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ब्लॉग: खुशहाली के आखिर मायने क्या हैं ?

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: March 29, 2024 13:23 IST

भारतीयों के खुश न रह पाने के कई कारण हो सकते हैं। बढ़ते बलात्कार, हत्याएं, धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, बीमारियां, गरीबी, प्रदूषण, असुरक्षा, पानी की कमी, बुढ़ापा कुछ प्रमुख कारण हैं जो किसी व्यक्ति को या समाज को खुश रहने से रोकते हैं।

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ठळक मुद्देभारत में औसतन हर 16-17 मिनट में एक महिला के साथ बलात्कार होता हैइस अपराध की सूची में राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र जैसे राज्य शीर्ष पर हैंबढ़ते बलात्कार, हत्याएं, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार व्यक्ति को या समाज को खुश रहने से रोकते हैं

जिस देश में औसतन हर 16-17 मिनट में एक बलात्कार होता हो और राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र जैसे राज्य इस गंदी सूची में शीर्ष पर हों, उससे यह उम्मीद करना क्रूरता होगी कि वह संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी विश्व खुशहाली सूचकांक में एक सम्मानित स्थान हासिल करेगा लेकिन मैं भारत के लिए नाखुश हूं।

भारतीयों के खुश न रह पाने के कई कारण हो सकते हैं। बढ़ते बलात्कार, हत्याएं, धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, बीमारियां, गरीबी, प्रदूषण, असुरक्षा, पानी की कमी, बुढ़ापा कुछ प्रमुख कारण हैं जो किसी व्यक्ति को या समाज को खुश रहने से रोकते हैं।

सामूहिक रूप से, किसी समाज या राष्ट्र को खुश रहने के लिए कई कारणों और परिस्थितियों की आवश्यकता होती है ताकि लोग सही अर्थों में खुशी के साथ जीवन जी सकें। सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के हिस्से के रूप में लोगों और राष्ट्रों की मनोदशा को मापने के लिए संयुक्त राष्ट्र 2012 से ‘अंतरराष्ट्रीय खुशी दिवस’ मनाता आ रहा । कल्पना यह है कि दुनिया खुश रहे और मानव जाति की भलाई में योगदान दे।

सर्वेक्षण में शामिल 143 देशों में भारत का प्रदर्शन एक बार फिर निराशाजनक रहा, वह 126 वें स्थान पर रहा। सूची से यह भी पता चला कि अमेरिका और जर्मनी जैसे अमीर देश, जिनकी प्रति व्यक्ति आय भारत से बहुत बेहतर है, पहले 20 ‘सबसे खुशहाल’ देशों में शामिल नहीं हो सके। फिनलैंड (जनसंख्या 56 लाख) 50916 अमेरिकी डॉलर प्रति व्यक्ति आय के साथ लगातार 7 वें साल सूची में शीर्ष पर है। क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है?

फिनलैंड के बाद पहले 10 देशों में डेनमार्क, आइसलैंड, स्वीडन, इजराइल, नीदरलैंड के साथ स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रेलिया का स्थान है। यहां तक कि दशकों से खराब अर्थव्यवस्था और आंतरिक कलह से जूझ रहा पाकिस्तान भी भारत से काफी ऊपर 108 वें स्थान पर रहा है।

खुशी कहां से आती है? क्या कोई हमेशा खुश रह सकता है? क्या नकारात्मक सोच या प्रेरणा की कमी या अज्ञात का डर आपको दु:खी करता है? क्या रोजमर्रा की राजनीतिक उथल-पुथल आपके दिमाग पर विपरीत असर डालती है? भारतीय धर्मग्रंथों और वेदों ने हमें सरल, मितव्ययी और संतुष्ट जीवन जीना सिखाया है, जिसके परिणाम में खुशी मिलती है. क्या हम उसका पालन कर सकते हैं? यह थोड़ा विवादास्पद है।

व्यवहार विज्ञान विशेषज्ञ, जीवन प्रशिक्षक (लाइफ कोच) या मनोविज्ञान विशेषज्ञ खुशी की एक आम परिभाषा पेश करते हैं: यह जीवन जीने का एक तरीका है, कुछ इस तरह का, जिसे छीने जाने या हासिल करने के बजाय अनुभव किया जाना चाहिए। हम सभी ऐसे लोगों से मिले होंगे जो नीरस या जीवन और नकारात्मकता से भरे हुए दिखते हैं।

ऐसे दोस्त भी होते हैं, जो व्यक्तिगत जीवन में गंभीर समस्याओं से ग्रस्त होने के बावजूद खुशी प्रदर्शित करते हैं और, कम से कम बाहरी तौर पर, कभी-कभार ही निराश दिखते हैं। मैं ऐसे समय में आनंद के बारे में लिख रहा हूं जब भारत सबसे महत्वपूर्ण आम चुनावों से गुजर रहा है। राजनीति कई दफे व्यक्तिगत जीवन को परेशान करती है। कई अन्य लोगों की तरह, मैं भी समाज में हर जगह समस्याएं देखता हूं. क्या मैं दुखी हूं? शायद!

बलात्कार, महंगाई, बेरोजगारी, लगभग सभी विभागों में भ्रष्टाचार, घोटाले, निकृष्ट स्तर की राजनीतिक खींचतान, धांधली, सड़क पर होने वाली मौतें, जातिगत संघर्ष, अदालतों में मुकदमों का अंबार, कार्यसंस्कृति की कमी और सरकारों के कामकाज में ईमानदारी का अभाव अन्य प्रमुख कारण हैं जो खुशियां छीन लेते हैं। कुछ लोग इसके बावजूद भी आनंदित देखते हैं. उनको शुभकामनाएं।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में भारत के बारे में क्या है, पता नहीं, लेकिन वैश्विक सूचकांक कहता है कि ‘युवाओं में बढ़ती नाखुशी’ ने कई देशों को नीचे ला दिया है। फिनलैंड के बारे में ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने लिखा है कि ‘देश में मजबूत सामाजिक सुरक्षा कवच है और संगीत और खेल में लोगों के शामिल होने के अलावा प्रकृति के मनोवैज्ञानिक लाभ भी हैं।’ हाल ही में चेन्नई में आईपीएल के उद्घाटन मैच को देखते हुए मैंने हजारों युवाओं और बुजुर्गों को ‘सीएसके’ के लिए उत्साह बढ़ाते देखा।

खचाखच भरे स्टेडियम के अंदर खुश लोगों का एक बड़ा समूह था। यह खुशी के सागर में गोते लगाने का एक अवसर था, जिससे प्रशंसकों को कुछ घंटों के लिए अपने व्यक्तिगत दुखों और दर्द को दूर करने का मौका मिला होगा। फिनलैंड और ऑस्ट्रेलिया का समाज भारत से बिल्कुल भिन्न है। इसमें कोई तुलना नहीं है, लेकिन एक ‘विश्वगुरु’ का खुशहाल वैश्विक परिवार में शामिल न हो पाना मुझे और भी दुखी करता है. काश! भारत एक आनंददायी देश बन सके।

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