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भारत में भी उपनिवेशवादी मानसिकता वाले लोग, जो देश के ही विकास में रोड़े अटकाते हैं: मोदी

By भाषा | Updated: November 26, 2021 21:57 IST

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नयी दिल्ली, 26 नवंबर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को कहा कि भारत एकमात्र देश है, जो पेरिस समझौते के लक्ष्यों को समय से पहले पूरा करने की ओर अग्रसर है लेकिन इसके बावजूद उपनिवेशवादी मानसिकता के चलते देश पर पर्यावरण के नाम पर तरह-तरह के दबाव बनाए जाते हैं।

उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य से देश में भी ऐसी ही मानसिकता के चलते अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर या अन्य चीजों का सहारा लेकर अपने ही देश के विकास में रोड़े अटकाए जाते हैं।

राजधानी स्थित विज्ञान भवन के प्लेनरी हॉल में उच्चतम न्यायालय द्वारा आयोजित दो दिवसीय संविधान दिवस समारोह का उद्घाटन करने के बाद अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने इस उपनिवेशवादी मानसिकता को दूर करने की जरूरत पर बल देते हुए कहा कि इसके लिए सबसे बड़ी शक्ति और सबसे बड़ा प्रेरणा स्रोत भारत का संविधान ही है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि आज पूरे विश्व में कोई भी देश ऐसा नहीं है जो किसी अन्य देश के उपनिवेश के रूप में मौजूद हो लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उपनिवेशवादी मानसिकता समाप्त हो गई है।

उन्होंने कहा, ‘‘हम देख रहे हैं कि यह मानसिकता अनेक विकृतियों को जन्म दे रही है। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण हमें विकासशील देशों की विकास यात्राओं में आ रही बाधाओं में दिखाई देता है। जिन साधनों से, जिन मार्गों पर चलते हुए, विकसित विश्व आज के मुकाम पर पहुंचा है, आज वही साधन, वही मार्ग, विकासशील देशों के लिए बंद करने के प्रयास किए जाते हैं।’’

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत एकमात्र ऐसा देश है जो पेरिस समझौते के लक्ष्यों को समय से पहले हासिल करने की ओर अग्रसर है फिर भी पर्यावरण के नाम पर भारत पर भांति-भांति के दबाव बनाए जा रहे हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘यह सब उपनिवेशवादी मानसिकता का ही परिणाम है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि हमारे देश में भी ऐसी ही मानसिकता के चलते अपने ही देश के विकास में रोड़े अटकाए जाते हैं। कभी अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर तो कभी किसी और चीज़ का सहारा लेकर।’’

प्रधानमंत्री ने कहा कि आजादी के आंदोलन में जो संकल्प शक्ति पैदा हुई, उसे और अधिक मजबूत करने में यह उपनिवेशवादी मानसिकता बहुत बड़ी बाधा है।

उन्होंने कहा, ‘‘हमें इसे दूर करना ही होगा। और इसके लिए, हमारी सबसे बड़ी शक्ति, हमारा सबसे बड़ा प्रेरणा स्रोत, हमारा संविधान ही है।’’

प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार और न्यायपालिका, दोनों का ही जन्म संविधान की कोख से हुआ है, इसलिए दोनों ही जुड़वां संतानें हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘संविधान की वजह से ही दोनों अस्तित्व में आए हैं। इसलिए, व्यापक दृष्टिकोण से देखें तो अलग-अलग होने के बाद भी दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।’’

उन्होंने सत्ता के पृथक्करण की अवधारणा के महत्व को रेखांकित किया और कहा कि आजादी के 75 वर्ष के बाद के 25 वर्षों के अमृत काल में संविधान की भावना के अंतर्गत सामूहिक संकल्प दिखाने की आवश्यकता है क्योंकि आम आदमी उससे अधिक का हकदार है जो उसके पास वर्तमान में है।

उन्होंने कहा, ‘‘सत्ता के पृथक्करण की मजबूत नींव पर, हमें सामूहिक उत्तरदायित्व का मार्ग प्रशस्त करना है, एक रोडमैप बनाना है, लक्ष्य निर्धारित करना है और देश को उसकी मंजिल तक ले जाना है ।”

शास्त्रों का उद्धरण देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि किसी समाज या देश की ताकत उसकी एकता और एकजुट प्रयासों में होती है और जो मजबूत राष्ट्र के हितैषी होते हैं, वह एकता की प्रशंसा करते हैं तथा उस पर जोर देते हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘राष्ट्र के हितों को सर्वोपरि रखते हुए, यही एकता देश की सभी संस्थाओं के प्रयासों में होनी चाहिए। आज जब देश अमृत काल में अपने लिए असाधारण लक्ष्य तय कर रहा है, दशकों पुरानी समस्याओं के समाधान तलाश करते हुए भविष्य के लिए संकल्प ले रहा है, तो यह सबके साथ से ही पूरी होगी।’’

प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘‘सबका साथ-सबका विकास, सबका विश्वास-सबका प्रयास’’ संविधान की भावना का सबसे सशक्त प्रकटीकरण है।

सरकार की ओर से चलाई जा रही विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि संविधान के लिए समर्पित सरकार, विकास में भेद नहीं करती।

उन्होंने कहा, ‘‘यह हमने करके दिखाया है। आज गरीब व्यक्ति को गुणवत्तापूर्ण अवसंरचना की वही सुविधा मिल रही है, जो कभी साधन संपन्न लोगों तक सीमित थी। आज देश लद्दाख, अंडमान और पूर्वोत्तर के विकास पर उतना ही ध्यान दे रहा है, जितना दिल्ली और मुंबई जैसे मेट्रो शहरों पर।’’

उन्होंने न्यायधीशों से कहा, ‘‘हम सभी की अलग-अलग भूमिकाएं, अलग-अलग जिम्मेदारियां, काम करने के तरीके भी अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन हमारी आस्था, प्रेरणा और ऊर्जा का स्रोत एक ही है और वह है हमारा संविधान।’’

प्रधानमंत्री ने कहा कि आजादी के इतने साल बाद भी देश के नागरिकों के ए‍क विशाल वर्ग को पेयजल, शौचालय एवं बिजली जैसी बुनियादी जरूरतों से वंचित रहने पर विवश किया गया।

उन्होंने कहा कि इन लोगों की जिंदगी अधिक-से-अधिक आसान बनाने के लिए कार्य करना ही संविधान का सर्वश्रेष्ठ सम्‍मान एवं आदर है।

उन्होंने इस बात पर संतोष व्यक्त किया कि देश में बुनियादी जरूरतों से अब तक वंचित रहे लोगों को इस तरह की समस्‍त सुविधाएं मुहैया कराने के लिए एक व्यापक अभियान चल रहा है।

इस कड़ी में उन्होंने कोरोना काल में 80 करोड़ से अधिक लोगों को पिछले कई महीनों तक निरंतर मुफ्त अनाज उपलब्ध कराए जाने का भी उल्लेख किया और कहा कि सरकार ‘‘पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना’’ पर 2 लाख 60 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा खर्च कर गरीबों को मुफ्त अनाज दे रही है।

उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति न्यायमूर्ति एम वी रमण और कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने भी कार्यक्रम को संबोधित किया।

इस अवसर पर उच्चतम न्यायालय के सभी न्यायाधीश, सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश और अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश, भारत के सॉलिसिटर जनरल और विधि जगत के अन्य सदस्य भी उपस्थित थे।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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