मनमौजी, बड़बोले और हठी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अनेक झटकों को खाने के बाद भी अपनी आत्मघाती नीतियों में सुधार करने के लिए तैयार नहीं हैं. यहां तक कि अमेरिका के उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रपति ट्रंप के ‘टैरिफ’ लगाने के फैसले को उनके अधिकारों का अतिक्रमण करार दिया है. अदालत के अनुसार वह वर्ष 1977 के कानून ‘इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट’ (आईईपीए) का उपयोग करके दुनिया के लगभग हर देश से आयात पर ‘टैरिफ’ नहीं लगा सकते हैं. डांवाडोल अर्थव्यवस्था के बीच अब निगाहें टैरिफ से हासिल करीब 150 से 200 अरब डॉलर के ‘रिफंड’ पर आ टिकी हैं.
किंतु ट्रंप ने पहले अदालत के फैसले से जुड़े न्यायाधीशों की आलोचना कर उनको शर्मिंदा होने के लिए कहा. फिर उन्होंने न्यायाधीशों को ‘मूर्ख’ कह कर कट्टरपंथी वामपंथी ‘डेमोक्रेट्स’ के लिए काम करने वाले लोग बता कर उनमें सही काम करने का साहस नहीं होने की बात कह दी. राष्ट्रपति यहीं नहीं रुके और उन्होंने एक वैकल्पिक कानून, ट्रेड एक्ट 1974 के सेक्शन 122 के तहत एक घोषणा पर हस्ताक्षर कर सभी देशों के सामान पर नया अस्थाई 10 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया. आगे उसे 15 प्रतिशत तक बढ़ाने का भी एलान कर दिया.
सच यही है कि अमेरिका के अपने बिगड़ते आर्थिक हालात के बीच ट्र्ंप की चौधराहट कम नहीं हो रही है. वह भारत, चीन को दबाव में लाना चाहते हैं और ईरान, पाकिस्तान तथा बांग्लादेश जैसे देशों को डर के साए में जीने के लिए मजबूर करना चाहते हैं. हालांकि उनके अपने देश के सर्वे के अनुसार करीब दो-तिहाई अमेरिकी महंगाई से त्रस्त हैं.
वे आयातित वस्तुओं पर लगाए गए ‘टैरिफ’ से नाराज हैं. यहां तक कि उनकी लोकप्रियता की स्थिति वर्ष 2021 में पद छोड़ते समय जैसी हो चली है. अमेरिकी अर्थव्यवस्था पिछले साल अक्तूबर से दिसंबर माह के बीच 1.4 प्रतिशत वार्षिक दर से बढ़ी, जबकि अपेक्षा 2.5 प्रतिशत की दर से बढ़ने की थी. उधर, पिछली सरकार के कार्यकाल से ही अमेरिका पर कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है.
सरकारी खर्च की तुलना में कमाई घटती जा रही है. अपने ही अंदाज में चलने के कारण राष्ट्रपति ट्रंप राजनीतिक रूप से एक सुदृढ़ नेता के रूप में नहीं उभर पा रहे हैं. ताजा अदालत के फैसले के बाद उन्हें देश के लिए आत्मघाती बनने वाले राष्ट्रपति के रूप में देखने में कोई बुराई नहीं रह गई है. अमेरिका का राजनीतिक वातावरण खराब होने से निवेशकों का भरोसा कम हो रहा है.
अनेक कंपनियों को अपने कामकाज में कटौती करनी पड़ रही है. बैंकों और अन्य सरकारी संस्थाओं में डर पैदा हो रहा है. परंतु राष्ट्रपति व्यवहारिक बनने के प्रयास में नहीं हैं. वह कभी शोला तो कभी शबनम बन जाते हैं, लेकिन अपने चंद समर्थकों के अलावा अमेरिका और उसके बाहर विश्वसनीय नेता नहीं बन पा रहे हैं.
उन्हें अपनी तुनक मिजाजी पर भरोसा है. भारत सहित अनेक देशों के लिए यह चिंताजनक स्थिति है. जिसको लेकर सतर्क रहने की आवश्यकता है, क्योंकि अमेरिका के नुकसान में कहीं न कहीं भारत का नुकसान भी छिपा है.