पिछले कुछ समय से अटलांटिक गठबंधन में बिखराव और आर्कटिक पर द्वंद्व के दृश्य आभासी दुनिया से लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति की भौतिक दुनिया तक में सतह के ऊपर आते दिखे. ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या वह गठबंधन (पश्चिमी), जिसकी बुनियाद दूसरे विश्व युद्ध के बाद सोवियत संघ और शीतयुद्ध के खतरों को देखते हुए रखी गई थी, अभी भी पुराने संयोजनों पर टिकी है या फिर उसकी चूलें हिल चुकी हैं? क्या पश्चिम का रणनीतिक संयोजन बिखराव के मुहाने तक पहुंच चुका है?
यदि हां तो इसके लिए दोषी किसे माना जाए-राष्ट्रपति ट्रम्प की सनक और उनके मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (मागा) को या यूरोपीय देशों की परंपरागत नीतियों और उनकी मनोदशा को? सरलतीकृत करके देखें तो पश्चिमी गठबंधन कोई एक संस्था नहीं बल्कि तीन स्तरों पर खड़ा ढांचा है जिसमें पहला स्तर सुरक्षा का है जिसे नाटो को सामने कर अमेरिका लीड करता रहा.
दूसरा आर्थिक और राजनीतिक ढांचा है जिसके मुख्य घटक यूरोपियन यूनियन (ईयू) और ‘ग्रुप सेवन’ (जी 7) हैं और कमोबेश इन्हें ही लीडर के तौर पर देखा जाता रहा है, यद्यपि यह सच नहीं है. सच तो यह है कि अमेरिका वैश्विक अर्थव्यवस्था को लीड करने का दावा सदैव करता रहा और जहां कहीं इसे चुनौती दी गई तो शक्ति द्वारा उसका ध्वंस भी किया गया!
तीसरा है- वैचारिक ढांचा जिसे मोटे तौर पर उदार लोकतंत्र, मुक्त या स्वच्छंद बाजार, नियम आधारित व्यवस्था (रूल बेस्ड ऑर्डर) से चलाया जाता है. यह एक ऐसा ट्रैंगुलर मैकेनिज्म है जिसमें साम्य स्थापित रहना जरूरी होता है. जहां से यह लड़खड़ाना शुरू होता है, वहीं से समस्या शुरू हो जाती है.
अमेरिका और यूरोप के बीच जो भी कुछ चल रहा है वह यही संकेत देता है कि यह साम्य या तो कहीं और शिफ्ट हो रहा है अथवा लड़खड़ा रहा है. यह कोई छद्म अवधारणा नहीं है बल्कि ऐसा होने के पीछे व्यावहारिक कारण हैं. गौर से देखें तो सुरक्षा का पक्ष अभी भी महत्वपूर्ण बना हुआ है.
लेकिन यदि गहराई में उतर कर देखेंगे तो सुरक्षा की साझेदारी और पुख्तापन ऊपरी तौर पर ही दिखेगा, भीतर से सब कुछ खोखला है. रही बात लोकतंत्र की तो वह भी अब इन देशों में एक जैसा और उदार नहीं रह गया है. फिर दरारें तो स्वाभाविक हैं. तो क्या पश्चिमी गठबंधन अब इतना जर्जर हो चुका है कि रिपेयरिंग संभव नहीं रह गई?
दिखता तो कुछ ऐसा ही है लेकिन उत्तर हां भी हो सकता है और शायद नहीं भी. शायद नहीं इसलिए क्योंकि कुछ विश्लेषक इसे ‘ट्रांसफार्मेशन अंडर स्ट्रेस’ का नाम दे सकते हैं, दे भी रहे हैं. यह ‘शब्द-वाक्य’ खूबसूरत है और आकर्षक भी, लेकिन हकीकत से काफी दूर. ग्रीनलैंड पर ट्रम्प राग पश्चिमी धुन के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहा.
सुर बिखरे हुए हैं और लय टूट रही है. कुछ लोग यह कह सकते हैं कि रूस-यूक्रेन युद्ध ने नाटो को सैन्य रूप से फिर मजबूत करने का कार्य किया है. अमेरिका इसे और आगे ले जाना चाहता है लेकिन वह कितना बोझ उठाए? स्वाभाविक है मतभेद बढ़ेंगे. लेकिन यहां एक प्रश्न है? क्या अमेरिका ने यूरोप को इस लायक छोड़ा भी है कि वह अमेरिका की इच्छानुसार कदम-ताल कर सके?
