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अभय कुमार दुबे का ब्लॉग: चुनावी संभावनाओं को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश करती भाजपा

By अभय कुमार दुबे | Updated: November 23, 2021 10:10 IST

भाजपा को उम्मीद है कि कृषि कानून वापस लेने वाले फैसले के बाद किसान आंदोलन के प्रभाव वाले इलाकों में उसे एक बार फिर खोई हुई जमीन प्राप्त करने का मौका मिलेगा.

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पिछले छह महीनों में मैंने बार-बार कहा है कि भारत की राजनीति में जब नेता को अपने वोट कम होते हुए लगते हैं तो वह सत्ता और समर्थन बचाने के लिए किसी भी तरह का शीर्षासन करने के लिए तैयार हो जाता है. 

इस समय भाजपा सरकार ऐसा ही कर रही है. वह पेट्रोलियम पदार्थो के दाम कम करके महंगाई रोकने की कोशिश में लगी है, और अब किसान आंदोलन को समाप्त करने की उसकी रणनीतिक पहलकदमी सरकार की बेचैनियों की चुगली खा रही है. 

क्या पिछले साढ़े सात साल में इस सरकार ने कभी ऐसे संकट का सामना किया है? कभी नहीं. बिना किसी शक के कहा जा सकता है कि सरकार के लिए यह अभी तक का सबसे ज्यादा संगीन समय है. सरकार को यह भी डर है कि महंगाई और किसान आंदोलन के कारण अगर भाजपा के वोट गिरे तो वह केंद्र सरकार के खिलाफ एंटीइनकंबेंसी होगी. इसका असर 2014 के लोकसभा चुनाव तक जा सकता है.

मोदी कृषि कानूनों को वापस लेने का कदम उठा सकते हैं-इस संभावना की चर्चा समीक्षकों के बीच उस समय से हो रही है जब से अमरिंदर सिंह कांग्रेस से अलग होने के बाद दिल्ली आकर अमित शाह से मिले थे. दोनों के बीच किसान आंदोलन पर ही बात हुई थी. सरकार से हमदर्दी रखने वाले टीवी चैनलों ने तुरंत कार्यक्रम करने शुरू कर दिए थे कि क्या अमरिंदर सिंह किसान आंदोलनकारियों के बीच अपनी साख के चलते सरकार के साथ आंदोलन की बातचीत को नए मुकाम तक पहुंचा सकते हैं? जब आंदोलनकारियों के सामने यह सवाल रखा गया तो उन्होंने कहा था कि अगर कोई मध्यस्थता करके हमारी तीनों मांगें  पूरी करने के लिए सरकार को मना सकता है तो इसमें बुरी बात क्या है.

हो सकता है कि भाजपा के रणनीतिकार पहले से इस बारे में सोच रहे हों, लेकिन यह स्पष्ट था कि एक बहुत बड़े इलाके में चुनावी नुकसान के अंदेशे  प्रबल होते जा रहे थे. साथ ही वह सामुदायिक समीकरण भी बिगड़ता जा रहा था जो भाजपा ने राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता के मिश्रण के जरिये तैयार किया था. 

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुसलमान किसानों और जाट-गूजर किसानों के बीच की पारंपरिक एकता (जिसके कारण चौधरी चरण सिंह की राजनीति परवान चढ़ी थी, और जिसके टूटने के कारण भाजपा इस क्षेत्र में एक के बाद एक तीन चुनाव जीत सकी थी) को तोड़ने वाला यह समीकरण किसान आंदोलन के प्रभाव के कारण लौटकर अपनी पुरानी स्थिति यानी सांप्रदायिक एकता की स्थिति में आ गया था. भाजपा और संघ के लिए यह खासतौर से चौंकाने वाली बात होनी चाहिए थी. कारण यह कि जहां-जहां हिंदुत्ववादियों ने सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने के  प्रयोग किए हैं, वहां कभी दोबारा सांप्रदायिक एकता नहीं बन सकी. एक बार समाज में दरार पड़ गई तो वह फिर कभी नहीं भर पाई. यह पहली बार पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ही हुआ है. ऐसा किसान आंदोलन संघ के प्रोजेक्ट के लिए बहुत नुकसानदेह हो सकता था.

दूसरे, चुनावी रणनीति से परे जाकर अगर दीर्घकालीन नजरिये से परिस्थिति का आकलन किया जाए तो किसान आंदोलन का जबरदस्त टिकाऊपन संघ परिवार की उस  परियोजना का प्रभावी प्रतिकार बनता जा रहा था जिसे मैं ‘आज्ञा पालक समाज’ बनाने की परियोजना कहता हूं. संघ परिवार चाहता है कि लोकतांत्रिक राजनीति से संघर्ष के सभी  पहलू समाप्त कर दिए जाएं. 

नागरिक पांच साल में एक बार वोट डालने वाले बनकर रह जाएं. लोकतंत्र केवल मात्रत्मक और तकनीकी रह जाए. उसकी जीवंतता, बहस-मुबाहसे और उसके जरिए राजनीति की संसाधित करने की उसकी क्षमता को अस्वीकार कर दिया जाए. प्रधानमंत्री इस बात को बार-बार कहते रहे हैं कि चुनी हुई सरकार के खिलाफ आंदोलन नहीं चलाना चाहिए. 

अभी हाल में उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने नागरिक समाज को एक नए युद्ध के केंद्र की तरह परिभाषित करके सभी को चौंका दिया है. नागरिक समाज सरकार को पसंद हो या न हो, वह है तो इसी देश और समाज का अंग. क्या भारत की सरकार अपने ही देशवासियों के एक हिस्से के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर सकती है.

भाजपा को उम्मीद है कि कृषि कानून वापस लेने वाले फैसले के बाद किसान आंदोलन के प्रभाव वाले इलाकों में उसे एक बार फिर खोई हुई जमीन प्राप्त करने का मौका मिलेगा. लेकिन, इसके लिए उसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक कार्ड खेलना  पड़ेगा. लेकिन अपनी ही सरकार होने के कारण उसे यह हथकंडा आजमाने की वह सुविधा नहीं प्राप्त हो  पाएगी जो 2013 में कांग्रेस की केंद्र में और राज्य में समाजवादी पार्टी की सरकार होने के कारण मिल सकी थी.

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