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तीन तलाक क्या है, कानून बनने से किसे फायदा, किसे नुकसान ?

By उस्मान | Updated: July 25, 2019 18:51 IST

तीन बार तलाक को 'तलाक-ए-बिद्दत' कहा जाता है। बिद्दत यानी वह कार्य या प्रक्रिया जिसे इस्लाम का मूल अंग समझकर सदियों से अपनाया जा रहा है, हालांकि कुरआन और हदीस की रौशनी में यह कार्य या प्रक्रिया साबित नहीं होते।

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मुस्लिम महिलाओं से जुड़ा अहम मुद्दा तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) एक बार फिर चर्चा में है। तीन तलाक बिल एक बार लोकसभा में पेश कर दिया गया। लोकसभा में चर्चा के बाद उसके पास होने की उम्मीद है। विधेयक में एक साथ तीन तलाक कह दिए जाने को अपराध करार दिया गया और साथ ही दोषी को जेल की सज़ा सुनाए जाने का भी प्रावधान है। अपने दूसरे कार्यकाल में मोदी सरकार ने मई में इस बिल का मसौदा पेश किया था, जिसको लेकर कई विपक्षी दलों ने कड़ी आपत्ति जताई थी।

तीन तलाक क्या होता है?

तीन तलाक का जिक्र न तो कुरान में कहीं आया है और न ही हदीस में। यानी तीन तलाक इस्लाम का मूल भाग नहीं है।तीन तलाक से पीड़ित कोई महिला उच्च अदालत पहुंची है तो अदालत ने कुरान और हदीस की रौशनी में ट्रिपल तलाक को गैर इस्लामिक कहा है। तीन बार तलाक को 'तलाक-ए-बिद्दत' कहा जाता है। बिद्दत यानी वह कार्य या प्रक्रिया जिसे इस्लाम का मूल अंग समझकर सदियों से अपनाया जा रहा है, हालांकि कुरआन और हदीस की रौशनी में यह कार्य या प्रक्रिया साबित नहीं होते।

जब कुरआन और हदीस से कोई बात साबित नहीं होती, फिर भी उसे इस्लाम समझकर अपनाना, मानना बिद्दत है। ट्रिपल तलाक को भी तलाक-ए-बिद्दत कहा गया है, क्योंकि तलाक लेने और देने के अन्य इस्लामिक तरीके भी मौजूद हैं, जो वास्तव में महिलाओं के उत्थान के लिए लाए गए थे।

इस्लाम से पहले अरब में औरतों की दशा बहुत खराब थी। वे गुलामों की तरह खरीदी बेची जाती थीं। तलाक भी कई तरह के हुआ करते थे, जिसमें महिलाओं के अधिकार न के बराबर थे। इस दयनीय स्थिति में पैगम्बर हजरत मोहम्मद सब खत्म कराकर तलाक-ए-अहसन लाए। तलाक-ए-अहसन तलाक का सबसे अच्‍छा तरीका माना गया है।

यह तीन महीने के अंतराल में दिया जाता है। इसमें तीन बार तलाक बोला जाना जरूरी नहीं है। एक बार तलाक कह कर तीन महीने का इंतज़ार किया जाता है। तीन महीने के अंदर अगर-मियां बीवी एक साथ नहीं आते हैं तो तलाक हो जाएगा। इस तरीके में महिला की गरिमा बनी रहती है और वह न निभ पाने वाले शादी के बंधन से आज़ाद हो जाती है।

तीन तलाक इस्लामिक नहीं- शिया वक्फ बोर्ड

शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिज़वी का कहना है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड देश के आम मुसलमान की आवाज नहीं है। ये हमेशा सरकार के फैसलों के खिलाफ रहते हैं चाहे वो फैसला मुसलमानों के हित में ही क्यों ना हो। उन्होंने लोकमत से बात करते हुए कहा कि इंस्टैंट ट्रिपल तलाक का किसी मजहब या कुरान से कोई वास्ता नहीं है। यह महिलाओं पर पितृसत्तात्मक सोच ने लादा था जिसे खत्म करना जरूरी था। रिज़वी का मानना है कि विधेयक में सिर्फ तीन साल की सजा का प्रावधान है जबकि कम से कम 10 साल की सजा दी जानी चाहिए।

भारत में तीन तलाक कानून का विरोध क्यों?

ट्रिपल तलाक पर सबसे बड़ी आपत्ति इसको क्रिमिनल एक्ट बनाने को लेकर है। अभी तक तलाक का मामला सिविल एक्ट के तहत आता है जिसे मौजूदा बिल पेश होने के बाद क्रिमिनल एक्ट बना दिया जाएगा। इसके तहत किसी भी तरह से दिया गया ट्रिपल तलाक (बोलकर या लिखकर या ईमेल, एसएमएस, वॉट्सऐप आदि के जरिए) 'गैरकानूनी और अमान्य' होगा और पति को 3 साल तक जेल की सजा हो सकती है।

तीन तलाक कानून से जुड़ीं अहम बातें

कब दर्ज होगा तीन तलाक का केसयह अपराध संज्ञेय (इसमें पुलिस सीधे गिरफ्तार कर सकती है) तभी होगा, जब महिला खुद शिकायत करेगी। इसके साथ ही खून या शादी के रिश्ते वाले सदस्यों के पास भी केस दर्ज करने का अधिकार रहेगा। पड़ोसी या कोई अनजान शख्स इस मामले में केस दर्ज नहीं कर सकता है। यह बिल महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए है। कानून में समझौते के विकल्प को भी रखा गया है। पत्नी की पहल पर ही समझौता हो सकता है, लेकिन मैजिस्ट्रेट के द्वारा उचित शर्तों के साथ। 

