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हरीश गुप्ता का ब्लॉग: महाराष्ट्र को लेकर भाजपा का मास्टर स्ट्रोक!

By हरीश गुप्ता | Updated: May 25, 2023 08:12 IST

भाजपा आलाकमान मई 2024 में लोकसभा चुनाव के साथ ही राज्य में विधानसभा चुनाव कराने के बारे में विचार कर रहा है. राज्य भाजपा नेतृत्व को उम्मीद है कि इस कदम से एमवीए बैकफुट पर आ जाएगा और विधानसभा सीटों के बंटवारे के मुद्दे पर उनकी एकता बिखर जाएगी.

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लोकसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे को लेकर महाविकास आघाड़ी (एमवीए) के तीन सहयोगियों द्वारा सार्वजनिक रूप से दिए जा रहे बयानों पर भाजपा आलाकमान करीब से नजर रख रहा है. यह शरद पवार ही थे जिन्होंने शिवसेना, कांग्रेस और राकांपा की एक बंद कमरे की बैठक में इस चर्चा को शुरू किया और सहयोगियों से आग्रह किया कि वे गंभीरता के साथ सीटों के बंटवारे का फार्मूला तय करें.

लेकिन इससे पहले कि कोई जमीनी काम हो पाता, शिवसेना (उद्धव गुट) के वरिष्ठ नेता संजय राऊत ने घोषणा कर दी कि उनकी पार्टी राज्य की 48 लोकसभा सीटों में से उन सभी 19 सीटों पर चुनाव लड़ेगी, जहां उसने 2019 के लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज की थी. 

जाहिर है कि अन्य सहयोगी इससे परेशान हैं क्योंकि शिवसेना ने 2019 का लोकसभा चुनाव भाजपा के साथ गठबंधन करके लड़ा था और एनडीए ने राज्य में कुल 41 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि चार सीटों पर राकांपा और एक पर कांग्रेस ने जीत हासिल की थी. एआईएमआईएम को एक सीट मिली थी, जबकि अमरावती की सीट पर निर्दलीय नवनीत राणा ने कब्जा जमाया था.

यह महसूस करते हुए कि एमवीए भागीदारों के लिए सीटों के बंटवारे का फार्मूला सौहार्द्रपूर्ण ढंग से तय कर पाना लगभग असंभव होगा, भाजपा आलाकमान मई 2024 में लोकसभा चुनाव के साथ ही राज्य में विधानसभा चुनाव कराने के बारे में विचार कर रहा है. राज्य भाजपा नेतृत्व ने आलाकमान को पहले ही बता दिया है कि इस कदम से एमवीए बैकफुट पर आ जाएगा और विधानसभा सीटों के बंटवारे के मुद्दे पर उनकी एकता बिखर जाएगी. 

विधानसभा चुनाव अक्टूबर 2024 में होने हैं और इन्हें छह महीने पहले ही करा देने से भाजपा को भारी लाभ मिल सकता है. कर्नाटक की जीत से महाराष्ट्र में कांग्रेस का मनोबल बढ़ा है और उसके नेता पीछे हटने को तैयार नहीं होंगे. दूसरी ओर भाजपा नेतृत्व सुप्रीम कोर्ट द्वारा एनडीए सरकार को दिए गए जीवनदान का पूरा फायदा उठाने की योजना बना रहा है. भाजपा एमवीए नेताओं को भाजपा में शामिल होने के संकेत भेज रही है.

योगी, दिल्ली के बीच दरार बढ़ी

कर्नाटक विधानसभा चुनावों ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी के कुछ पदाधिकारियों के बीच की खाई को और चौड़ा कर दिया है. भाजपा के स्टार प्रचारक होने के नाते योगी को अपने दौरे के दौरान वहां 35 रैलियों और रोड शो को संबोधित करना था और चुनाव प्रचार के लिए केंद्रीय पार्टी कार्यालय को 3-4 मई तथा 7 से 10 मई की दो तारीखें सुझाई गई थीं. वहां सुपर स्टार प्रचारक प्रधानमंत्री मोदी की जहां 19 रैलियां और 14 कार्यक्रम हुए, वहीं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 23 रैलियों आदि को संबोधित किया. 

इसके बाद असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा ने 11 रैलियां कीं, जबकि योगी ने मात्र नौ रैलियों को संबोधित किया. चुनाव प्रचार के दौरान योगी ने कहीं न कहीं महसूस किया कि पार्टी प्रबंधकों ने उनके लिए सबसे कठिन सीटों का चयन किया था जहां भाजपा कभी नहीं जीती थी. जबकि भाजपा सरकार के खिलाफ भारी सत्ता विरोधी लहर को ध्यान में रखते हुए पार्टी को उन सीटों का चयन करना चाहिए था जहां थोड़े प्रयासों से जीत मिल सकती थी. इसलिए उन्होंने कर्नाटक में अपनी यात्राओं को धीमा कर दिया और निर्धारित 35 रैलियों के बजाय मात्र नौ रैलियों को ही संबोधित किया. 

