मुताबिक बीस अक्तूबर को मतदान होगा। करीब 249 सीटों वाली संसद के लिए करीब दो करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने जा रहे हैं। चौदह साल पहले वहां नया संविधान स्वीकार किया गया था। उसके बाद से पहली बार है, जब चुनावी राजनीति में इतनी तपिश महसूस की जा रही है। वहां की राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले देश भी सक्रिय हो गए हैं। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई और फौज की जितनी रुचि अपने देश के चुनाव में है, उससे कम अफगानिस्तान चुनाव में नहीं है। तालिबान के अपने स्वार्थ हैं तो अमेरिका, रूस, चीन, ईरान और भारत के भी अपने-अपने हित हैं। क्या ही अनोखे समीकरण हैं। 

पाकिस्तान और चीन मिलकर भारत को अफगानिस्तान में नहीं देखना चाहते। अमेरिका और पाकिस्तान मिलकर रूस का अफगानिस्तान में दखल नहीं चाहते, ईरान और रूस वहां अमेरिका को नहीं चाहते, तालिबान अमेरिका और इस्लामिक स्टेट का प्रभाव अफगानिस्तान में नहीं चाहता। बेचारा अफगानिस्तान क्या चाहता है -इसकी चिंता शायद किसी को नहीं। भारत ने अफगानिस्तान के लिए नया संसद भवन बनाया है। भारतीय निर्वाचन आयोग अनेक देशों में इस लोकतांत्रिक अनुष्ठान को संपन्न कराने या उनकी प्रणाली में सुधार के लिए अनेक कार्यक्रम चलाता है। अफगानिस्तान इस दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। अफगानिस्तान के चुनाव अधिकारी भारत में अनेक बार प्रशिक्षण पा चुके हैं। इसमें उन्हें अपने देश में निष्पक्ष और स्वतंत्न निर्वाचन प्रणाली को स्वीकार करने के लिए तैयार किया जाता रहा है। भारत मानता है कि दुनिया का सबसे प्राचीन और बड़ा लोकतांत्रिक देश होने के नाते अन्य देशों में भी निर्वाचन  प्रक्रि या को बढ़ावा देने की उसकी नैतिक जिम्मेदारी है।

 इस कारण पिछले साल ही केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कई देशों में चुनाव प्रणाली मजबूत बनाने के लिए मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग को मंजूरी दी थी। इन देशों में भूटान और अफगानिस्तान भी शामिल हैं। पाकिस्तान इससे परेशान है कि अगर अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक प्रक्रिया मजबूत और स्थिर हुई तो पाकिस्तान के छिपे स्वार्थ पूरे नहीं होंगे। इस कारण बीते दिनों अफगानिस्तान में आतंकवादी वारदातों में अचानक तेजी आई है। वह किसी भी सूरत में शांतिपूर्वक चुनाव नहीं होने देना चाहेगा। कायदे से ये चुनाव 2016 में होने थे। हिंसा बढ़ी तो जुलाई 2018 तक के लिए चुनाव टाल दिए गए। जून में फिर आतंकवादी वारदातें तेज हो गईं। इन सबके पीछे पाकिस्तान समर्थित उग्रवादी गुटों का हाथ है। भारत के लिए यह गंभीर चुनौती है।

अफगानिस्तान में बीते दिनों हिंदू-सिखों पर आतंकवादी हमला इसका ताजा नमूना है। इसके पीछे हक्कानी नेटवर्क का हाथ बताया जाता है। लोकप्रिय सिख नेता अवतार सिंह की हत्या इसलिए भी हिलाने वाली है क्योंकि वे अफगानिस्तान में शांति के लिए पर्दे के पीछे बहुत सक्रिय थे। इस बार वहां की संसद के लिए चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे थे लेकिन पाकिस्तान को यह पसंद नहीं था। पाकिस्तान में तो चुनाव सुधार ताले में बंद पड़े हैं मगर अफगानिस्तान में स्वतंत्न और निष्पक्ष चुनाव आयोग पर जोर दिया जा रहा है। यही नहीं चुनाव सुधारों पर भी देश में बहस चल रही है। इस साल 14 अप्रैल को काबुल में चुनाव आयोग ने अपने इरादों का ऐलान भी कर दिया था। ऐसे वातावरण में अवतार सिंह तालिबान और अफगानी सरकार के बीच सेतु बनकर उभरे थे। कहा जा रहा है कि दोनों ही पक्ष अवतार सिंह  के साथ सहज महसूस करते थे।  

