Brihanmumbai Municipal Corporation: बृहन्मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) में ऋतु तावड़े के महापौर बनने के बाद महाराष्ट्र की लगभग सभी महानगर पालिकाओं में नेतृत्व की स्थितियां स्पष्ट हो गई हैं. चंद्रपुर के बड़े उलटफेर की चेतावनी का असर परभणी में दिखा है. ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के उत्साह को मालेगांव मनपा ने ठंडा कर चुनाव की जमीनी सच्चाई सामने लाई है. हालांकि नागपुर और सबसे नई जालना जैसी राज्य की अनेक महानगर पालिकाओं में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पास बहुमत था.
किंतु छत्रपति संभाजीनगर से लेकर ठाणे-अकोला से नासिक तक एकतरफा राजनीति का अवसर नहीं था. राज्य की 29 महानगर पालिकाओं के चुनाव के आरंभ में जिस प्रकार राजनीति के दांव-पेंच खेले गए, उसी के जवाब महापौर के चुनाव में मिले. मुंबई, नागपुर, पुणे मनपा को सबसे अधिक प्रतिष्ठा की नजर से देखा गया.
यहां तक कि शिवसेना के ठाकरे गुट का पूरा ध्यान मुंबई और आस-पास केंद्रित था. मगर पहले चुनाव परिणाम और बाद में महापौर के चयन ने स्थानीय राजनीति को राज्य से जोड़ने तथा एक समान बनाने के प्रयास सिरे से ठुकरा दिए. मोहल्ले की राजनीति को गली-कूचों में ही समझने का संदेश दिया. बीते लगभग दो साल में महाराष्ट्र ने देश से लेकर पास-पड़ोस तक का चुनाव देखा और सक्रिय भागीदारी निभाई.
वर्ष 2024 में जब लोकसभा का चुनाव हुआ, तब संविधान बदलने के मुद्दे को गर्माया गया. विपक्ष ने भाजपा के खिलाफ ‘इंडिया’ गठबंधन बनाकर नई रणनीति पर चलने का शंखनाद किया, जिसमें उसे सफलता भी मिली. उसने भाजपा के लगातार बढ़ते ग्राफ को रोक दिया. उस समय भाजपा को लोकसभा में जीत के लिए सीटों के लक्ष्य पर ‘अबकी बार 400 पार’ का नारा देना भारी पड़ा.
महाराष्ट्र में 23 सीटें जीतने वाली भाजपा नौ सीटों पर आ गई. हालांकि इस दौरान राज्य में दलीय स्तर पर अनेक विभाजन और गठबंधन की स्थितियां बदल गई थीं. मगर चुनाव परिणाम संविधान बदलने की सोच से जोड़कर देखे गए. कुछ हद तक भाजपा ने अपनी गलती और कमजोरी को स्वीकार कर विधानसभा चुनाव की तैयारी की. इस बार मामला जातीय समीकरणों में उलझ गया.
एक तरफ मराठा आरक्षण आंदोलन और दूसरी तरफ अन्य पिछड़ा वर्ग का गुस्सा राज्य की महागठबंधन सरकार के लिए परेशानी का कारण था. इस बार चुनाव में कट्टर हिंदुत्व और लाड़ली बहन योजना से महिला मतों को एकतरफा कर चुनाव जीत लिया गया. चुनाव के बाद लोकसभा चुनाव की पराजय का हिसाब चुकता हुआ. दोनों के बाद स्थानीय निकायों के चुनावों की प्रतीक्षा की गई, जो कई साल से लंबित थे.
स्पष्ट था कि राज्य का विपक्ष विधानसभा चुनाव की पराजय से उबरने का प्रयास करेगा. उसने शुरुआत क्षेत्रीय अस्मिता और भ्रष्टाचार के आरोपों से की. किंतु दोनों ही मुद्दों को अधिक समय तक जीवित रखना संभव नहीं हुआ. नगर परिषद और नगर पंचायत के चुनावों में भाजपा के नेतृत्व में भगवा गठबंधन आगे रहा.
