Encouragement of soldiers and pm narendra modi message to China | विजय दर्डा का ब्लॉग: जवानों की हौसला अफजाई और चीन को संदेश
फोटो क्रेडिट: सोशल मीडिया

Highlights1971 में इंदिरा गांधी की लेह यात्र को अभी भी याद किया जाता है क्योंकि उसके ठीक बाद पाकिस्तान को उन्होंने दो टुकड़ों में तोड़ दिया था.राजीव गांधी ने भी प्रधानमंत्री रहते हुए सैनिकों के साथ कई मौकों पर वक्त बिताया और हौसला अफजाई की थी. हमारे सैनिकों की शौर्य गाथा आज भी अरुणाचल प्रदेश से लेकर लद्दाख तक की भूमि के कण-कण में मौजूद है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब तीन जुलाई की सुबह अचानक लेह विमान तल पर उतरे तो पूरी दुनिया में उनके इस दौरे की चर्चा होने लगी. यह दौरा अप्रत्याशित था. रात तक किसी को कानोंकान खबर नहीं थी. दुनिया इस दौरे के मायने तलाशने लगी. उनके साथ चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बिपिन रावत और सेना प्रमुख जनरल नरवणो भी थे. 

मोदी की यात्र के मायने बहुत स्पष्ट थे. एक तो अपने जवानों की हौसला अफजाई करना और दूसरों को संदेश देना कि भारत की संप्रभुता से खिलवाड़ किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं है. एक कुशल राजनीतिज्ञ की तरह उन्होंने चीन का नाम लिए बगैर साफ कर दिया कि विस्तारवादी नीतियों का जमाना लद चुका है. 

बीती सदी में विस्तारवाद ने ही मानव जाति का विनाश किया. किसी पर विस्तारवाद की जिद सवार हो तो वह विश्व शांति के लिए खतरा है. इस समय विकासवाद ही प्रासंगिक है.

मोदी ने 11 हजार फुट की ऊंचाई पर नीमू में फ्रंट लाइन पर जवानों से बातचीत की और लेह के अस्पताल में जाकर 15-16 जून की रात को चीनी सैनिकों के साथ झड़प में घायल भारतीय जवानों से मुलाकात की तो जाहिर है कि इससे हमारे जवानों के हौसले और बुलंद ही हुए होंगे. 

जब परिवार का मुखिया कंधे पर हाथ रखता है तो स्वाभाविक तौर पर हौसला बढ़ जाता है. नरेंद्र मोदी ने यही किया है. वहां तैनात भारतीय सेना की 14वीं कोर के जवानों के अदम्य साहस और शौर्य गाथाओं को तो उन्होंने सराहा ही, यह बताकर कि सीमावर्ती इलाकों पर इन्फ्रास्ट्रर के विकास पर खर्च बढ़ाकर तीन गुना कर दिया गया है, मोदी ने जवानों को संदेश दिया कि उनकी दिक्कतों को दूर करने के लिए देश प्रतिबद्ध है.

यह पहला मौका नहीं है जब नरेंद्र मोदी सैनिकों के बीच पहुंचे. पीएम बनने के बाद उन्होंने पहली दिवाली 2014 में सियाचिन में सैनिकों के साथ मनाई थी. उसके बाद भी वे कम से कम 6 मौकों पर सैनिकों के बीच पहुंचे. 

हालांकि ऐसा भी नहीं है कि केवल नरेंद्र मोदी ही ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो सैनिकों के बीच या फ्रंट पर पहुंचे हों. पंडित जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी ने कई बार फ्रंट पर जाकर सैनिकों की हौसला अफजाई की थी. 

1971 में इंदिरा गांधी की लेह यात्र को अभी भी याद किया जाता है क्योंकि उसके ठीक बाद पाकिस्तान को उन्होंने दो टुकड़ों में तोड़ दिया था. राजीव गांधी ने भी प्रधानमंत्री रहते हुए सैनिकों के साथ कई मौकों पर वक्त बिताया और हौसला अफजाई की थी. इतना ही नहीं, चीन से लड़ाई के ठीक बाद रक्षा मंत्री बने यशवंतराव चव्हाण तो हर दिन तीनों सेना अध्यक्षों से मिलते थे और हर सप्ताह बॉर्डर पर जाते थे.

