International Epilepsy Day: हर वर्ष फरवरी के दूसरे सोमवार को ‘अंतरराष्ट्रीय मिर्गी दिवस’ मनाया जाता है, जो इस वर्ष नौ फरवरी को वैश्विक स्तर पर मनाया जाएगा. यह केवल एक स्वास्थ्य-दिवस नहीं बल्कि उस मानवीय संघर्ष की सामूहिक अभिव्यक्ति है, जिसे दुनियाभर में करोड़ों लोग प्रतिदिन जीते हैं. मिर्गी एक ऐसी चिकित्सीय स्थिति है, जो शरीर से अधिक समाज के व्यवहार से पीड़ित करती है. इसी गहरे यथार्थ को सामने लाने के लिए यह दिवस मनाना शुरू किया गया ताकि मिर्गी के प्रति फैली भ्रांतियों, भय और कलंक को तोड़ा जा सके और इसे एक सामान्य न्यूरोलॉजिकल स्थिति के रूप में स्वीकार किया जा सके. इस दिवस का आयोजन इंटरनेशनल ब्यूरो फॉर एपिलेप्सी और इंटरनेशनल लीग अगेंस्ट एपिलेप्सी के संयुक्त प्रयासों से वर्ष 2015 में प्रारंभ हुआ था.
तब से यह जागरूकता का प्रतीक बन गया है. इस समय दुनियाभर में सात करोड़ से अधिक लोग मिर्गी रोग से पीड़ित हैं और इनमें 1.2 करोड़ से भी ज्यादा लोग हमारे देश में हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी प्रचलन दर 1.9 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 0.6 प्रतिशत है. मिर्गी एक दीर्घकालिक मस्तिष्क संबंधी विकार है, जिसमें व्यक्ति को बार-बार दौरे पड़ते हैं.
ये दौरे मस्तिष्क में अचानक उत्पन्न होने वाली अनियंत्रित विद्युत गतिविधि के कारण होते हैं. इसका प्रभाव हर व्यक्ति में अलग-अलग रूप में दिखाई दे सकता है, किसी में हल्का कुछ सेकेंड का शून्य भाव तो किसी में पूरे शरीर में तीव्र झटके और बेहोशी. यह स्थिति किसी भी उम्र में हो सकती है और यह न तो संक्रामक है, न ही किसी पाप, अभिशाप या मानसिक कमजोरी का परिणाम.
इसके बावजूद, मिर्गी के साथ जीने की सबसे बड़ी चुनौती चिकित्सा नहीं, सामाजिक व्यवहार है. भय, अज्ञानता और मिथकों के कारण मिर्गी से पीड़ित व्यक्ति को अक्सर अलग-थलग कर दिया जाता है. समाज में यह गलत धारणा आज भी मौजूद है कि मिर्गी व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता, कार्यक्षमता या विश्वसनीयता को कम कर देती है.
इसी सोच का परिणाम है कि बच्चों को स्कूल में उपेक्षा झेलनी पड़ती है, युवाओं को नौकरी में अवसर नहीं मिलते और वयस्कों को विवाह व सामाजिक स्वीकृति में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. अंतर्राष्ट्रीय मिर्गी दिवस हमें याद दिलाता है कि मिर्गी का सही इलाज संभव है और लगभग 70 प्रतिशत मामलों में उचित दवाओं से दौरे नियंत्रित किए जा सकते हैं.