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भरत झुनझुनवाला का ब्लॉग: फरक्का बराज का आकार बदलने से होगा बड़ी समस्या का समाधान

By भरत झुनझुनवाला | Updated: October 6, 2019 07:24 IST

जो वर्षा 90 दिन में होती थी अब उतना ही पानी मात्न 15 दिन में गिर रहा है. इस कारण वर्षा के समय एकाएक पानी की मात्ना बढ़ जाती है और नदियों की इतनी क्षमता नहीं है कि इस अधिक पानी को वह बहाकर समुद्र तक ले जा सके.

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बिहार में आ रही बाढ़ के मूल में दो प्राकृतिक परिवर्तन हैं. पहला यह कि बंगाल का हुगली नदी का क्षेत्न भूगर्भीय दृष्टि से ऊपर उठ रहा है जिसके कारण गंगा का पानी जो पूर्व में हुगली के माध्यम से गंगासागर तक जाता था, उसने हुगली में बहना कम कर दिया था. गंगा का पानी बांग्लादेश में ज्यादा बहने लगा था.

दूसरा प्राकृतिक परिवर्तन ग्लोबल वार्मिग यानी धरती के तापमान में वृद्धि का है. इस कारण अपने देश में वर्षा का पैटर्न बदल गया है. पूर्व में वर्षा तीन महीने में धीरे-धीरे गिरा करती थी जिससे अधिक मात्ना में पानी भूगर्भ में रिसता था और नदी में एकाएक अधिक पानी नहीं आता था. अब ग्लोबल वार्मिग के चलते उतनी ही वर्षा कम दिनों में गिर रही है. जैसे, जो वर्षा 90 दिन में होती थी अब उतना ही पानी मात्न 15 दिन में गिर रहा है. इस कारण वर्षा के समय एकाएक पानी की मात्ना बढ़ जाती है और नदियों की इतनी क्षमता नहीं है कि इस अधिक पानी को वह बहाकर समुद्र तक ले जा सके.

भूगर्भीय उठान से लगभग 100 वर्ष पूर्व हुगली अक्सर सूख जाती थी. गंगा का पानी सुंदरवन की तरफ न जाने से हमारे समुद्र में गंगा की गाद नहीं पहुंचती थी. समुद्र  गाद चाहता है. जब समुद्र को गंगा से गाद कम मिलना शुरू हुई तब समुद्र ने सुंदरवन को काटना चालू कर दिया. हुगली के सूखने की समस्या से कलकत्ता एवं हल्दिया के बंदरगाहों पर जहाजों का आना-जाना बाधित हो गया. कलकत्ता का सौंदर्य जाता रहा और वहां पीने के पानी की समस्या पैदा होने लगी. इन समस्याओं का हल ढूंढने के लिए सरकार ने फरक्का बराज का निर्माण किया. 

फरक्का बराज के माध्यम से सरकार ने गंगा के आधे पानी को हुगली में डालने का कार्य किया और आधा पानी बांग्लादेश को पद्मा के माध्यम से जाता रहा. एक विशाल नहर से पानी को फरक्का से ले जाकर हुगली में डाला गया. यह नहर लगभग 40 किमी लंबी है. इस नहर में पानी डालने के लिए फरक्का बराज बनाया गया. इस बराज की ऊंचाई 10 मीटर की गई जिससे गंगा का पानी नहर में प्रवेश कर सके. ऐसा करने से हुगली में पानी बढ़ा है, हुगली पुनर्जीवित हुई है, कलकत्ता का सौंदर्य बढ़ा है और कलकत्ता तक जहाजों का आवागमन होने लगा. लेकिन बराज का एक दुष्परिणाम भी हुआ. 10 मीटर ऊंचा बराज बनाने से फरक्का के पीछे लगभग 80 किमी तक एक विशाल तालाब बन गया. 

इस तालाब में गंगा के पानी का वेग न्यून हो गया क्योंकि पानी संकरे क्षेत्र में तेज बहता है और जहां फैलकर बहता है वहां उसका वेग धीमा हो जाता है. गंगा के पानी का वेग कम होने से उसने गाद को इस विशाल तालाब में जमा करना शुरू कर दिया. फलस्वरूप, फरक्का के पीछे के तालाब का पेटा ऊंचा हो रहा है. गंगा के पानी को ले जाने की क्षमता उसी अनुपात में कम होती जा रही है.

इस परिस्थिति में हमें फरक्का बराज के आकार में परिवर्तन करने पर विचार करना चाहिए. सुझाव है कि बांग्लादेश की सरहद के पहले जहां गंगा से पुरानी हुगली नदी निकलती थी यानी मोहम्मदपुर में, वहां पर अंडरस्लूस लगा कर पानी को भागीरथी में भेजा जाए. अंडरस्लूस से एक लोहे के गेट को ऊंचा करके पानी को वांछित दिशा में धकेला जाता है. इसके विपरीत फरक्का बराज में तालाब के माध्यम से ऊपर और नीचे अलग-अलग पानी का वितरण होता है. अंडरस्लूस में नीचे से गेट आने से गाद का वितरण बांग्लादेश और भारत के बीच बराबर होगा. यदि अंडरस्लूस उठा कर हमने 50 प्रतिशत पानी को हुगली में डाला तो 50 प्रतिशत गाद भी हुगली में आएगी क्योंकि अंडरस्लूस के पीछे तालाब नहीं होता है. ऐसा करने से बांग्लादेश और सुंदरवन दोनों की समस्या हल हो जाएगी.  

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