क्या सच में यूरो को साथ लेकर डॉलर चलना चाहता है? क्या अमेरिका कभी यह चाहेगा कि यूरो भी मुक्त बाजार में वैसी मुक्त उड़ान भरे जैसी कि अमेरिकी डॉलर भरता रहा है? सीधे-सीधे कहें तो यूरो, डॉलर का दोस्त है या दुश्मन? इतिहास में झांक कर देखिए, आपको सच पता चल जाएगा कि दोनों के बीच ‘लव’ है या ‘हेट’.
खाड़ी युद्ध के केंद्र में क्या था? केमिकल वेपन नहीं बल्कि पेट्रो डॉलर (अथवा ब्लैक डॉलर) जिसे सद्दाम हुसैन पेट्रो यूरो से विस्थापित करना चाहते थे. इससे पहले कि डॉलर का काउंट डाउन शुरू हो, अमेरिका ने सद्दाम हुसैन का काउंट डाउन शुरू कर दिया. वेनेजुएला में राष्ट्रपति मादुरो ने भी कुछ वैसी ही गलती कर दी जैसी कि सद्दाम हुसैन ने की थी.
परिणाम सभी के सामने है. कहने का तात्पर्य है कि पर्दे के पीछे की ताकतें यूरो को सुई की नोंक भर जमीन देने को भी तैयार नहीं हैं. फिर कैसी एकता और कैसा भाईचारा? आज जो हो रहा है, वह नया नहीं है. यह अलग बात है कि डोनाल्ड ट्रम्प मस्तिष्कों की लड़ाई जुबां तक ले आए हैं.
रही बात यूरोप की तो वह अब तक अमेरिका के साथ ‘प्रेज डिप्लोमेसी अथवा अनुकरण की परंपरा से बंधा रहा ताकि अमेरिका के नेतृत्व में नार्थ अटलांटिक ट्रीटी (नाटो) से प्राप्त सुरक्षा कवच स्थायी बना रहे. अब राष्ट्रपति ट्रम्प आए दिन सुरक्षा साझेदारी से बाहर निकलने की धमकी दे रहे हैं और यूरोपीय देश इस विषय पर बंटे हुए हैं.
कहने का तात्पर्य यह है कि अब भरोसे की दीवार दरक रही है इसलिए यूरोपीय देश अब विवश होकर यह कह रहे हैं कि अब हम अमेरिका पर पूरी तरह से निर्भर नहीं रह सकते. रही बात डोनाल्ड ट्रम्प की सनक और उनके ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (मागा) की, तो इनका दोष आंशिक नहीं, संरचनात्मक है.
गौर से देखें तो राष्ट्रपति ट्रम्प ने तीन बातें बेहद सामान्य ढंग से पेश की हैं, जबकि उनमें सामान्य कुछ भी नहीं है. पहली यह कि उन्होंने नाटो को लगभग अनुपयोगी करार दे दिया है. दूसरी यह कि अपने सहयोगियों के साथ वे ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे मुफ्तखोर (फ्री राइडर्स) हों.
और तीसरी बात यह है कि उन्होंने डिप्लोमेटिक ग्राउंड को बाजार का स्थान बना दिया जहां विदेश मूल्यों और नियम आधारित व्यवस्था से नहीं, लेन-देन से नीति चलती है. हां, यह देखना जरूरी है कि इन तीनों के लिए राष्ट्रपति ट्रम्प ने कारण निर्मित किए हैं अथवा कारण पहले से ही विद्यमान थे लेकिन वे उन्हें सतह पर ले आए हैं.
ऐसे में एक परंपरागत साझेदार के रूप में यूरोप को लगना लाजिमी है कि अमेरिका अब ‘भरोसे का साझेदार’ नहीं रह गया. बहरहाल, अमेरिका विऔद्योगीकरण की चपेट में है जिसके चलते अमेरिकी मध्यम वर्ग पतन की ओर बढ़ रहा है. वैश्वीकरण असमान लाभों की बैसाखी के सहारे है.
इससे अमेरिका में जो गुस्सा पनप रहा है उसी का परिणाम है ट्रम्प और उनका ‘मागा’. यह अलग बात है कि ट्रम्प ने अपनी विद्वत्ता से नहीं बल्कि इडियोसिटी से इस गुस्से को अपनी ताकत में बदला और दूसरी बार व्हाइट हाउस पहुंच गए. यह गुस्सा अभी बरकरार रहने वाला है.
स्वाभाविक है कि डोनाल्ड ट्रम्प अपने निजी हितों के साथ-साथ अमेरिकी औद्योगिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए वेनेजुएला जैसा उदाहरण पेश करने की कोशिश आगे भी करते रहेंगे. तो क्या ग्रीनलैंड की भी पटकथा लिखी जा चुकी है? यह तो भविष्य बताएगा.