बहरहाल, नरेंद्र मोदी के दौरे की चीन में प्रतिक्रिया होनी थी. चीनी दूतावास की प्रवक्ता जी रोंग ने कहा कि ‘14 पड़ोसियों में से 12 के साथ चीन ने शांतिपूर्ण बातचीत के आधार पर सीमा का निर्धारण किया हुआ है. चीन के उसके पड़ोसियों के साथ मतभेद को बढ़ा-चढ़ा कर, मनगढ़ंत तरीके से पेश करना और उसे विस्तारवादी के रूप में देखना आधारहीन है.’ 

यहां मैं आपको बताना चाहूंगा कि भौगोलिक रूप से दुनिया के तीसरे सबसे बड़े देश चीन की करीब 22 हजार किलोमीटर सीमा रेखा 14 पड़ोसियों के साथ मिलती है. तुलना के लिए आपको बता दें कि धरती के एक छोर से दूसरे छोर की यदि आप यात्र करें तो वह दूरी 40 हजार किलोमीटर है.  

बहरहाल, चीन के ये पड़ोसी हैं- नॉर्थ कोरिया, कजाकिस्तान, रूस, किर्गिस्तान, वियतनाम, मंगोलिया,  तजाकिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, म्यांमार, लाओस और भारत. इनमें से विवाद भूटान के साथ भी है लेकिन सबसे गहरा विवाद भारत के साथ है.

इतिहास के पन्ने पलट कर देखें तो 1950 तक चीन हमारा पड़ोसी नहीं था. हम दोनों के बीच तिब्बत नाम का देश हुआ करता था और तिब्बत से हमारी दोस्ती जगजाहिर रही है. जब चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया तो वह हमारा पड़ोसी बन गया. 

1954 में जवाहरलाल नेहरू और चाउ एन लाई ने ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के नारे के साथ पंचशील के सिद्धांत पर हस्ताक्षर किए ताकि क्षेत्र में शांति की स्थापना की जा सके. उधर तिब्बत में चीन का दमन बढ़ता जा रहा था. अंतत: तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा गोपनीय तरीके से तिब्बत से निकल गए और अरुणाचल प्रदेश से होकर 30 मार्च 1959 को भारत पहुंच गए. 

भारत ने तिब्बत की निर्वासित सरकार को शरण दी जिसका मुख्यालय हिमाचल प्रदेश के मैकलॉडगंज में है. तभी से चीन ने दुश्मनी पाल ली. इसके बाद 1962 की जंग के बारे में आपको पता है ही.

दुनिया जानती है कि 1962 में हमारी प्राथमिकताएं दूसरी थीं. हम शांति के पुजारी हैं, इसलिए डिफेंस पर हमने खर्च नहीं किया था. चीन की ओर से हमें कोई आशंका भी नहीं थी. हमारे साथ तो छलावा हुआ था इसलिए हम हारे. 

हमारे सैनिकों की शौर्य गाथा आज भी अरुणाचल प्रदेश से लेकर लद्दाख तक की भूमि के कण-कण में मौजूद है. पौड़ी गढ़वाल के जसवंत सिंह रावत की महा शौर्य गाथा को कौन भूल सकता है? 

उन्होंने चीनी सैनिकों से मशीन गन छीनी थी और उसी मशीन गन से 72 घंटों में अकेले ही 300 चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था. चीन को समझ लेना चाहिए कि यह 1962 का भारत नहीं है. हमारे पास भरपूर संसाधन भी हैं और जंग का व्यापक अनुभव भी, जबकि चीन के पास यह अनुभव नहीं है. हमारे सैनिक चीनियों के दांत खट्टे करने में सक्षम हैं. चीन को समझ लेना चाहिए कि यह 1962 का भारत नहीं है और न ही 1962 की दुनिया है. सारा विश्व इस समय हमारे साथ है.

वैसे मुझे लगता नहीं है कि कोई जंग होने वाली है. जंग तो आर्थिक तौर पर ही होगी. सरकार ने 59 चीनी ऐप को बंद करके बहुत अच्छा काम किया है. कुछ मंत्रियों ने अपने विभागों में चीनी कंपनियों को काम न देने की बात की है लेकिन इस तरह का निर्णय भारत सरकार की तरफ से आना चाहिए. चीन से हमें सारे आर्थिक व्यवहार बंद कर देना चाहिए. यदि तकलीफ होती है तो उसे सहना चाहिए क्योंकि उसी से हम आत्मनिर्भर बनेंगे. मेक इन इंडिया और मेड इन इंडिया ही एकमात्र विकल्प है.

Web Title: Encouragement of soldiers and pm narendra modi message to China
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