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Ashok Kharat Case: बाबा-बैरागी राजनीतिक कमजोरी या मजबूरी

By Amitabh Shrivastava | Updated: March 21, 2026 05:20 IST

Ashok Kharat Case:शोर मचाने में सबसे आगे शिवसेना ठाकरे गुट की नेता सुषमा अंधारे और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी(राकांपा) अजित पवार गुट की नेता रूपाली ठोंबरे हैं.

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ठळक मुद्देAshok Kharat Case: खरात के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के साथ भी फोटो हैं.Ashok Kharat Case: महिला से जुड़ा है, इसलिए उनके खिलाफ आवाज उठना स्वाभाविक है.Ashok Kharat Case: खिलाफ आवाज उठाने में कोई भी अवसर छोड़ती नहीं हैं.

Ashok Kharat Case: नासिक की सिन्नर तहसील के मिरगांव स्थित श्री ईशान्येश्वर मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष और ‘ज्योतिषी’ कैप्टन अशोक खरात का एक बलात्कार के आरोप के बाद गिरफ्तार हो जाना आश्चर्यजनक नहीं है. आम तौर पर राज्य में धार्मिक संस्थाओं के तथाकथित गुरु-चेलों के खिलाफ शिकायत मिलने पर कार्रवाई होती ही रहती है. ताजा मामला अधिक गंभीर कुछ इसलिए हो चला है, क्योंकि खरात को मानने वालों में ट्रस्ट की सदस्य रूपाली चाकणकर भी हैं, जो राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष हैं. चूंकि मामला एक महिला से जुड़ा है, इसलिए उनके खिलाफ आवाज उठना स्वाभाविक है.

हालांकि शोर मचाने में सबसे आगे शिवसेना ठाकरे गुट की नेता सुषमा अंधारे और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी(राकांपा) अजित पवार गुट की नेता रूपाली ठोंबरे हैं. दोनों ही नेता चाकणकर की घोर विरोधी हैं. वह उनके खिलाफ आवाज उठाने में कोई भी अवसर छोड़ती नहीं हैं. दूसरी ओर खरात के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के साथ भी फोटो हैं.

संभव है कि उनसे मिलने वाले अनेक नेताओं के फोटो मिल जाएं. कुछ के नहीं मिलें तो कृत्रिम मेधा (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-एआई) के सहारे फोटो बनाकर सोशल मीडिया पर दिखाए जा सकते हैं. परंतु आध्यात्मिक संस्थाओं और राजनीतिक दलों के नेताओं का मिलना-जुलना कभी आश्चर्यजनक नहीं माना गया. अनेक बार अपरिहार्य तक बताया गया.

बावजूद इसके कि धार्मिक-आध्यात्मिक नेताओं में अधिकतर विवादों में घिरे रहे हैं. फिर ताजा मामला राजनीतिक या महिलाओं की सुरक्षा पर उठता गंभीर तथा उचित प्रश्न है. भारत का संविधान धार्मिक से लेकर व्यक्तिगत आस्था तक हर व्यक्ति को स्वतंत्रता प्रदान करता है. जिसके अनुसार देश में अनेक धर्म, पंथ, संप्रदाय, संस्था-संस्थान अपना कार्य सरलता और सुगमता से कर रहे हैं.

इनके अपने-अपने स्तर और प्रमुख हैं. कुछ स्पर्धा में रहते हैं और कुछ चर्चा में रहते हैं. अनेक पर अंधविश्वास फैलाने के आरोप लगते हैं और कई अपने विश्वास के सहारे लोगों में अपना महत्व बनाए रखते हैं. चूंकि इनका संबंध एक समाज के बड़े वर्ग से होता है और कुछ भविष्य वक्ता- दिव्य दृष्टा होने का दावा भी करते हैं, लिहाजा उनके पास अनिश्चितता में जीने वालों का जमावड़ा लगा होता है.

कभी तीर और कभी तुक्का लग गया तो मानने वालों की संख्या में वृद्धि कोई रोक नहीं पाता है. यह सच है कि राजनीति में भविष्य जनता तय करती है, लेकिन बाबा-बैरागी नेताओं को कम सपने नहीं दिखाते हैं. यदि वह सच हुआ तो आशीर्वाद की तस्वीर फ्रेम में लगने में देर नहीं लगती है.

