‘सेलिब्रिटी’ बनकर ‘सेलिब्रेशन’ संभव नहीं
By Amitabh Shrivastava | Updated: January 10, 2026 06:11 IST2026-01-10T06:11:31+5:302026-01-10T06:11:31+5:30
स्थानीय निकाय के चुनावों में अनेक स्थानों के नेताओं का माजरा भी कुछ ऐसा ही बन पड़ा है. हर राजनीतिक दल अपने अप्राकृतिक औरा को बढ़ाने में ताकत झोंक रहा है.

सांकेतिक फोटो
राजनीति में ‘ब्रांड’ की बात जब बढ़-चढ़ कर होने लगे, तब ‘ब्रांड एम्बेसडर’ की चर्चा होना स्वाभाविक है. किंतु जन प्रतिनिधि की पहचान को ‘सेलिब्रिटी’ समझना एक नई समस्या को जन्म दे चला है. पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, फिर इंटरनेट के माध्यम से सोशल मीडिया तक नेता कुछ अलग दिखने के प्रयास में इस कदर आत्ममुग्ध होते जा रहे हैं कि उन्हें अपनी निजी जिंदगी भी जनसामान्य को दिखानी आवश्यक मालूम पड़ने लगी है. हालांकि अपनी समस्याओं से घिरी आम जनता जननेताओं से अपने जीवन में सुधार लाने की अपेक्षा रखती है.
वह चुनाव, आंदोलन सहित अनेक अवसरों में अपने मन की बात सुनाने की कोशिश करती है. मगर नेता रहन-सहन से लेकर खान-पान, शौक-विलासिता को दिखाकर अपनी अलग दुनिया को दिखाने में अपनी सफलता मानने लगे हैं. यह परेशानी चुनावों से पहले काफी उभर कर आती है. जिसमें छवि को भुनाने के प्रयास किए जाते हैं.
स्थानीय निकाय के चुनावों में अनेक स्थानों के नेताओं का माजरा भी कुछ ऐसा ही बन पड़ा है. हर राजनीतिक दल अपने अप्राकृतिक औरा को बढ़ाने में ताकत झोंक रहा है. फिलहाल मुंह बाए खड़ी समस्याओं के आगे मतदाता के लिए शानो-शौकत से ज्यादा अभी-भी काम का महत्व है. वह उन्हीं के समाधान के आधार पर नतीजे तय करने की मंशा रखता है.
राजनीति में कार्यकर्ता से लेकर नेता तक की स्थिति का महत्व जमीनी जुड़ाव से है. सीधा आम आदमी से नाता शिखर तक पहुंचाने में देर नहीं करता है. कुछ यही वजह है कि महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने स्वयं को पहले ‘सीएम’ को ‘कॉमन मैन’ और बाद में ‘डीसीएम’ को ‘डेडीकेटेड कॉमन मैन’ बताया. इसका स्पष्ट अर्थ वही था कि वह ऊंचाई पर जाते हुए भी आम आदमी से जुड़े हैं.
उन्होंने सड़क पर रुक कर समस्याओं को सुनने और खेत से लेकर किसी भी स्तर पर पहुंचने की तैयारी दिखाई. लोगों की अनेक प्रकार से सहायता कर सरकार की संवेदना को उजागर किया. राज्य सरकार के दूसरे उपमुख्यमंत्री अजित पवार स्पष्टवादिता के लिए प्रसिद्ध हैं, लेकिन वह भी आम आदमी से जुड़ने के लिए चाय की दुकान से लेकर सड़क पर खड़े, सभा में मिले व्यक्ति की बात सुनने के लिए तैयार रहते हैं.
यह कुछ नए उदाहरण हैं, जिन्हें वर्तमान दौर की राजनीति में देखा जा सकता है. अतीत में इसे राजनीतिज्ञ बनने की सामान्य योग्यता माना जाता था. जिसका कोई दिखावा भी नहीं था. उससे कोई लाभ-हानि की आशा भी नहीं की जाती थी. कुछ सीमा तक वही रूप जननेता का परिभाषित किया जाता था. अब दौर बदल चुका है. जल्दबाजी में परिणामों की चिंता किए बगैर आगे बढ़ने का क्रम जारी है.
