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ब्लॉग: वनों को बचाने के लिए तय हो कार्ययोजना

By ऋषभ मिश्रा | Updated: August 24, 2023 10:25 IST

वनों के दोहन से जैव पारिस्थितिकी पर बुरा असर पड़ रहा है। देश में वन क्षेत्रों में बढ़ोत्तरी लाने और मौजूद वनों के विकास संरक्षण व संवर्धन की दिशा में कुछ उपायों पर विचार किया जाना महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

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ठळक मुद्देवनों के दोहन से जैव पारिस्थितिकी पर बुरा असर पड़ रहा हैदेश में वन क्षेत्रों में बढ़ोत्तरी लाने और मौजूद वनों के विकास संरक्षण उपाय बेहद महत्वपूर्ण हैंसरकारों को वन क्षेत्र की न्यूनता निर्धारित करने के लिए कारगर योजनाएं बनाने की जरूरत है

वनों के दोहन से जैव पारिस्थितिकी पर बुरा असर पड़ रहा है। देश में वन क्षेत्रों में बढ़ोत्तरी लाने और मौजूद वनों के विकास संरक्षण व संवर्धन की दिशा में कुछ उपायों पर विचार किया जाना महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। इसके लिए सरकारों को वन क्षेत्र की न्यूनता निर्धारित करने और लक्ष्य प्राप्ति के लिए कारगर योजनाएं बना कर काम करने की आवश्यकता है।

सामान्य तौर पर हमारे देश में दो सौ सेंटीमीटर से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में सदाबहार चौड़ी पत्ती वाले वन और सौ से दो सौ सेंटीमीटर वर्षा वाले भागों में पर्णपाती मानसूनी वन पाए जाते हैं। इन वनों में रोजवुड, सागवान, चीड़ तथा साल के वृक्ष पाए जाते हैं। जिन वनों में पचास से सौ सेंटीमीटर वर्षा होती है, वे शुष्क वन कहे जाते हैं और इनमें बबूल, खेजड़ा जैसी कंटीली प्रजाति के वृक्ष पाए जाते हैं। पचास सेंटीमीटर से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में प्रायः अर्ध मरुस्थलीय वन पाए जाते हैं।

भारत के कुल वन क्षेत्रों में तिरानवे फीसदी उष्ण कटिबंधीय वन और सत्तासी फीसदी शीतोष्ण वन पाए जाते हैं। इसमें से 95.7 फीसदी वन राज्य सरकारों, 2.8 फीसदी निगमों और शेष डेढ़ फीसदी निजी संस्थानों के अधिकार में आते हैं।

आंकड़ों के मुताबिक भारत में कुल भू-भाग का आठ लाख सात हजार 276 वर्ग किमी अर्थात 24.56 फीसदी भाग वनों व वृक्षों से आच्छादित हैं। जबकि वास्तविक तौर पर यह वन क्षेत्र इससे कहीं कम बैठता है। भारतीय वन सर्वेक्षण के वर्ष 2019 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में वनावरण क्षेत्र सात लाख बारह हजार 249 वर्ग किलोमीटर है, जो कुल भौगोलिक भू-भाग का 21.67 फीसदी है।

राज्यों में वनों की स्थिति देखें तो इनका वितरण समान रूप से दिखाई नहीं देता। इसके मूल में कई कारण हैं। राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और गुजरात जैसे क्षेत्रों में अल्प वर्षा होने के कारण वन क्षेत्र बहुत कम है। हरियाणा व पंजाब में कृषि भूमि के विस्तार के लिए वनों का सफाया करने से वहां वन क्षेत्रों में कमी आ गई।

पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और बिहार में भी यही स्थिति है। कम वर्षा, तीव्र बंजर ढलान और हिमाच्छादित भाग की अधिकता के कारण जम्मू-कश्मीर में भी कम वन पाए जाते हैं। महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु का अधिकांश भाग वृष्टि छाया में आता है इसलिए यहां भी वनों की कमी है। आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में जिन क्षेत्रों में सघन वर्षा होती है, वहां जंगलों को साफ करके खेती की जमीन तैयार कर ली गई है।

टॅग्स :Forest Departmentपश्चिम बंगालबिहारउत्तर प्रदेशuttar pradesh
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