अफगानिस्तान के उग्रवादी समूहों को पाकिस्तान का समर्थन भारत के लिए गंभीर चुनौती है। अमेरिकी मदद रुकने के बाद भी अगर पाकिस्तानी फौज के माथे पर शिकन नहीं आई है तो इसका कारण अफीम की खेती है। अफगानिस्तान दुनिया में सबसे ज्यादा अफीम उगाने वाला देश है। इस अफीम का उपयोग दुनिया भर के लिए दवाएं और निश्चेतक बनाने में होता है। मानक सिद्धांतों के मुताबिक अफीम की सारी फसल सरकारी नियंत्नण में होनी चाहिए। नियंत्नण के बाहर की खेती से उत्पन्न अफीम का इस्तेमाल हेरोइन बनाने में होता है। अंतर्राष्ट्रीय तस्कर बाजार में हेरोइन की कीमत दो करोड़ से लेकर पांच करोड़ रुपए प्रति किलोग्राम तक है। होता यह है कि अफगानिस्तान में पाक समर्थित उग्रवादी गुट अफीम पैदा करते हैं। यह अफीम पाकिस्तानी फौज तक पहुंचती है। फौजी आला अफसरों और आईएसआई समर्थित पाक राजनेताओं ने चोरी से छोटी-छोटी रिफाइनरियां स्थापित की हैं।

 ये रिफाइनरी अफीम को हेरोइन में बदलती हैं और अंतर्राष्ट्रीय तस्कर बाजार में बेच देती हैं। इनका पैसा पाक फौजी अफसरों और हक्कानी नेटवर्क जैसे समूहों को मिलता है। इसके अलावा पाक फौज इस पैसे के बदले में उग्रवादी गुटों को चीन में बने हथियार सप्लाई करती है, जो अफगानिस्तान में हिंसा फैलाने के काम आते हैं। इसी कारण फौज को अमेरिकी मदद बंद होने की कोई खास चिंता नहीं है। अलबत्ता पाक की जनता भुखमरी की ओर जाती दिख रही है। फौज और आतंकवादी समूहों का यह गठजोड़ भारत ही नहीं दुनिया भर के लिए बड़ी चुनौती है ।बीते पचास - साठ बरस में इस सुंदर मुल्क की देह पर इतने चीरे लगे हैं कि अब किसी नए घाव का कोई असर ही नहीं होता। इसकी हालत ऑपरेशन थिएटर की टेबल पर लेटे एक ऐसे मरीज की है जिसे खुद अपने मर्ज का पता नहीं है और डॉक्टर एक के बाद एक नई बीमारियों के नाम पर अपने औजारों से खेल रहे हैं। पहले राजाओं का निरंकुश राज, फिर नादिरशाही हुकूमत ने अफगानिस्तान को एक सहज देश के रूप में पनपने नहीं दिया। 

उसके इतिहास में अन्य देशों की इतनी बड़ी भूमिका रही कि अफगानी इच्छाएं और ख्वाहिशें दम तोड़ती रहीं। एक दशक तक सोवियत संघ की सेना के बूटों से यह मुल्क थर्राता रहा। फिर तालिबान ने एक अनुदार इस्लामी राज्य बनाने का षड्यंत्न रचा और अब नाटो फौज ने अफगानिस्तान बचाने के नाम पर इस राष्ट्र को अपने घेरे में लिया है। अफगानिस्तान बेचारा करे तो क्या? परदेशी सेना की सुरक्षा में रहना उसकी मजबूरी बन गई है। जिस दिन भी इन सेनाओं ने अफगानिस्तान छोड़ा, छह महीने के भीतर पाकिस्तान और तालिबान इस पर कब्जा कर लेंगे। अफगान आर्मी अपने मुल्क की हिफाजत नहीं कर पाएगी। हालांकि भारत उसका प्राकृतिक मित्न है मगर भारतीय सेना को वहां भेजना खतरे से खाली नहीं  है। श्रीलंका में अपनी सेना को भेजने का खामियाजा हिंदुस्तान भुगत चुका है। इसलिए भारत के लिए यह अजब संशय, दुविधा, जोखिम और अनिर्णय की स्थिति है। कुछ-कुछ सांप-छछूंदर जैसी।