यह किन्हीं मामलों में नेताओं की निजी कमजोरी, आत्मविश्वास की कमी के कारण सामने आता है और कुछ स्थानों पर यह राजनीतिक आवश्यकता कही जाती है. जिसका कारण छोटे-बड़े मठ-संस्थानों के हजारों-लाखों समर्थक होते हैं, जिन्हें देख मतदान का आंकड़ा तय होने लगता है. वहां संस्था प्रमुख की एक अपील अक्सर काम कर जाती है.

महाराष्ट्र में राकांपा प्रमुख शरद पवार एकमात्र ऐसे नेता हैं, जिन्होंने अपने पचास साल से अधिक के राजनीतिक सफर में शायद ही किसी आध्यात्मिक गुरु-नेता की सहायता ली हो. वैसे वह निजी तौर पर किसी दूसरे की आस्था पर सवाल नहीं खड़े करते हैं, लेकिन स्वयं सभी प्रकार के कर्मकांड से दूर रहते हैं.

उनके अलावा लगभग सभी नेता धार्मिक से लेकर जातीय स्तर तक किसी न किसी धार्मिक-आध्यात्मिक नेता की शरण में आते-जाते रहते हैं. इस प्रक्रिया में दलीय स्तर पर कार्यकर्ताओं की भी बड़ी भूमिका रही है. एक तरफ नेता की आस्था और दूसरी तरफ कार्यकर्ता के विश्वास की चिंता असली और ढोंगी बाबा का अंतर समझने का अवसर नहीं देती है.

चुनाव से लेकर सरकार बनने तक न जाने कितने स्थानों पर शीश झुकाना पड़ता है. सत्ता में आने के बाद तक भविष्य की चिंता में चक्रव्यूह बना रहता है. इस स्थिति में धार्मिक नेताओं की विश्वसनीयता, नीयत और चरित्र का न कोई पैमाना तय होता है, न ही कोई प्रमाण-पत्र सामने मिलता है. सब कुछ किस्मत और भरोसे पर टिका रहता है.

इसी कड़ी में ज्योतिषी खरात जैसा कोई शख्स सामने आता है, जो दर्ज अपराध से अधिक उसके राजनीतिक संबंधों के लिए चर्चित हो जाता है. अब सवाल यह है कि धीरेंद्र ब्रह्मचारी से लेकर चंद्रास्वामी और आसाराम बापू तक किस राजनीतिक दल या नेता को अलग कर बाबाओं के कारनामों की चिंता की जाए.

बाबा-बैरागी के पास जाने-आने को राजनीति की आवश्यकता, कमजोरी या मजबूरी - किस सीमा में बांधा जाए. इसे नेता से मतदाताओं की अपेक्षा माना जाए या फिर मतों की लालसा में नेता की ओर से उठाया गया कदम मान लिया जाए. यह बात भी छिपी नहीं है कि ज्यादातर मामलों में राजनीतिज्ञ ही आध्यात्मिक नेताओं के पास जाते हैं. वह यदा-कदा ही उनके पास आते हैं.

इसलिए जरूरत किसकी है, यह तय किया जा सकता है, लेकिन उससे पहले मेल-मिलाप करवाने वाले पर सवाल उठता है, जो सारा कच्चा-चिट्‌ठा अपने पास रखता है. बावजूद इसके यदि ज्योतिषी खरात के पास नेता पहुंचते हैं तो उन्हें अपने सार्वजनिक जीवन के बारे में गंभीरता से विचार करना जरूरी बन पड़ता है.

दूसरी ओर खरात के 58 वीडियो का इंतजार करने वालों को बलात्कार की रिपोर्ट की प्रतीक्षा नहीं करना चाहिए थी. बाबा-बैरागियों के मामले में कमियां और कमजोरियां ही उन्हें मनमर्जी का अवसर प्रदान करती हैं. यदि उन पर अंकुश नहीं लगा तो इस तरह के मामले का सिलसिला कभी समाप्त नहीं होगा. आज एक रूपाली चाकणकर और अशोक खरात को कठघरे में खड़ा करने से काम नहीं चलेगा.

आम जनता के हितैषियों को समाज को दूषित करने वालों की पहचान करने की समझ विकसित करनी होगी. वैसे जमीन पर संघर्ष करने वालों का भविष्य जमीनी लोग ही तय करते हैं. उन्हें किसी कपोल-कल्पनाओं पर जीने वाले के सुनाए भविष्य पर भरोसा उतना ही होता है, जितना कि शायर मिर्जा गालिब ने अपने एक शेर में कहा है-

देखिए पाते हैं उश्शाक़ बुतों से क्या फ़ैज़,इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है.

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