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दूषित पेयजल से महामारी बनता टाइफाइड

By पंकज चतुर्वेदी | Updated: February 13, 2026 07:07 IST

अध्ययन के मुताबिक छह महीने से चार साल तक के बच्चों में अस्पताल में भर्ती होने और मृत्यु का जोखिम सबसे ज्यादा पाया गया.

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पहले तो अत्यधिक थकान और सुस्ती महसूस हो रही थी, फिर बुखार के साथ-साथ तेज सिरदर्द और मांसपेशियों में दर्द शुरू हो गया. घर में रखी दवा बगैर डॉक्टर की सलाह के खा ली तो भूख लगना ही बंद हो गया और उल्टी-दस्त सा लगने लगा. लक्षण तो टाइफाइड के थे लेकिन पहली बार टेस्ट में उसकी पुष्टि हुई नहीं. फिर जांच करवाई तो पता चला आंतों में साल्मोनेला टाइफी नामक बैक्टीरिया ‘बाइनरी विखंडन’ प्रक्रिया के जरिए तेजी से बढ़ रहा है और मियादी बुखार या टाइफाइड इस हाल में है कि मरीज को ठीक होने में कम से कम एक महीना लगेगा.

आजकल टाइफाइड के लगभग सारे मरीजों से ऐसी ही कहानी सुनने को मिल रही है. भारत में महानगरों से दूरस्थ गांवों तक टाइफाइड एक बड़ी महामारी के रूप में फैलता जा रहा है और दु:खद यह है कि इससे निपटने के लिए कोई विशेष अभियान नहीं बनाया गया.

वर्ष 2023 के आंकड़े बताते हैं कि देशभर में इस महामारी के 49 लाख से अधिक मामले  सामने आए, जबकि 7850 लोगों की मौत हो गई. इनमें से लगभग 29 फीसदी 3.21 लाख बच्चे थे. आंकड़ों के अनुसार पांच साल से कम आयु के करीब 3.21 लाख बच्चों को टाइफाइड के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया, जो कुल भर्ती मरीजों का 44 फीसदी है. इस आयु वर्ग के 2600 बच्चों की मौत हो गई.

वहीं पांच से नौ साल के करीब 2.65 लाख बच्चों को टाइफाइड के कारण अस्पताल में भर्ती करना पड़ा और लगभग 2900 बच्चों की जान गई. अध्ययन के मुताबिक छह महीने से चार साल तक के बच्चों में अस्पताल में भर्ती होने और मृत्यु का जोखिम सबसे ज्यादा पाया गया.

यह खुलासा लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन, क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर  समेत कई संस्थानों के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए गहन शोध में हुआ. सर्विलांस फॉर एंटरिक फीवर इन इंडिया (2017-2020), ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज 2021 और जुलाई 2025 तक प्रकाशित अध्ययनों की समीक्षा से तैयार ये अध्ययन विश्व प्रसिद्ध जर्नल ‘द लैंसेट’ में ‘रीजनल हेल्थ : साउथ ईस्ट एशिया’ के तरह प्रकाशित हुए हैं.

एक बात और, तीन राज्यों- दिल्ली, महाराष्ट्र और कर्नाटक में इसका प्रकोप अधिक है. यहां बीमारी के कुल मामलों के 29 प्रतिशत मरीज पाए गए. इन राज्यों में न सिर्फ संक्रमण ज्यादा दर्ज किया गया है, बल्कि एंटीबायोटिक प्रभावहीन रहने और मरने वालों की संख्या भी अधिक रहने की बात सामने आई है. हालात दो कारणों से भयावह हो रहे हैं, एक तो इस बीमारी के मूल कारक दूषित पेयजल और भोजन पर कोई नियंत्रण नहीं हो पा रहा, दूसरे, इस बीमारी का रामबाण इलाज कही जाने वाली  एंटीबायोटिक दवाएं तेजी से बेअसर होती जा रही हैं. बच्चों में संक्रमण और मृत्यु दर अधिक होने से यह संकट और गहरा हो गया है.

हाल ही में इंदौर में दूषित पेयजल से बहुत सी मौतें हुईं. उसी दौरान गुजरात के गांधीनगर में भी दूषित पेयजल से सैकड़ों लोग बीमार हुए और ये सभी टाइफाइड के ही शिकार थे. शहरी आबादी के बीच पानी की गुणवत्ता और स्वच्छता व्यवस्था खराब होना इस बीमारी के प्रसार का बड़ा कारण है. टाइफाइड एक बैक्टीरियल संक्रमण है, जो मुख्य रूप से गंदे पानी और दूषित भोजन से फैलता है. महानगरों में बढ़ती जनसंख्या का दबाव, पुरानी और जर्जर पेयजल पाइपलाइनें, और सीवरेज सिस्टम का पेयजल लाइनों के साथ मिलना इस संक्रमण को घर-घर पहुंचा रहा है.

जब देश तेजी से शहरीकरण की तरफ बढ़ रहा है और अधिकांश शहरीकरण अनियोजित है तो पीने का साफ पानी एक बड़ी समस्या है. इसके साथ ही बगैर गुणवत्ता के सड़क के किनारे धूल और गंदगी में खुल रहे खाने-पीने के स्टाल बीमारी के प्रसार में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं.

यदि समय रहते दवा-प्रतिरोध, साफ पानी और स्वच्छता पर तत्काल ध्यान नहीं दिया गया तो स्थिति और भी गंभीर हो सकती है. इस संकट से निपटने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है. एक तो इस रोग से बचने के लिए टाइफाइड कॉन्जुगेट वैक्सीन (टीसीवी) को राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में प्रभावी ढंग से शामिल करना होगा, ताकि बच्चों को संक्रमण के शुरुआती चरण में ही सुरक्षा मिल सके.

फिर ‘हर घर जल’ या शहरों में ‘अमृत’ योजना के अंतर्गत अधिक लोगों तक पानी पहुंचाने के आंकड़े बढ़ाने से बेहतर होगा कि अभियानों को केवल पाइप पहुंचाने तक सीमित न रखकर, पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच और पाइपलाइनों के रखरखाव पर जोर दिया जाए. इसी तरह सड़क किनारे हो या बड़े रेस्टोरेंट, भोजन की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कड़े नियम और सतत निरीक्षण करना होगा. बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक दवाओं की खरीद-बिक्री पर सख्त नियंत्रण की आवश्यकता है. डॉक्टरों और मरीजों, दोनों को दवाओं के विवेकपूर्ण उपयोग के प्रति जागरूक करना होगा.

टाइफाइड के बढ़ते आंकड़े भारत के लिए एक बड़ी चेतावनी हैं. यह बीमारी केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य का विषय नहीं, बल्कि एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुकी है. दवाओं का बेअसर होना हमें उस दौर की ओर ले जा रहा है जहां सामान्य बीमारियां महामारी का रूप ले लेती थीं. हमें यह समझना होगा कि स्वच्छता और साफ पानी पर किया गया निवेश भविष्य में इलाज पर होने वाले भारी खर्च और जान-माल के नुकसान से कहीं सस्ता है. सरकार, समाज और चिकित्सा जगत को मिलकर इस ‘मियादी संकट’ का समाधान खोजना होगा, अन्यथा हमारी अगली पीढ़ी एक ऐसे भविष्य में कदम रखेगी जहां दवाएं तो होंगी, लेकिन वे बेअसर होंगी.

टॅग्स :Water Resources and Public Health Engineering DepartmentIndiaHealth and Family Welfare Department
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