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ब्लॉग: आखिर कैसे नियंत्रित हो सियासत में कालेधन का इस्तेमाल ?

By पंकज चतुर्वेदी | Updated: March 9, 2024 10:15 IST

एक जनकल्याणकारी और लोकतंत्रात्मक शासन के लिए चुनावी तंत्र में आमूलचूल परिवर्तन अनिवार्य है और इसकी शुरुआत वित्तीय तंत्र से ही करनी होगी।

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ठळक मुद्दे1984 में भी चुनाव खर्च संशोधन के लिए एक गैरसरकारी विधेयक लोकसभा में रखा गया थासंथानम की अध्यक्षता में चार सांसदों और दो आला अफसरों की एक कमेटी भ्रष्टाचार के विभिन्न पहलुओं की जांच के लिए गठित की गई थी1970 में प्रत्यक्ष कर जांच के लिए गठित वांचू कमेटी की रपट में कहा गया था कि चुनावों में अंधाधुंध खर्च कालेधन को प्रोत्साहित करता है

एक जनकल्याणकारी और लोकतंत्रात्मक शासन के लिए चुनावी तंत्र में आमूलचूल परिवर्तन अनिवार्य है और इसकी शुरुआत वित्तीय तंत्र से ही करनी होगी। ऐसा नहीं कि चुनाव सुधार के कोई प्रयास किए ही नहीं गए, लेकिन विडंबना है कि सभी सियासती पार्टियों ने उनमें रुचि नहीं दिखाई। वी.पी. सिंह वाली राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार में कानून मंत्री दिनेश गोस्वामी की अगुआई में सन्‌ 1990 में गठित चुनाव सुधारों की कमेटी का सुझाव था कि राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दलों को सरकार की ओर से वाहन, ईंधन, मतदाता सूचियां, लाउड-स्पीकर आदि मुहैया करवाए जाने चाहिए।

इसमें यह भी कहा गया था कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों को न केवल सरकार के अंतर्गत किसी नियुक्ति बल्कि राज्यपाल के पद सहित किसी अन्य पद के लिए अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए। साथ ही किसी भी व्यक्ति को दो से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव लड़ने की अनुमति न देने, निर्दलीय चुनाव लड़ने पर जमानत राशि बढ़ाने की बात भी इस रिपोर्ट में थी।

इन सिफारिशों में से केवल एक ईवीएम से चुनाव को लागू किया गया, शेष सुझाव कहीं ठंडे बस्ते में पड़े हैं। 1984 में भी चुनाव खर्च संशोधन के लिए एक गैरसरकारी विधेयक लोकसभा में रखा गया था, पर नतीजा वही ‘ढाक के तीन पात’ रहा. सन्‌ 1962 में सांसद के। संथानम की अध्यक्षता में चार सांसदों और दो आला अफसरों की एक कमेटी भ्रष्टाचार के विभिन्न पहलुओं की जांच के लिए गठित की गई थी।

हालांकि इस कमेटी के दायरे में राजनीतिक लोग नहीं थे, फिर भी सन्‌ 1964 में आई इसकी रिपोर्ट में कहा गया था कि राजनैतिक दलों का चंदा एकत्र करने का तरीका चुनाव के दौरान और बाद में भ्रष्टाचार को बेहिसाब बढ़ावा देता है। 1970 में प्रत्यक्ष कर जांच के लिए गठित वांचू कमेटी की रपट में कहा गया था कि चुनावों में अंधाधुंध खर्च कालेधन को प्रोत्साहित करता है। इस रपट में हरेक दल को चुनाव लड़ने के लिए सरकारी अनुदान देने और प्रत्येक पार्टी के अकाउंट का नियमित ऑडिट करवाने के सुझाव थे।

राजा चेलैया समिति ने भी लगभग यही सिफारिशें की थीं. ये सभी दस्तावेज अब भूली हुई कहानी बन चुके हैं। अगस्त-98 में एक जनहित याचिका पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिए थे कि उम्मीदवारों के खर्च में उसकी पार्टी के खर्च को भी शामिल किया जाए। आदेश में इस बात पर खेद जताया गया था कि सियासती पार्टियां अपने लेन-देन खातों का नियमित ऑडिट नहीं कराती हैं। अदालत ने ऐसे दलों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही के भी निर्देश दिए थे। लेकिन हुआ कुछ भी नहीं। चुनाव प्रक्रिया में शुचिता, पारदर्शिता और खर्च कम करना आज लोकतंत्र के सशक्तिकरण की अनिवार्य जरूरत है।

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