सुनील सोनी
विलियम शेक्सपियर के जीवन की त्रासदी के कथानक ‘हेमनेट’ को 98वें यानी 2026 के ऑस्कर में 8 नामांकन मिले हैं, पर खुद वे जब 1599 में ‘जूलियस सीजर’ की त्रासदी लिख रहे थे, तब उन्हें नहीं पता था कि वे 400 साल बाद के गणतंत्र की त्रासदी का सबक लिख रहे हैं. जूलियस सीजर की हत्या करने के बाद जब उसका मित्र एंथनी भाषण देता है, वही एंथनी, जो जनता यानी गणतंत्र का पक्षधर है, आवाहन करता है, ‘दोस्तो... रोमनों... देशवासियों...’ बस जनता पलट जाती है. हत्यारों की जय-जयकार हो रही है. वही जनता है, जो कुछ देर पहले तक सीजर की जय-जयकार कर रही थी...
दिनदहाड़े, सरेआम उसकी हत्या से स्तब्ध थी. गणतंत्र यानी सीनेट को चलानेवाले ब्रूटस समेत सभी सीनेटर दलील दे रहे हैं कि जूलियस सीजर की हत्या करके उन्होंने गणतंत्र को बचा लिया है. शेक्सपियर कह रहे हैं कि केवल भावुकताभरा, शब्दजाल से बुना भाषण देकर जनता को बहकाना कितना आसान है ! गणतंत्र को बचाने के लिए गणतंत्र की हत्या !!
ब्रूटस ईमानदार-नैतिकतावादी-सिद्धांतवादी है, लेकिन उस खेल में शामिल होता है. जब जनता अपने ही राज यानी गणतंत्र में निहित कमजोरियों को बाधा मानती है, तो तानाशाही को स्थिर मानकर स्वीकार कर लेती है. इब्राहिम अलकाजी ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की धुरा संभाली, तो धर्मवीर भारती के ‘अंधा युग’ के मंचन के लिए पुराने किले या फिरोजशाह कोटला के ध्वंसावशेषों को चुना.
1954 में लिखा गया ‘अंधा युग’ महाभारत के 18वें पर्व की सांझ है. युद्ध समाप्त हो चुका है, पर सत्तालोलुपता का अंत नहीं है. विवेक समेत तमाम मानवीय मूल्य खो चुके हैं और नैतिकता दूर-दूर तक नहीं दिखती. जिसे न्याय कहा जा रहा है, वह मूलत: बदला है. कर्तव्य यानी ‘धर्म’ के नाम पर अश्वत्थामा सत्ता का अंधा औजार है.
निर्दोषों की हत्या के बाद सवाल छोड़ जाता है कि क्या वही अकेला अपराधी है? अपराध उसका ही है या उस व्यवस्था का, जिसने उसे धर्म के नाम पर विवेकहीन जीत का रास्ता दिखाया? वहां कृष्ण अनुपस्थित हैं. नेपथ्य में भी नहीं. यानी नैतिकता, आत्ममंथन, विवेक व करुणा नदारद है और सत्ता अपने तर्क गढ़ रही है. धृतराष्ट्र या अश्वत्थामा ही अंधे नहीं, पूरा तंत्र ही अंधा है.
यह सामूहिक अवस्था है. यही वह जगह है, जहां जूलियस सीजर और अंधा युग में साम्य है. जनता खुद को महत्वहीन कर लेती है, कोई सवाल नहीं उठाती, नारों में बहक जाती है. कुंदन शाह इस सवाल को 1983 में अलग तरह से उठाते हैं. ‘जाने भी दो यारो’ में गिरिजा कुमार माथुर की कविता ‘हम होंगे कामयाब...’ के मार्फत, जहां पूरा तंत्र कामयाब है कि जनता और सत्य को नाकाम कर दे.
माइकलएंजेलो एंटोनियोनी की 1966 की फिल्म ‘ब्लोअप’ के कथानक को छूते हुए कुंदन शाह और सुधीर मिश्रा पटकथा में इसे फार्स में बदल देते हैं, जो भारतीय गणतंत्र की सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक विडंबना को खुरचते हैं, तो काली स्याही बहने लगती है. सच को नाकाम करने में सत्तातंत्र हर औजार का इस्तेमाल करता है,
जिसकी साठगांठ में विधायिका भी है, कार्यपालिका भी और न्यायपालिका भी. चौथा स्तंभ यानी मीडिया उनका साथी है. फिल्म नहीं कहती कि गणतांत्रिक लोकतंत्र खराब है. वह कहती है कि लोकतंत्र में विवेकहीनता को न पहचान पाना और स्वीकार लेना भीड़तंत्र बना देता है, जो अंतत: निर्दोषों को पीड़ित कर हाशिये में धकेल देता है.
हेनरिक इब्सन का 1882 का नाटक ‘एन एनिमी ऑफ द पीपल’ भी उसी सत्तातंत्र की कहानी है, जो गण को छल रहा है और उसे भीड़ में तब्दील कर उसी डाॅक्टर के खिलाफ खड़ा कर देता है, जो जनहित में साठगांठ के खिलाफ आवाज उठाता है. ईसा पूर्व छठी सदी के भारतीय ‘लिच्छवि गणराज्य’ के नामौजूद अवशेषों में मौजूदा गणतंत्र के अंश खोजने के प्रयास निष्फल हैं,
क्योंकि वह आमसभा नहीं थी, कुलसभा थी, जो घरानों से चलती थी और जिसमें केवल 18-20 गांव-नगर शामिल थे और महिलाएं व आम नागरिक नदारद थे. लेकिन, वह विचार भारतीय महाद्वीप में पनपा नहीं, क्योंकि वह पौराणिक कहानियां या धार्मिक स्मृतियां हैं, इतिहास प्रमाण नहीं. एथेंस की तरह नहीं,
जहां 158 गणनगरों की व्यवस्था को प्लूटो, सुकरात, अरस्तू, मैकियावेली लगातार राजनीतिक बहस में तब्दील किए रहते हैं और यह सिलसिला एथेंस, रोम, इटली समेत यूरोप की कई गणतंत्र व्यवस्थाओं के टूटने और पुनर्निर्मित होने तक चलता रहता है. मैग्नाकार्टा, बिल ऑफ राइट्स, अमेरिकी संविधान तक. भारतीय संविधान का निर्माण भी गण को जीवंत बनाए रखने वाली बहस के लगातार चलते रहने की उम्मीद के साथ किया गया था.