इसमें कोई दो-राय नहीं होनी चाहिए कि दसवीं-बारहवीं बोर्ड की परीक्षाओं के आयोजन के पहले राज्य सरकार गंभीर रुख अपनाती है. वह नकल के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति को अमल में लाने के लिए कहती है. शिक्षा संस्थाओं में बनाए गए परीक्षा केंद्र और शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी देती है. यहां तक कि मान्यता स्थायी रूप से निरस्त करने से लेकर नकल करने में मदद करने वाले शिक्षकों और कर्मचारियों को बर्खास्त करने की बात भी कहती है. इस कार्य में राज्य के सभी जिलाधिकारियों, पुलिस अधिकारियों को कार्रवाई करने के लिए तैयार किया जाता है.
संवेदनशील परीक्षा केंद्रों पर ड्रोन और वीडियो कैमरे से निगरानी की जाती है. मगर होता वही है, जो हर साल होता है. परीक्षा केंद्र बिंदास दिखाई देते हैं. उनमें खुलेआम नकल होती है. शिक्षक भी सहायता करते मिलते हैं. परीक्षा केंद्र के बाहर पर्चे लीक होते हैं. विदर्भ हो या मराठवाड़ा या फिर खानदेश, राज्य के ज्यादातर स्थानों पर तस्वीर एक जैसी दिखती है.
एक के बाद एक मामले सामने आने से राज्य सरकार या प्रशासन नकल रोकने में बेबस नजर आता है. फिलहाल राज्य में नकल के करीब सात सौ मामले दर्ज किए जा चुके हैं. अकेले वाशिम जिले के प्रकरण में करीब छह सौ विद्यार्थी नकल करते पकड़े गए हैं. ये सभी परीक्षा आयोजन में गंभीरता की कमी को तो दिखाते ही हैं, साथ में नकल के प्रति शिक्षकों और विद्यार्थियों का आत्मविश्वास भी दिखाते हैं. पिछले सप्ताह राज्य के वाशिम में बारहवीं के भौतिकी विषय की परीक्षा के दौरान 581 छात्र सामूहिक नकल करते पकड़े गए. परीक्षा में गड़बड़ी का राज्य में यह चौथा बड़ा मामला था.
इससे पहले छत्रपति संभाजीनगर जिले के केंद्र में सामूहिक नकल का वीडियो सामने आने पर 24 लोगों के खिलाफ कार्रवाई हुई थी. बीड़ जिले में 17 लोगों के विरुद्ध मामले दर्ज किए गए. जलगांव जिले में 11 विद्यार्थियों को नकल करते रंगेहाथ पकड़ा गया. बाद में मामला रफा-दफा कर दिया गया.
शिक्षा संभागवार अभी तक पुणे में 34, नागपुर में 22, मुंबई में 10, लातूर में 27, संभाजीनगर में 32 और नासिक में 5 नकल के मामले दर्ज हुए. उधर, नागपुर में बारहवीं कक्षा के रसायन-शास्त्र का प्रश्न-पत्र परीक्षा शुरू होने के बाद वाट्सएप ग्रुप पर पाया गया. वहीं, जालना में दसवीं की परीक्षा के पहले दिन ही मराठी भाषा का प्रश्न-पत्र 15 मिनट के भीतर केंद्र से बाहर उपलब्ध हो गया था.
यह साफ करता है कि परीक्षा के इर्द-गिर्द नकल कराने का तंत्र कितनी मजबूती से काम करता है. वह मिनटों में अपने उद्देश्य को सफल बना लेता है, जिसे विफल करने के लिए सरकार और प्रशासन कई दिन तक प्रयास करते हैं. स्पष्ट है कि यह बिना मिलीभगत के संभव नहीं है. अक्सर इसका दोष कोचिंग कक्षाओं को दिया जाता है, लेकिन वे विद्यार्थियों से फीस लेकर साल भर पढ़ाई तो करवाती हैं.