इसी के बाद महानगर पालिका चुनाव की घोषणा हुई, जिनमें विपक्ष ने नप चुनाव का पुराना राग कुछ और तेज आवाज में सुनाया. बड़े शहरों के बदलते सामाजिक ढांचे को मराठी मानुस से जोड़ने की कोशिश की. किंतु हर क्षेत्र की चुनावी हवा अपनी तरह चली. तय कर उछाले मुद्दे अपनी जगह रहे और क्षेत्रीय ताकतों- समीकरणों ने नतीजे तय कर दिए.
बावजूद इसके स्थानीय निकायों के चुनाव में जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के भविष्य में होने वाले नतीजों को लेकर आवाज उठाई गई थी, वहां निकायों के मुखिया तक पर नजर थी. इस क्रम में मुंबई, नासिक, पुणे, नागपुर, मालेगांव, नांदेड़, छत्रपति संभाजीनगर और परभणी में महापौर के चयन ने सभी किस्म की चिंताओं को दूर करने का प्रयास किया.
बीएमसी की महापौर ऋतु तावड़े ने मुंबई में मराठी अस्मिता से जुड़ी चिंताओं को दूर किया, जबकि नागपुर में नीता ठाकरे को महापौर बनाकर मुंबई की ‘ठाकरेशाही’ को राज्य के दूसरे सिरे से संदेश दिया. मराठवाड़ा में मराठा आंदोलन की जड़ों को देखते हुए छत्रपति संभाजीनगर में समीर राजूरकर और नांदेड़ में कविता मुले को महापौर बनाया गया.
इन स्थानों पर जातिगत आरक्षण नहीं होने से जातीय राजनीति को उत्तर देने की कोशिश की गई. चंद्रपुर में कांग्रेस का सत्ता का खेल पलटा गया और मालेगांव में सत्ता पाने वाले नए दल का उदय हुआ. पुणे में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजित पवार गुट) के साथ कड़वाहट चुनाव परिणामों के साथ कम हुई और महापौर चयन में कोई प्रश्न नहीं उठे.
प्रादेशिक अस्मिता पर राजनीति के लिए कोई जगह बाकी नहीं रही. फिर भी महापौर के नाम पर संदेश देने आवश्यक थे, जो बहुत ही स्पष्ट मिल चुके हैं. धर्म-जाति-समाज की ठेकेदारी से हटकर आरक्षण के अलावा हर समाज, संप्रदाय के प्रतिनिधित्व को महत्व मिल चुका है. अवश्य ही चुनावों में समाज के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण होता है.
सामाजिक व्यवस्था अनुसार निर्वाचन प्रक्रिया में हिस्सेदारी तय की जाती है. किंतु इस बार वैमनस्य पैदा कर वोट बटोरने के नए फार्मूले को चलाने का प्रयत्न हुआ. मराठी-गैर मराठी विवाद को खड़ा करने की कोशिश हुई. मुंबई में गुजराती, दक्षिण भारतीय को अलग करने के प्रयास हुए. कभी धार्मिक विभाजन के आधार पर चुनाव लड़ने में माहिर नेताओं ने जातीय और प्रादेशिक स्तर पर विभाजन के बीज बोये.
किंतु मतदाता ने हर चिंता से ऊपर उठकर अपनी आवश्यकता अनुसार मत दिया. अब राज्य की सभी महानगर पालिकाओं के महापौर के चयन के साथ साफ हो गया है कि किसी दल ने मजबूरी में और कहीं जरूरी परिस्थितियों में समीकरण बनाए गए. उनसे सत्ताधारी दल की मुंबई से नागपुर तक की नीति साफ हुई.
विपक्ष के समक्ष नई रणनीति तैयार करने की चुनौती खड़ी हुई. फिलहाल जिला परिषद अध्यक्षों के चयन के अलावा आने वाले दिनों में कोई नए चुनाव की संभावना नहीं है. इसलिए चिंतन-मनन का अवसर है, जो संकीर्ण सोच से उबरने का अवसर भी है.