बेल के लिए क्या नियम हैंनियम कानून के तहत मैजिस्ट्रेट इसमें जमानत दे सकता है, लेकिन पत्नी का पक्ष सुनने के बाद। केंद्रीय मंत्री ने कहा, यह पति-पत्नी के बीच का निजी मामला है। पत्नी ने गुहार लगाई है, इसलिए उसका पक्ष सुना जाना जरूरी होगा। 

गुजारे के लिए प्रावधानतीन तलाक पर कानून में छोटे बच्चों की कस्टडी मां को दिए जाने का प्रावधान है। पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण का अधिकार मैजिस्ट्रेट तय करेंगे, जिसे पति को देना होगा।

ऐसा है प्रस्तावित बिल

- तीन बार तलाक चाहे बोलकर, लिखकर या ईमेल, एसएमएस और व्हाट्सएप जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से कहना गैरकानूनी होगा।

- अगर किसी पति ने ऐसा किया तो तीन साल की जेल की सजा हो सकती है। यह गैर-जमानती अपराध होगा।

- यह कानून सिर्फ 'तलाक ए बिद्दत' यानी एक साथ तीन बार तलाक बोलने पर लागू होगा।

- तलाक की पीड़िता अपने और नाबालिग बच्चों के लिए गुजारा भत्ता मांगने के लिए मजिस्ट्रेट से अपील कर सकेगी।

- पीड़ित महिला मजिस्ट्रेट से नाबालिग बच्चों के रक्षण का भी अनुरोध कर सकती है। मजिस्ट्रेट इस मुद्दे पर अंतिम फैसला करेंगे।

- यह प्रस्तावित कानून जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू होगा है।

तीन तलाक बिल पर विपक्ष की राय

- असदुद्दीन ओवैसी का कहना है कि इस्लाम में तलाक-ए-बिद्दत और देश में घरेलू हिंसा कानून पहले से लागू है। ऐसे में देश को नए कानून की क्या जरूरत है? औवेसी ने नरेंद्र मोदी सरकार पर हमला करते हुए कहा कि केंद्र सरकार तीन तलाक पर जो बिल ला रही है, वह सविंधान में दिए गए मूल अधिकारों का हनन है। इसमें कई ऐसे प्रावधान हैं, जो कानूनसंगत नहीं हैं।

- इस प्रस्तावित विधेयक में मुस्लिम महिला को गुजारा भत्ता देने की बात पेश की गई है, लेकिन उस गुजारे भत्ते के निर्धारण का तौर तरीका नहीं बताया गया है। 1986 के मुस्लिम महिला संबंधी एक कानून के तहत तलाक पाने वाली महिलाओं को गुजारा भत्ता मिल रहा है। इस कानून के आ जाने से पुराने कानून के जरिए मिलने वाला भत्ता बंद हो सकता है।

- इस कानून के लागू होने के बाद इसका दुरुपयोग मुस्लिम पुरुषों  के खिलाफ होने की आशंका भी है। क्योंकि विधेयक में ट्रिपल तलाक साबित करने की जिम्मेदारी केवल महिला पर है। महिलाएं के साथ अगर पुरुषों को भी इसको साबित करने की जिम्मेदारी दी जाती है तो कानून ज्यादा सख्त होगा ।

- सरकार ने अभी तक इस विधेयक में कोई विशेष निधि नहीं बनाई है। इसमें केवल महिला सशक्तिकरण को पेश किया गया है, लेकिन अभी तक महिला आरक्षण बिल सरकार नहीं लाई।

तीन तलाक बिल मौलिक अधिकारों का हनन- ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य जफरयाब जिलानी ने कहा कि यह बिल मौलिक अधिकारों का हनन है। सरकार को मुस्लिम औरतों से कोई लेना देना नहीं है, सियासी फायदे के लिए इस बिल को पास कराया गया है। कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने कहा, 'सरकार यह बिल संकीर्ण राजनीतिक फायदे के लिए लेकर आई है। इससे मुस्लिम महिलाओं को फायदा नहीं होगा।

इन देशों में ट्रिपल तलाक पर है बैन

ट्रिपल तलाक को कई मुस्लिम देशों ने बैन कर रखा है। इन देशों का जिक्र सुप्रीम कोर्ट में ट्रिपल तलाक पर बने पैनल ने भी किया था। पैनल ने ताहिर महमूद और सैफ महमूद की किताब मुस्लिम लॉ इन इंडिया का जिक्र किया। इसमें अरब के देशों में तीन तलाक को समाप्त किए जाने की बात कही है। इसके अलावा इंस्टैंट ट्रिपल तलाक को अल्जीरिया, मिस्र, इराक, जॉर्डन, कुवैत, लेबनान, लीबिया, मोरक्को, सूडान, सीरिया, ट्यूनीशिया, संयुक्त अरब अमीरात और यमन में भी कोई जगह नहीं है। इसके अलावा इंडोनेशिया, मलेशिया और फिलीपींस जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई देश तलाक के लिए सख्त कानून रखते हैं।

टॅग्स :तीन तलाक़इस्लामलोकसभा संसद बिलनरेंद्र मोदी
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