गलतफहमी इतनी अधिक हो चली है कि थोड़ी पहचान बनना किसी ‘सेलिब्रिटी’ से कम नहीं माना जा रहा है. सोशल मीडिया हो या फिर अन्य कोई भी मंच, पहनावा से लेकर रहन-सहन तक अलग जगह बना चुका है. अनेक दलों में जब से दिखावे को विशेष महत्व मिलने लगा है, वहीं से नेताओं ने पहचान बनाने के लिए परिश्रम करना आरंभ किया.
कोई सोने की चेन पहन कर घूमता मिला और अपनी गाड़ी में अपना अंदाज दिखाने लगा. यदि कोई नेता स्थापित हो जाता है तो उसके हर कार्य को पहचान बनाने की कोशिश की जाती है. शिवसेना ठाकरे गुट के प्रमुख उद्धव ठाकरे और उनके चचेरे भाई महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे का मिलन किसी ‘सेलिब्रेशन’ से कम नहीं है.
इसे कुछ इस प्रकार सामने लाया जा रहा है कि उनका हर कदम सुर्खियां बनाने का प्रयास कर रहा है. निजी घरेलू कार्यक्रम, घर से निकलना, घर में लोगों से मिलना-जुलना किसी ‘सेलिब्रिटी’ के अंदाज से कम नहीं है. यही कुछ बात ‘ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन’ (एआईएमआईएम) के प्रदेश अध्यक्ष इम्तियाज जलील में भी दिखाई देती है.
कुछ हद तक दक्षिण में ‘हीरो’ के नेता बनने पर उसका अंदाज मतों में बदल जाता है, लेकिन अन्य राज्यों में दिखावे से सफलता का फार्मूला चलता नहीं है. किसी कलाकार या अपनी पहचान को लेकर चलने वाले की राजनेता बनकर आम जन से अपेक्षा कुछ सीमा तक उचित ठहराई जा सकती है. मगर नेता का ‘हीरो’ बनना केवल कामों से ही न्यायोचित ठहराया जा सकता है.
बड़ी गाड़ियों में बैठकर रौब दिखाना सोशल मीडिया की राजनीति में चल सकता है. उसके दर्शक अनेक हो सकते हैं. किंतु जब जमीनी स्तर पर संघर्ष की बात सामने आती है तो काम ही पहचान बनता है. दुर्भाग्य यही है कि मनोरंजन की दुनिया नकल करने वाले नेताओं को कुछ अलग करने की प्रेरणा दे रही है. चमकीली दुनिया में अस्तित्व दिखते रहने में है, जबकि राजनीति में पहचान केवल काम करने से है.
इसलिए बालकनी से हाथ हिलाकर सोशल मीडिया के लिए ‘रील’ बनाई जा सकती है, उसे मतों में नहीं बदला जा सकता है. संभव है कि महानगर पालिका चुनाव में शहरी भाग के मतों को आकर्षित करना आवश्यक हो, किंतु उन्हें केवल दिखावे के आधार पर हासिल नहीं किया जा सकता है. शहरी भाग की मूल समस्याओं पर स्थानीय नेताओं से समाधान मिलने की उम्मीद है.
उनके चुनाव के लिए यदि नेतृत्व करने वाले केवल अपनी छवि के आधार पर मतों की अपेक्षा करेंगे तो राह आसान नहीं हो सकती है. लोकसभा चुनाव में गली-मोहल्लों के नेताओं से सवाल करने का अवसर कम था. परंतु निकाय चुनावों में प्रश्न सभी किए जा सकते हैं.
जिनके उत्तर स्थानीय नेताओं को देने होंगे. जिनके पीछे उनके वही नेता होंगे, जो अपनी पहचान के आधार पर ही मत देने की अपील करते हैं. मगर ‘सेलिब्रिटी’ बन कर ‘सेलिब्रेशन’ का अवसर नहीं मिल सकता है. खुशियां लोगों को खुश करके ही मनाई जा सकती हैं.