योगी ने अपने राज्य में स्थानीय निकाय चुनावों पर ध्यान केंद्रित किया और भाजपा ने यूपी के सभी शहरी स्थानीय निकाय चुनाव में अभूतपूर्व जीत दर्ज की. कांग्रेस ने जहां कर्नाटक में भाजपा की हार का जश्न मनाया, वहीं सत्तारूढ़ पार्टी ने यूपी की ऐतिहासिक जीत की खुशी मनाई. मोदी ने बड़ी जीत के लिए योगी को ट्वीट कर बधाई दी. लेकिन दिल्ली में कई लोगों ने यह कहते हुए योगी पर दोषारोपण किया कि गैंगस्टर और राजनेता अतीक अहमद की गोलीबारी में हत्या से पार्टी को पसमांदा मुसलमानों के बीच पिछड़ी जातियों का समर्थन खोना पड़ा है.

अपने क्षत्रपों से भी जूझ रही है भाजपा

कर्नाटक में भाजपा की शर्मनाक हार ने कई क्षेत्रीय क्षत्रपों के चेहरे पर मुस्कान ला दी है, जो मौके की प्रतीक्षा कर रहे थे. इस साल के अंत में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं जिसमें राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे बड़े राज्य शामिल हैं. इन राज्यों के लंबे समय से उपेक्षित मजबूत नेताओं के मन में अब उम्मीदें जग रही हैं. यह कोई रहस्य नहीं है कि पार्टी हाईकमान राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को पसंद नहीं करता है. उन्हें न तो भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया और न ही विधानसभा में विपक्ष का नेता पद दिया गया. 

ठीक ऐसा ही छत्तीसगढ़ में रमन सिंह के साथ हुआ जो तीन बार राज्य में शासन कर चुके हैं. भाजपा नेतृत्व ने कई संयोजनों को आजमाया लेकिन सफलता नहीं मिली. मध्य प्रदेश में भाजपा नेतृत्व शिवराज सिंह चौहान को विस्थापित करने के बारे में सोच रहा है, क्योंकि वे शायद जीत न दिला पाएं, जैसा कि 2018 में हुआ था. लेकिन और कोई मजबूत चेहरा नहीं है जो बाजी को पलट सके. भाजपा की त्रिमूर्ति (मोदी-शाह-नड्डा) इन राज्यों में नेतृत्व के मुद्दे पर जून-जुलाई में फैसला कर सकती है.

मसौदा दोषपूर्ण, केजरीवाल खुश

मोदी सरकार के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (संशोधन) अध्यादेश, 2023 का उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा ‘सेवाओं’ की बागडोर केजरीवाल सरकार को सौंपने के फैसले को निष्प्रभावी करना है. नए बनाए गए प्राधिकरण के पास ग्रुप ए के सभी अधिकारियों और दानिक्स के दिल्ली में सेवा देने वाले अधिकारियों के ट्रांसफर और पोस्टिंग की सिफारिश करने का अधिकार होगा. चूंकि किसी भी पक्ष की ओर से दाखिल की जाने वाली पुनरीक्षण याचिका या अपील पर सुनवाई के लिए जुलाई में सुप्रीम कोर्ट के फिर से खुलने तक इंतजार करना होगा, इसलिए केजरीवाल सरकार के पास कोई भी तत्काल उपाय उपलब्ध नहीं है. 

दूसरे, विधेयक को राज्यसभा में पारित होने से रोकना आम आदमी पार्टी के लिए कठिन हो सकता है. हालांकि कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अध्यादेश का मसौदा बहुत जल्दबाजी में तैयार किया गया है. अध्यादेश के तहत, प्राधिकरण की अध्यक्षता दिल्ली के मुख्यमंत्री करेंगे और इसमें मुख्य सचिव व प्रधान गृह सचिव शामिल होंगे तथा इसमें सभी मामलों का फैसला मौजूद सदस्यों के बहुमत से होगा. 

कानून के जानकार आश्चर्य व्यक्त कर रहे हैं कि दो नौकरशाहों को लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित मुख्यमंत्री के बराबर कैसे माना जा सकता है. किसी भी मामले में, नौकरशाह ही बहुमत में रहेंगे. यह प्रावधान कानून की कसौटी पर खरा नहीं उतर पाएगा. कानून की नजर में अध्यादेश खराब है क्योंकि मुख्यमंत्री की मुख्य सचिव और गृह सचिव से तुलना नहीं की जा सकती.

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