भारत के जंगल केवल हरियाली नहीं बल्कि देश की पारिस्थितिक सुरक्षा का जीवंत कवच हैं. वे हमारी नदियों की जन्मस्थली हैं, हमारी जलवायु के प्राकृतिक नियामक हैं और हमारे अस्तित्व के मौन प्रहरी हैं. लेकिन आज यही ‘ग्रीन लंग्स’ राख में बदलते जा रहे हैं. सर्दियों में भी उत्तराखंड और हिमाचल की बर्फीली वादियों में उठती आग की लपटें और उसी समय पश्चिमी घाट के घने वनों में फैलती दावानल की खबरें यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि भारत का वन संकट अब मौसमी नहीं रहा बल्कि यह बारहमासी आपदा बन चुका है.
15 फरवरी से उत्तराखंड में आधिकारिक फायर सीजन शुरू हो गया है परंतु सच्चाई यह है कि इस बार आग जनवरी में ही प्रचंड रूप में दस्तक दे चुकी थी. पिछले दिनों सबसे चौंकाने वाली घटना चमोली जिले की भ्यूंडार वैली में सामने आई, जो विश्वप्रसिद्ध वैली ऑफ फ्लॉवर्स का हिस्सा है.
ढाई हजार से तीन हजार मीटर की ऊंचाई पर, जहां सामान्यतः सर्दियों में तापमान शून्य से नीचे रहता है और मानव गतिविधि नगण्य होती है, वहां छह दिन तक आग धधकती रही. पिछले पच्चीस वर्षों के रिकॉर्ड में उत्तराखंड में इतनी ऊंचाई पर आग लगने की घटना लगभग असंभव मानी जाती थी.
यह क्षेत्र बुग्यालों का है, खुले घास से ढके अल्पाइन घास के मैदान, जहां सर्दियों में आग की कल्पना तक नहीं की जाती लेकिन इस वर्ष शीतकालीन वर्षा के अभाव ने घास को इतना सूखा और ज्वलनशील बना दिया कि एक चिंगारी ने पूरे परिदृश्य को जला डाला. हिमालय कोई साधारण पर्वतमाला नहीं है बल्कि भारत का ‘वाटर टावर’ है.
गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र जैसी जीवनदायिनी नदियां इसी हिमालय से निकलती हैं. जब हिमालयी जंगल जलते हैं तो उसका प्रभाव केवल स्थानीय नहीं रहता बल्कि वह करोड़ों लोगों के जल, कृषि और खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करता है. हाल के वर्षों में नंदा देवी नेशनल पार्क और उसके बफर क्षेत्रों तक आग की आंच पहुंची है.
ये क्षेत्र जैव-विविधता के खजाने हैं, जहां दुर्लभ वनस्पतियां और वन्यजीव निवास करते हैं. आग से केवल पेड़ नहीं जलते, मिट्टी की ऊपरी जैविक परत भी नष्ट हो जाती है, जिससे वर्षा का पानी जमीन में समाने के बजाय बह जाता है. परिणामस्वरूप मानसून में भूस्खलन की घटनाएं बढ़ जाती हैं, नदियों में गाद भरती है और बांधों की आयु घटती है. यह एक दीर्घकालिक पारिस्थितिक पतन की शुरुआत है.
इस संकट का वैज्ञानिक पक्ष और भी भयावह है. वनाग्नि से उत्पन्न ब्लैक कार्बन वायुमंडल में फैलकर हिमालयी ग्लेशियरों पर जम जाता है. गंगोत्री ग्लेशियर और यमुनोत्री ग्लेशियर जैसे प्रमुख ग्लेशियरों पर जमा यह काला कार्बन ‘अल्बेडो प्रभाव’ को कमजोर कर देता है.
सामान्यतः बर्फ सूर्य की किरणों को परावर्तित करती है परंतु जब उसकी सतह गहरी हो जाती है तो वह अधिक ऊष्मा अवशोषित करती है. इससे ग्लेशियर पिघलने की दर बढ़ती है, नदियों का प्रवाह असंतुलित होता है और तापमान में वृद्धि का दुष्चक्र तेज हो जाता है.