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कर्मचारियों को तनख्वाह देने के लिए उद्योग जगत को पैकेज दिया जाना चाहिए था- प्रोफेसर मुस्तफा

By भाषा | Updated: May 17, 2020 13:31 IST

लॉकडाउन के कारण प्रवासी श्रमिकों के संकट पर संविधान विशेषज्ञ और हैदराबाद के नलसार विधि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर फैजान मुस्तफा का कहना है कि राज्यों द्वारा श्रम कानूनों में बदलाव किए जाने के बजाय कर्मचारियों को तनख्वाह देने के लिए उद्योग जगत को पैकेज दिया जाना चाहिए था।

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ठळक मुद्देप्रोफेसर फैजान मुस्तफा का कहना है कि राज्यों द्वारा श्रम कानूनों में बदलाव किए जाने के बजाय कर्मचारियों को तनख्वाह देने के लिए उद्योग जगत को पैकेज दिया जाना चाहिए था।उन्होंने कहा- श्रम कानूनों में बदलाव करने का यह बिल्कुल गलत वक्त है, क्योंकि कामगार पहले ही तनाव में हैं और उनकी नौकरियां खत्म हो गई हैं।

नई दिल्ली। लॉकडाउन के कारण प्रवासी श्रमिकों के संकट पर संविधान विशेषज्ञ और हैदराबाद के नलसार विधि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर फैजान मुस्तफा का कहना है कि राज्यों द्वारा श्रम कानूनों में बदलाव किए जाने के बजाय कर्मचारियों को तनख्वाह देने के लिए उद्योग जगत को पैकेज दिया जाना चाहिए था। कामगारों की समस्याओं, राज्यों द्वारा श्रम कानूनों में बदलाव, अंतरराष्ट्रीय श्रम कानूनों और उद्योग जगत से जुड़े मुद्दों पर पेश है प्रोफेसर मुस्तफा से पांच सवाल’ और उनके जवाब...

सवाल : कुछ राज्य सरकारों ने श्रम क़ानूनों में बदलाव किए हैं। वर्तमान हालातों में यह कितना ज़रूरी था ?

जवाब : श्रम कानूनों में बदलाव करने का यह बिल्कुल गलत वक्त है, क्योंकि कामगार पहले ही तनाव में हैं और उनकी नौकरियां खत्म हो गई हैं। वे अपने घरों को लौट रहे हैं। उनका संरक्षण किया जाना चाहिए था। अब श्रम कानून खत्म करने का मतलब है कि पूंजीपतियों और उद्योगपतियों द्वारा उनका शोषण किया जाएगा। अध्यादेश के जरिए ‘हायर एंड फायर’ का नियम लाया गया है। यह संवैधानिक तौर पर सही नहीं है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन :आईएलओ: ने भी अपनी चिंताएं जताई हैं। हम आईएलओ की संधियों के भी विरुद्ध जा रहे हैं, संविधान के भी खिलाफ जा रहे हैं और यह नैतिकता के भी खिलाफ है।

सवाल : ऐसे तीन कौन से बदलाव हैं जो आपको लगता है कामगारों के हित में नहीं हैं ?

जवाब :सबसे पहले, फैक्टरीज अधिनियम, सफाई, पानी, क्रेच की व्यवस्था के बारे में बात करता है। इस कानून को खत्म करने की क्या जरूरत थी? आपको इंस्पेक्टर राज को खत्म करना था, आपको नौकरशाही व्यवस्था को कम करना था, न्यूनतम मजदरी कानून को आपको क्यों कम करना है? यानी इसका मतलब है कि जब कामगार के पास काम नहीं होगा तो उसका शोषण किया जाएगा । दूसरा, समान पारिश्रमिक अधिनियम कहता है कि पुरुषों और महिलाओं को समान काम के लिए समान वेतन मिलेगा, उसे समाप्त करने की क्या जरुरत है? तीसरा, मजदूरों से 12 घंटे काम कराने का कानून भी कर्मचारियों की सेहत के लिए बहुत गलत है।

सवाल:कोरोना वायरस संकट से उद्योग जगत की परेशनियां बढ़ी हैं और सरकारों पर श्रम क़ानून में बदलाव के लिए दबाव था। ऐसे में और क्या विकल्प हो सकता था?

जवाब : उद्योग जगत कारोबार नहीं होने की वजह से कर्मचारियों को अप्रैल की तनख्वाह नहीं दे सकता था तो सरकार उन्हें पैकेज देती, जैसे और देशों ने दिया है। कर्मचारियों की तनख्वाह देने के लिए पैसा सरकार दे देती। आप ऐसे नियम बनाएं जिससे कर्मचारी खुशी-खुशी काम पर लौटें तब उत्पादन बढ़ेगा।

सवाल : कामगार या उनके संगठन इन बदलावों का विरोध करने की स्थिति में हैं?

जवाब : वे फिलहाल इस स्थिति में नहीं हैं कि इसका विरोध कर सकें लेकिन आरएसएस के मजदूर संगठन, भारतीय मजदूर संघ ने घोषणा की है कि देश भर में इसके खिलाफ आंदोलन चलाएंगे, क्योंकि मजदूर संघ भी इन बदलावों के लिए राजी नहीं है। उन्होंने सरकारों की आलोचना की है और कहा कि यह कानून के शासन की उपेक्षा है और एक तरीके का धोखा और अमानवीय है।

सवाल : भारत के श्रम कानून दुनिया के अन्य देशों की तुलना में कैसे है?

जवाब : हमने श्रम कानून बहुत संघर्ष के बाद बनाएं हैं। महात्मा गांधी ने खुद अहमदाबाद मिल हड़ताल में हिस्सा लिया था। नेहरू जी का समाजवाद की तरफ झुकाव था। इंदिरा जी ने बहुत अच्छे श्रम कानून बनाए हैं। यह झूठ है कि श्रम कानूनों की वजह से औद्योगिक विकास नहीं हो रहा है। 2019 में एक वेज कोड बनाया गया था, जिसमें चार श्रम कानून को मिला दिया गया था। लेकिन उत्तर प्रदेश, गुजरात और मध्य प्रदेश की सरकारों को भाजपा सरकार द्वारा बनाया गया कानून रास नहीं आया।

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