My memories with Tata Nano Aseem Shrivastava | छोटी कार की बड़ी यादें, कभी ना भूलने वाली दास्तां है मेरी 'नीलोफर'
छोटी कार की बड़ी यादें, कभी ना भूलने वाली दास्तां है मेरी 'नीलोफर'

पिछले दिनों जब ये खबर आई कि टाटा नैनो (Tata Nano) कार अब बनना बंद हो रही है और जून महीने में सिर्फ एक नैनो कार बनाई गई तो याद आ गयी नीलोफर। अब इससे पहले आप ये सोचें कि ये कोई प्रेम प्रसंग है तो आप पूरी तरह गलत नहीं हैं। प्रेम प्रसंग ज़रूर है लेकिन ये नीलोफर मोहतरमा दरअसल मेरी कार हैं और जैसे पहली मोहब्बत भुलाए नहीं भूलती है वैसी ही है नीलोफर। कितनी भी गाड़ियाँ आ जाएं नीले रंग की लेकिन टाटा नैनो हमेशा खास ही रहेगी।

साल 2013 से कार खरीदने की कवायद शुरू हुई थी। पहली कार थी इसलिए उत्साह भी था क्योंकि कार से बचपन से ही घूमते रहें हैं और लंबी लंबी यात्रा करी हैं तो तलाश के समय ये एक बड़ा पॉइंट था। कार ऐसी हो जिसे लेकर घूमने जाया जा सके।

घर में बाकी रिश्तेदारों के पास मारुति, हुंडई और होंडा की कारें थी जो व्यक्तिगत रूप से मुझे पसंद नहीं थीं। निश्चित रूप से वो अच्छी कारें होंगी लेकिन मैं शायद कुछ और ढूंढ रहा था। जिस समय ये तलाश चल रही थी उस समय टाटा नैनो बिना पावर स्टीयरिंग के मिल रही थी। किसी न किसी कारण से कार खरीदने का कार्यक्रम टलते हुए मई 2014 तक आ पहुंचा। उस समय बस कौन सी कार ली जाए ये निर्णय ही होना था।

मुम्बई में रहते हुए एक बात जो समझ आयी थी कि कार छोटी हो तो बेहतर। पार्किंग की जो मुश्किलें हैं वो कई हद तक इससे खत्म हो जाती हैं। छोटी कार में मेरी पसंद मारुति की छोटी कारें न होकर टाटा की नैनो कार पर जम गयीं। सही कहें तो ये पहली नज़र का प्यार था। बाहर से दिखने में छोटी सी दिखने वाली नैनो में अंदर कुछ और ही नज़ारा था। ढेर सारी जगह और आपको लगता ही नहीं कि आप एक छोटी कार में बैठे हैं। बस नैनो कार लेने का निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया।

जान-पहचान वालों को पता चल ही गया कि नैनो लेने का निर्णय हुआ है। बस फिर क्या था। सब तरफ से एक्सपर्ट कमेंट आने लगे। खराब कार है। उससे अच्छी फलां कार ले लो। बहुत छोटी कार है। उसमें आग लगती रहती हैं। सेफ नहीं है। कोई भी सेफ्टी फीचर नहीं है। इंजन पीछे की तरफ है। अगर टक्कर मारी किसी ने तो बड़ा काम निकलेगा। नैनो के लिए निर्णय लेने से पहले मैंने काफी रिसर्च करी थी। उससे एक चीज़ साफ थी कि बाकी कारों की तरह नैनो में अगर कुछ खामियां थीं तो कई सारी खूबियाँ भी थीं। लेकिन जैसा अक्सर होता है खामियों पर सबने ज़्यादा ध्यान दिया और खुबियों को नजरअंदाज किया। शायद इसलिये सब इसके बारे में जो बोल रहे थे वो सब कमियाँ ही गिना रहे थे।

दरअसल नैनो की शुरुआत से ही विवादों में रही। पहले तो एक लाख की कार लॉन्च होते होते डेढ़ लाख की हो गयी। उसके बंगाल में लगने वाले प्लांट को लेकर जो हंगामा हुआ उसके बाद इसके रोड पर दिखने में ही प्रश्नचिन्ह लगता सा दिख रहा था। लेकिन नरेन्द्र मोदी ने रतन टाटा को गुजरात में न्योता देकर ये सुनिश्चित किया कि टाटा की महत्वकांक्षी कार सड़क पर दौड़ेगी। और हुआ भी वही। लेकिन जैसा हर नये प्रोडक्ट के साथ होता है, नैनो के शुरुआती मॉडल में कुछ शिकायतें रहीं और कुछ ऐसी घटनाएं भी हुईं जिसके चलते इतने समय बाद भी सब उसकी बुराई ही देख रहे थे।

लेकिन मैंने अपनी रिसर्च के दौरान पाया कि ऐसे भी बहुत से लोग हैं जो नैनो से काफी खुश थे। एक साहब तो उस समय तक नैनो को एक लाख से ज़्यादा चला चुके थे। एक और नैनो प्रेमी तो उसे दुर्गम पहाड़ियों पर लेकर निकल गए थे। मेरा नैनो लेने का निर्णय इन्ही लोगों की बदौलत और दृढ़ हुआ और आखिरकार सारे विरोध के बाद नीलोफर हमारे परिवार की सदस्य बनी।

शुरू में तो नवी मुंबई और मुंबई में कार को घुमाते रहे लेकिन दीवाली पर नैनो को पहली लंबी यात्रा पर ले जाने का मौका मिल ही गया। यात्रा थी भोपाल तक। फिर से जिसे पता चला कि नैनो के साथ कुछ ऐसा कुछ करने का सोच रहे थे सबने सुझाव दिया कि ऐसा न करें। खैर हमने उस यात्रा के बाद भोपाल की 4 यात्राएं और करीं और नैनो ने हमेशा हमारा साथ दिया। नैनो लेकर हम दो बार महाबलेश्वर भी हो आये लेकिन कार ने घाट पर चढ़ने में कभी कोई परेशानी नहीं महसूस कराई। कुल मिलाकर जिस सोच के साथ कार खरीदी गई थी वो उस पर शत प्रतिशत खरी उतरी थी।

विदेश में जहाँ भी गए वहां छोटी कारों का चलन देखा। इसे मैं भारत की बदकिस्मती ही कहूँगा की नैनो जैसी शानदार कार अब यहाँ नहीं मिलेगी। अगर सच में एम्बेसडर कार के बाद कोई कार भारत के लिये बनी थी तो वो थी टाटा नैनो। मुझे हमेशा याद रहेंगे नीलोफर के साथ बिताये हुये वो पल और उसकी वो मुस्कुराती हुई सामने की ग्रिल। छोटी कार की बड़ी यादें...


Web Title: My memories with Tata Nano Aseem Shrivastava
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