पैसा जनता का है तो उसे सारी जानकारी भी चाहिए!
By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: January 13, 2026 18:31 IST2026-01-13T18:30:28+5:302026-01-13T18:31:04+5:30
कितनों ने ऋण नहीं चुकाए और डिफॉल्टर हो गए तो यह जानकारी सार्वजनिक करने में क्या आपत्ति हो सकती है?

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बैंकिंग का बड़ा सीधा सा गणित है कि आम आदमी अपना पैसा बैंक में जमा करता है ताकि उसे कुछ ब्याज मिले. बैंक इन पैसों को ऋण के रूप में जरूरतमंदों को ज्यादा ब्याज दर पर देते हैं. कम ब्याज पर पैसा लेने और ज्यादा ब्याज पर पैसा देने के बीच का मुनाफा बैंक का होता है जिससे बैंक संचालित होते हैं. अब यदि आम आदमी यह जानना चाहे कि बैंकों ने जिन लोगों को ऋण दिया, उनमें से कितनों ने ऋण नहीं चुकाए और डिफॉल्टर हो गए तो यह जानकारी सार्वजनिक करने में क्या आपत्ति हो सकती है?
ईमानदारी से देखें तो कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए क्योंकि पैसा जनता का है तो उसे जानकारी पाने का हक है. इस बात से भारतीय रिजर्व बैंक भी सहमत है और उसने साफ कहा है कि सूचना अधिकार कानून के तहत इस तरह की जानकारियां सार्वजनिक की जानी चाहिए. लेकिन बैंक ऑफ बड़ौदा, आरबीएल बैंक, यस बैंक और भारतीय स्टेट बैंक को इस पर आपत्ति है.
इन बैंकों का कहना है कि एनपीए, डिफॉल्टरों की सूची, जुर्माने और निरीक्षण की रिपोर्ट यदि सार्वजनिक की जाती हैं तो इससे उनके बिजनेस की रणनीति प्रभावित हो सकती है, साथ ही ग्राहकों का विश्वास भी कमजोर होगा. ये तो बड़ा अजीब तर्क है. यदि किसी ने ऋण लिया है और समय पर बैंकों को नहीं चुकाया है तो उसकी जानकारी क्यों नहीं सार्वजनिक की जा सकती?
इसमें भरोसे का सवाल कहां पैदा होता है. इसे तो इस नजर से देखा जाना चाहिए कि किसी की गलती छुपाना भी अपराध की श्रेणी में आता है! बैंकों का तर्क समझ से बाहर है. दरअसल सूचना के अधिकार के तहत इन बैंकों से जानकारियां मांगी गई थीं. इन बैंकों ने जानकारी नहीं दी.
मामला रिजर्व बैंक तक पहुंचा तो उसने साफ कहा कि सूचना का अधिकार अधिनियम 2005, पुराने सभी कानूनों से ऊपर है इसलिए जानकारी दी जानी चाहिए. इसके बाद इन बैंकों ने केंद्रीय सूचना आयोग का रुख किया है. मामला अटका हुआ है, इन बैंकों ने अभी तक कोई जानकारी नहीं दी है. इस बीच बैंक ऑफ बड़ौदा ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख भी किया है.
आम आदमी के मन में सवाल है कि बैंक जानकारियां क्यों छिपाना चाह रहे हैं, क्या दाल में कुछ काला है? इस शंका का कारण पुराना इतिहास है जब कुछ बैंकों ने बड़े-बड़े लोगों को बड़ी धनराशि बगैर किसी जांच-पड़ताल के दे दी जो आज तक बैंकों को वापस नहीं मिला है. बैंकों का पैसा हड़पने वाले कई लोग विदेशों में बैठे हैं और उन्हें वापस लाने के लिए भारत सरकार कोशिश भी कर रही है.
लेकिन सवाल है कि ऐसी स्थिति पैदा ही क्यों होनी चाहिए? आम आदमी को कुछ लाख रुपए का ऋण पाने के लिए भी पापड़ बेलने पड़ते हैं लेकिन कुछ खास लोगों को बड़ी आसानी से हजारों करोड़ कैसे मिल जाते हैं? ऐसे गोरखधंधों को रोकना है तो बैंकों की सारी जानकारियां सार्वजनिक होनी चाहिए. तभी हम कह पाएंगे कि हमारी बैंकिंग प्रणाली पारदर्शी है.