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रवींद्र चोपड़ा का ब्लॉग: भारतीय टीम ने पार किया आग का दरिया

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: December 31, 2018 13:26 IST

अबकी बार मेलबोर्न में जब बारिश की आशंका जताई गई तो 32 साल पुरानी याद का ताजा होना लाजमी था. शुक्र है कि बरखा रानी ने अपने तेवर नहीं दिखाए और अप्रिय इतिहास की पुनरावृत्ति नहीं हुई.

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शायद वह कसक कपिल देव को अभी भी है. 1985-86 के ऑस्ट्रेलिया दौरे में बॉक्सिंग डे टेस्ट ‘इंद्र कृपा’ की वजह से भारत जीतने से महरूम रह गया था. 126 रन के साधारण लक्ष्य का पीछा करते हुए कपिल देव की टीम को दो सत्रों में 67 रन बनाने थे और बारिश आ गई.

अबकी बार मेलबोर्न में जब बारिश की आशंका जताई गई तो 32 साल पुरानी याद का ताजा होना लाजमी था. शुक्र है कि बरखा रानी ने अपने तेवर नहीं दिखाए और अप्रिय इतिहास की पुनरावृत्ति नहीं हुई. बॉक्सिंग डे टेस्ट में विजयी पताका फहराकर टीम इंडिया ने खूबसूरत अंदाज में वर्ष 2018 को विदा किया.

पर यह जीत उतनी सरल नहीं है. मेजबान ऑस्ट्रेलियाई टीम में दिग्गज स्टीव स्मिथ और डेविड वार्नर नहीं थे लेकिन ऑसी जब अपनी सरजमीं पर खेलते हैं तो उनका रवैया भूखे भेड़िए जैसा होता है. दरअसल कुछ चीजें ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं. इसमें प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ियों से बदजुबानी, बदसलूकी, छींटाकशी शामिल हैं.

ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट संस्कृति घटिया से घटिया विकल्प चुनकर कामयाबी का मुकाम हासिल करने की शिक्षा देती है और दुनिया इस प्रवृत्ति को द. अफ्रीका के खिलाफ केपटाउन टेस्ट में देख भी चुकी है. ऑस्ट्रेलियाई अपनी हरकतों पर चाहे जितने शर्मसार दिखाई दें, चाहे जितना अफसोस जताएं  पर उनके खाने के दांत अलग और दिखाने के अलग हैं. उनके अपने उसूल हैं. अपने तौर-तरीके हैं. दर्शक भी बेहूदगी में अपने खिलाड़ियों का साथ देते हैं. बॉक्सिंग डे टेस्ट में भारतीय क्रिकेटरों को दर्शकों से नस्ली टिप्पणियों का सामना करना पड़ा.  

इसी वजह ऑस्ट्रेलिया को उसी की सरजमीं पर शिकस्त देने का मतलब है आग के दरिया को पार करना. फिर ऑसी ताकतवर हैं या कमजोर यह मायने नहीं रखता.

बहरहाल, बॉक्सिंग डे टेस्ट में जीत के साथ सिडनी टेस्ट की रोचकता भी बढ़ चुकी है. कंगारू सिडनी टेस्ट जीतकर सीरीज में बराबरी हासिल करने के लिए जी-जान लगा देंगे. ऐसे में भारतीयों को विचलित करने की रणनीति के तहत उनकी जुबान और तीखी हो सकती है लेकिन विराट कोहली उन खिलाड़ियों में से हैं जिन्हें ‘जुबानी जंग’ लड़ने का हुनर बेहतर आता है.

कोहली की विशेषता यह है कि उनका बल्ला तो बोलता ही है लेकिन मुंह भी खामोश नहीं रहता. अब तो ऑस्ट्रेलियाई भी उनका लोहा मानने लगे हैं और अपने बल्लेबाजों को भारतीय कप्तान की तरह खेलने की सलाह देने लगे हैं. ऑस्ट्रेलिया में किसी प्रतिद्वंद्वी कप्तान की सराहना भी किसी उपलब्धि से कम नहीं है. 

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