रेणु जैन
वनों के बारे में एक बात कही जाती है कि वे ग्रीन हाउस गैसों के खिलाफ प्रकृति के सबसे बड़े योद्धा होते हैं. वहीं चिंता की एक बात यह भी है कि दुनिया में हर एक सेकंड में एक फुटबॉल के मैदान जितना जंगल काटा जा रहा है. यदि दुनिया के जंगलों के कटने की गति यही रही तो इस सदी के अंत तक समूची दुनिया के जंगलों के बड़े हिस्से का सफाया हो सकता है.
कुछ वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में धरती को शीघ्र हरा-भरा बनाने वाली जापानी मियावाकी पद्धति का जिक्र किया था. एक जापानी वनस्पति शास्त्री अकीरा मियावाकी द्वारा 1970 के दशक में बनाई गई एक ऐसी तकनीक जो बहुत कम समय में खाली पड़े भू-भागों को हरा-भरा बना सकती है. इस पद्धति से हरियाली विकसित करने में शुरू के दो साल की मेहनत लगती है.
उसके बाद ये पौधे आत्मनिर्भर हो जाते हैं यानी पेड़ स्वयं अपनी देखभाल कर लेते हैं. खास बात यह है कि मियावाकी पद्धति में तीन वर्ष के भीतर ही पेड़ अपनी पूरी लंबाई तक वृद्धि कर लेते हैं. इस तकनीक में पौधों को पास-पास लगाया जाता है. सबसे पहले बड़े पौधे, फिर थोड़े छोटे, सबसे आखिर में फुलवारी किस्म के पौधे लगाए जाते हैं ताकि वो उसी आकार में फल-फूल सकें.
भारत में मियावाकी पद्धति खूब प्रचलित हो रही है. अकेले मुंबई में 60 से ज्यादा मियावाकी वन पर काम हो रहा है. दिल्ली भी इस दौड़ में शामिल होने जा रही है. चेन्नई के नगर निकाय ने शहर भर में एक हजार मिनी वन स्थापित करने का निर्णय किया है. अंबाजी, पावागढ़, लखनऊ के अलीगंज में भी मियावाकी उद्यान तैयार किए जा रहे हैं.
हैदराबाद के कावागुड़ा में 18 एकड़ में फैला मियावाकी जंगल देश का इस तरह का सबसे बड़ा जंगल है. इसमें फलों और फूलों की 126 प्रजातियां हैं. इसे पक्षियों का स्वर्ग कहा जाता है. इतना ही नहीं जंगल के प्रत्येक पेड़ को जीआई टैग से सुसज्जित किया गया है. स्टोन क्राफ्ट समूह ने बरगद के 40 पेड़ों को वहां स्थानांतरित भी किया है.
कई देश मियावाकी तकनीक से छोटे-छोटे जंगल विकसित कर रहे हैं. विश्व पर्यावरण दिवस पर गुजरात में स्मृति वन नामक मियावाकी जंगल बनकर तैयार हुआ है. इस जंगल की खास बात यह है कि वर्षों तक यह जगह वीरान थी. सन् 2001 में यहां भूकंप आया था. भूकंप पीड़ितों की याद में बनाए गए इस मियावाकी जंगल में पिछले कुछ सालों में 117 प्रकार के तीन लाख पेड़ों को लगाया गया है.
40 लाख से अधिक पौधे लगाने की योजना को साकार करने वाले इस स्मारक वन से भुजिया पहाड़ी अब हरी चादर से ढंकी हुई है. मियावाकी पद्धति का उपयोग करके सुंदर वन गुजरात के बलसाड़ नारगोल में 58 से ज्यादा जंगल बनाए गए हैं. इसी की तर्ज पर स्टेच्यू ऑफ यूनिटी के पास भी मियावाकी जंगल बन कर तैयार हो गया है.
भारत के खोए हुए जंगलों को वापस लाने की कोशिश करने वाली बेंगलुरु स्थित 14 लोगों की संस्था ‘फॉरेस्ट’ इस जापानी पद्धति मियावाकी का उपयोग करके जंगल बना रही है. तमिलनाडु में इस तरह के 33 जंगल आबाद हो चुके हैं. इस प्रकार के वन मॉडल को विकसित करने की यह कोशिश बहुत कामयाब हो रही है जिससे न सिर्फ स्थानीय पारिस्थितिक में सुधार होगा बल्कि किसानों की आय का एक जरिया भी खुलेगा.