हालांकि अच्छे परिणामों की चिंता में कई बार अनुचित कार्यों का सहारा भी लेती हैं. किंतु दसवीं-बारहवीं के अनेक स्कूलों में विद्यार्थी देखे तक नहीं जाते हैं. उनका ज्यादातर समय ट्यूशन और कोचिंग में गुजरता है. उनमें दर्ज कहीं अलग स्थान पर पढ़ने जाने वाले कुछ अन्य विद्यार्थी किस भरोसे पर परीक्षाओं को देने आ जाते हैं! निश्चित ही परीक्षा केंद्रों का विश्वास उन्हें बिना पढ़े प्रश्न-पत्र हल करने की हिम्मत दिलाता होगा.
अब समस्या यह है कि यदि विद्यार्थियों को ‘सही’ परीक्षा केंद्रों के बारे में पता है तो सरकार या प्रशासन के पास पहले से उनकी जानकारी क्यों नहीं पहुंचती है? सीसीटीवी कैमरे लगाए जाने के बावजूद वीडियो वायरल होने तक कार्रवाई नहीं होने का भरोसा कौन जगाता है? बीड़ जिले में एक छत पर टेंट लगाकर परीक्षा केंद्र बना दिया जाता है.
बाद में उसके दृश्य सामने आने पर कार्रवाई होती है. यह अचानक संभव नहीं है. यह शिक्षा विभाग की जानकारी के बिना नहीं हो सकता है. इससे स्पष्ट होता है कि बेरोकटोक परीक्षा आयोजन के लिए हर तरफ से हरी झंडी मिली हुई है. दिखावा मात्र के लिए नकलमुक्त परीक्षा की घोषणा होती है. पिछले अनेक वर्षों से राजस्व विभाग की सहायता लेने के बावजूद नकल अपनी जगह चलती रहती है.
उपलब्धि के नाम पर चंद आंकड़ों से पीठ थपथपा ली जाती है, जो परीक्षा आयोजनों को औपचारिकता बनाने का भी संकेत देती है. किसी भी विद्यार्थी के जीवन की शैक्षणिक और पेशेवर प्रगति में दसवीं और बारहवीं की परीक्षा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. जिसे देखते हुए अनेक संस्थाओं में विद्यार्थियों को तैयार किया जाता है.
राज्य में पश्चिम महाराष्ट्र और कोंकण शिक्षा संभाग परिणामों में सबसे अलग नजर आते हैं. मराठवाड़ा और विदर्भ हमेशा ही पीछे देखे जाते हैं. स्पष्ट है कि अध्ययन-अध्यापन की नींव ही कुछ इस तरह रख दी जाती है कि जिससे मुश्किल भरी परीक्षा में धराशायी होने का डर रहता है. इसलिए आसान मार्ग की तलाश की जाती है, जिसके लिए पूरा सहायता तंत्र तैयार हो जाता है.
नकल के आगे सबकी अकल विफल हो जाती है. यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति स्पर्धा के काल में विद्यार्थियों के लिए घातक बन चुकी है. आज योग्यता का अर्थ केवल मार्कशीट-डिग्री-डिप्लोमा न होकर परिणामदायक शिक्षा हो चला है, जिसमें कागजी तौर पर परीक्षा उत्तीर्ण करने का कोई अर्थ रह नहीं जाता है. जिसे पेपर लीक करने वालों से लेकर नकल करने और कराने वालों दोनों को समझना होगा.
हालांकि उन्हें अपनी करनी का नुकसान कभी जल्दी तो कभी देरी से भुगतना ही पड़ता है. दूसरी ओर सरकार या प्रशासन अपनी एक जिम्मेदारी के अनुसार सुचारु व्यवस्था तथा कार्रवाई सुनिश्चित करते हैं, लेकिन अंतिम परिणाम विद्यार्थी का होता है. जिसका सीधा संबंध समय से होता है, जो कभी वापस नहीं आता है.