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गलत अर्थशास्त्र की देन हैं कोरोना जैसे संकट, भरत झुनझुनवाला का ब्लॉग

By भरत झुनझुनवाला | Updated: December 17, 2020 12:39 IST

खपत को बढ़ाने के लिए नए क्षेत्नों में प्रवेश कर रहे हैं और पुराने क्षेत्नों में जैव विविधता को समाप्त कर रहे हैं और उन क्षेत्नों में जो कोरोना जैसे वायरस हैं, उनको बाहर आने का अवसर दे रहे हैं अथवा उन्हें मजबूर कर रहे हैं.

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ठळक मुद्देउद्योगों में एल्युमीनियम जैसे ऊर्जा सघन माल का उत्पादन होता है. ताप विद्युत घर नाइट्रोजन ऑक्साइड का भारी मात्ना में उत्सर्जन करते हैं. पर्यावरण परिवर्तन को अपने ऊपर सहन कर लेने की जो क्षमता है.

अर्थशास्त्न का एक मौलिक सिद्धांत उपयोगिता का है. बताया जाता है कि मनुष्य जब पहला केला खाता है तो उसे कुछ उपयोगिता यानी यूटिलिटी अथवा सुख मिलता है.

जब वह दूसरा केला खाता है तो पहले की तुलना में उससे कुछ कम उपयोगिता मिलती है और जब वह तीसरा केला खाता है तो उसे और कम मिलती है. इसी प्रकार अर्थशास्त्न के अनुसार हर उपभोक्ता उत्तरोत्तर खपत तब तक बढ़ाता जाता है जब तक उस खपत से मिलने वाली उपयोगिता शून्य न हो जाए.

यह सिद्धांत मनुष्य को उत्तरोत्तर अधिक खपत करने की ओर ढकेलता है. जैसे जब हम कहते हैं कि देश पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन जाएगा तो इसके पीछे विचारधारा है कि हम पांच ट्रिलियन डॉलर के माल की खपत अपने देश के नागरिकों को उपलब्ध कराएंगे और वे सुखी हो जाएंगे.

लेकिन अर्थशास्त्न इस बात को नजरअंदाज करता है कि मनुष्य की खपत की चाहत तो अनंत है जबकि प्रकृति प्रदत्त संसाधन सीमित हैं. इसलिए उपयोगिता का यह सिद्धांत दो प्रकार से संकट पैदा करता है और कोरोना जैसे संकट को लाता है- पहला संकट इस प्रकार के वायरस को पैदा करके और दूसरा संकट इस प्रकार के वायरस से हमारी प्रतिरोध करने की क्षमता को कमजोर करके.

जैव विविधता पर अंतर्देशीय विज्ञान नीति प्लेटफार्म के अनुसार मनुष्य लगातार नए क्षेत्नों में प्रवेश कर रहा है जहां अभी तक वह नहीं जाता था. जैसे अमेजन के घने जंगल को अब हम खेती के लिए काट रहे हैं. अपने देश में घने जंगल के बीच से सड़क बनाने के लिए पर्यावरण की स्वीकृति की अनिवार्यता को अब निरस्त कर दिया गया है जिससे जंगल को काट कर सड़क आसानी से बनाई जा सके. जंगलों को काटकर भूमिगत खनन को बढ़ावा दिया जा रहा है अथवा कृषि का विस्तार किया जा रहा है.

समुद्र के नीचे के कोरल रीफ की परवाह न करते हुए जलमार्ग का निर्माण हो रहा है. पहाड़ों के ऊपरी हिस्सों में जहां नदियों का उद्गम है और वे स्वतंत्न बहती हैं, उनके पानी को रोककर सिंचाई के लिए तालाब और जलविद्युत का निर्माण कर उनके प्रवाह को रोका जा रहा है. फसलों में जैव विविधता की अनदेखी करके मुट्ठी भर ऐसी फसलों को बढ़ावा दिया है जिनसे उत्पादन अधिक होता है. ऐसा करने से फसलों की पर्यावरण परिवर्तन को अपने ऊपर सहन कर लेने की जो क्षमता है, वह कमजोर पड़ती जा रही है.

प्रकृति के साथ इस प्रकार के हस्तक्षेप करके हम उन क्षेत्नों को खोल रहे हैं जहां आज तक कोरोना जैसे वायरस चुपचाप विश्राम कर रहे थे. अब ये वायरस वहां से कूदकर मनुष्यों में प्रवेश कर रहे हैं, उसी प्रकार जैसे जंगल काटने पर हाथी रिहायशी क्षेत्नों में प्रवेश करने लगते हैं. इस प्रकार हम अपनी खपत को बढ़ाने के लिए नए क्षेत्नों में प्रवेश कर रहे हैं और पुराने क्षेत्नों में जैव विविधता को समाप्त कर रहे हैं और उन क्षेत्नों में जो कोरोना जैसे वायरस हैं, उनको बाहर आने का अवसर दे रहे हैं अथवा उन्हें मजबूर कर रहे हैं.

दूसरी तरफ हम उसी उपयोगिता के सिद्धांत पर चलकर अपने शरीर को कमजोर बना रहे हैं. हम अपनी बिजली की खपत उत्तरोत्तर बढ़ाते जाते हैं जिससे अनेक घरेलू उपकरण चलते हैं अथवा उद्योगों में एल्युमीनियम जैसे ऊर्जा सघन माल का उत्पादन होता है. इसके लिए हम बिजली का भी उत्पादन बढ़ाते जाते हैं.

बिजली के उत्पादन में हमारे ताप विद्युत घर नाइट्रोजन ऑक्साइड का भारी मात्ना में उत्सर्जन करते हैं. शोध बताते हैं कि इस जहरीली गैस से मनुष्य के फेफड़े कमजोर हो जाते हैं और वे जल्दी से बाहरी संक्रमण का शिकार हो जाते हैं. इसलिए जरूरत है कि हम नया अर्थशास्त्न लिखें जिसमें सुख को अचेतन से जोड़ें, न कि खपत से.

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