जयंतीलाल भंडारी
हाल ही में 6 मार्च को वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि सरकार पश्चिमी एशिया में चल रहे युद्ध से प्रभावित भारतीय निर्यातकों को राहत देने के लिए काम कर रही है. उन्होंने कहा कि इन दिनों निर्यातक रसद संबंधी चुनौतियों के अलावा घरेलू बंदरगाहों पर पश्चिम एशिया जाने वाले कार्गो के अटकने से खड़े होने वाले संकट के प्रति आगाह कर रहे हैं. 7 मार्च को थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटिव (जीटीआरआई) के द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण भारत के करीब 11.8 अरब डाॅलर मूल्य के कृषि निर्यात पर खतरा मंडरा रहा है.
यह भारत के द्वारा पिछले वर्ष किए गए कुल कृषि निर्यात का करीब 21.8 प्रतिशत है. ऐसे में सरकार अपने निर्यातकों को राहत देने के कुछ ठोस तरीके अपनाने की डगर पर आगे बढ़ी है.
सरकार ने तत्परतापूर्वक युद्ध से निर्मित हालात से भारतीय निर्यात पर पड़ने वाले प्रभाव पर निर्यात से संबंधित सरकारी मंत्रालयों, निर्यातकों के संगठन, लॉजिस्टिक संचालकों और शिपिंग कंपनियों के प्रतिनिधियों की विशेष बैठक में विचार-मंथन के बाद बहुमंत्रालयी सहायता डेस्क सहित निर्यातकों को हरसंभव सहयोग-प्रोत्साहन दिया जाना सुनिश्चित किया है.
उल्लेखनीय है कि ईरान और इजराइल-अमेरिका के युद्ध के बीच ईरान के द्वारा वैश्विक शिपिंग रूट होर्मुज स्ट्रेट बंद कर दिया गया है. दुनिया को मिलने वाला करीब एक तिहाई तेल, करीब 20 फीसदी लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) और खाद्य उत्पादों का अधिकांश यातायात इसी मार्ग से होता है. ऐसे में इस जलमार्ग के बंद हो जाने से कच्चे तेल की ग्लोबल सप्लाई चेन प्रभावित होने लगी है. चूंकि कच्चे तेल के लिहाज से भारत का करीब 40 प्रतिशत कच्चा तेल इसी रास्ते से होकर आता है, ऐसे में यह युद्ध भारत के लिए कच्चे तेल संबंधी चिंता के साथ निर्यात चुनौती निर्मित करते हुए दिखाई दे रहा है.
चूंकि भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों के करीब 85 फीसदी तक आयात पर निर्भर है, अतएव कच्चे तेल के दाम में बढ़ोत्तरी भारत के आयात बिल की चिंता बढ़ाते हुए दिखाई दे रही है. स्थिति यह है कि 7 मार्च को कच्चे तेल की कीमत करीब 91 डॉलर प्रति बैरल के मूल्य स्तर पर पहुंच गई है. युद्ध के लंबा खिंचने पर कच्चे तेल की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती है और इससे पेट्रोल, डीजल व अन्य पेट्रोलियम उत्पाद महंगे होने लगेंगे.
इससे भारत से निर्यात घटने और व्यापार घाटा बढ़ने की चुनौती गहराते हुए दिखाई देगी. चूंकि इस युद्ध से सीधे तौर पर जुड़े हुए अमेरिका, इजराइल और ईरान सहित युद्ध से प्रभावित पश्चिम एशियाई और यूरोपीय देश भी भारत के लिए निर्यात के प्रमुख बाजार हैं, ऐसे में भारत के निर्यातकों की चिंताएं बढ़ गई हैं. पश्चिम एशिया जाने वाला माल भारत के घरेलू बंदरगाहों पर जमा होने लगा है. शिपिंग कंपनियां चालक दल, कार्गो और जहाजों की सुरक्षा को देखते नए निर्यात आदेश नहीं ले रही हैं. ऐसे में खासतौर से पश्चिम एशिया के देशों में निर्यात घटने की आशंका है.
इसमें कोई दो मत नहीं है कि विस्तारित होते हुए ईरान और इजराइल-अमेरिका युद्ध के बीच भारत से निर्यात बढ़ाना कोई सरल काम नहीं है. ऐसे में भारत के द्वारा निर्यात बढ़ाने के लिए चिन्हित किए गए करीब 200 देशों में निर्यात की नई रणनीति के साथ आगे बढ़ना होगा. भारत से निर्यात बढ़ाने के मद्देनजर निर्यातकों की दिक्कतों को कम करना होगा. ये दिक्कतें केवल शुल्क वृद्धि तक सीमित नहीं हैं वरन् निर्यात पर लगाए गए एंटी-डंपिंग शुल्क से भी संबंधित हैं.
उम्मीद करें कि सरकार के द्वारा हाल ही में निर्यातकों के लिए जो बहुमंत्रालयी सहायता डेस्क बनाया गया है, वह डेस्क निर्यातकों, लॉजिस्टिक संचालकों और शिपिंग कंपनियों के लिए हरसंभव सहयोग और सहायता के लिए अहम भूमिका निभाते हुए दिखाई देगा.