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लोकसभा चुनावः अयोध्या के इस गांव के वोटरों ने आज तक कभी वोट नहीं डाला

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: May 7, 2019 07:54 IST

लोकसभा चुनावः गांव की युवा पीढ़ी में मतदान के प्रति ललक है. जब भी चुनाव आते हैं, उनकी युवा पीढ़ी अपना मतदान केंद्र बदलने की मांग उठाने लगती है, ताकि दूसरे देशवासियों की तरह वह भी मतदान का अपना लोकतांत्रिक कर्तव्य निभा सके.

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ठळक मुद्देउत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले की फैजाबाद लोकसभा सीट के मिल्कीपुर विधानसभा क्षेत्र में स्थित पूरे बोध तिवारी नाम का यह गांव गद्दोपुर नाम की ग्राम पंचायत का हिस्सा है. गांव में एक सौ दस मतदाता हैं और वे बताते हैं कि उनके लिए आजादी के बाद से अब तक हुए किसी भी चुनाव में मतदान के लिए पोलिंग बूथ तक जाना संभव नहीं हो पाया है.ग्रामवासी रामपुजारी तिवारी, जयराम आदि ने बताया कि वोटिंग नहीं करने के पीछे उन्हें विरासत में मिला आजादी से पूर्व का कृषि भूमि का विवाद है.

कृष्ण प्रताप सिंहइस बात को आप शायद हजम न कर सकें कि सत्रहवीं लोकसभा के चुनावों से जुड़ी गहमागहमी के उतार पर पहुंच जाने के बावजूद देश में एक सौ से ज्यादा मतदाताओं वाला एक ऐसा भी गांव है, जिसके किसी भी मतदाता ने कभी किसी चुनाव में मतदान नहीं किया. उत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले की फैजाबाद लोकसभा सीट के मिल्कीपुर विधानसभा क्षेत्र में स्थित पूरे बोध तिवारी नाम का यह गांव गद्दोपुर नाम की ग्राम पंचायत का हिस्सा है.गांव में एक सौ दस मतदाता हैं और वे बताते हैं कि उनके लिए आजादी के बाद से अब तक हुए किसी भी चुनाव में मतदान के लिए पोलिंग बूथ तक जाना संभव नहीं हो पाया है. यों, इसकी कोई बड़ी वजह नहीं है, लेकिन जो है, उसे दूर करने की न चुनाव आयोग ने पहल की न ही राजनीतिक दलों ने. नतीजतन गांव की कई पीढ़ियां मतदान का सुख उठाए बिना ही संसार को अलविदा कह गईं.ग्रामवासी रामपुजारी तिवारी, जयराम आदि ने बताया कि वोटिंग नहीं करने के पीछे उन्हें विरासत में मिला आजादी से पूर्व का कृषि भूमि का विवाद है. उनके अनुसार अंग्रेजों के समय उनके पूर्वजों की कोई तीन सौ बीघे कृषि भूमि गद्दोपुर के अत्याचारी जमींदारों ने हथिया ली थी.इस भूमि को उनके कब्जे से मुक्त कराने के लिए गांव वालों द्वारा की गई सारी अपीलें व दलीलें बेकार हो गईं तो उनके मुखिया ने सत्याग्रह का रास्ता अपनाकर अनशन आरंभ किया. अत्याचारी जमींदार फिर भी नहीं पसीजे. तब भी नहीं, जब मुखिया की जान पर बन आई. मुखिया को लगा कि वह अपने प्राण त्यागकर भी अपनी कृषि भूमि की रक्षा नहीं कर सकेगा तो उसने आखिरी सांस लेने से पहले अपने वारिसों को सौगंध खिलाई कि भविष्य में न वे कभी गद्दोपुर की ओर मुंह करेंगे और न ही इन जमींदारों से कोई वास्ता रखेंगे. तभी से गांववासी इस सौगंध को मुखिया की आज्ञा मानकर उस पर अमल करते आ रहे हैं.आजादी के बाद लोकसभा, विधानसभा व ग्राम पंचायत के चुनावों की परंपरा शुरू हुई और गद्दोपुर को उनका मतदान केंद्र बनाया जाने लगा तो भी यह परंपरा उन्होंने नहीं ही तोड़ी. ग्रामवासी गद्दोपुर स्थित अपनी राशन की दुकान तक नहीं जाते.इस लोकसभा चुनाव में भी गांव का मतदान केंद्र गद्दोपुर में ही बनाया गया है.गांव के युवाओं ने गत नवंबर में ही जिला निर्वाचन अधिकारी से लिखित शिकायत कर अपना मतदान केंद्र बदलने और अमावां सूफी नामक दूसरे बूथ पर मतदान की सुविधा उपलब्ध कराने की मांग शुरू कर दी थी. फिर भी उनके हाथ सहायक निर्वाचन अधिकारी का यह आश्वासन ही आया कि मामले की जांच करा ली जाएगी.अब अधिकारियों ने यह कहकर हाथ खड़े कर लिए हैं कि इन गांववासियों की मतदान केंद्र बदलने की मांग अगले परिसीमन से पहले स्वीकार नहीं की जा सकती. गांव के निवासी राम बहादुर ने इन पंक्तियों के लेखक से अपनी तकलीफ बयान करते हुए कहा, ''एक ओर मतदाता जागरूकता रैलियां निकाली जा रही हैं और मतदाताओं को कर्तव्य व जिम्मेदारी समझकर मतदान करने के हवा-हवाई आह्वान किए जा रहे हैं और दूसरी ओर हमारे प्रति इस तरह सौतेलापन बरता जा रहा है, जैसे हमारे मत का कोई महत्व ही न हो.''युवाओं में मतदान करने की ललक गांव की युवा पीढ़ी में मतदान के प्रति ललक है. जब भी चुनाव आते हैं, उनकी युवा पीढ़ी अपना मतदान केंद्र बदलने की मांग उठाने लगती है, ताकि दूसरे देशवासियों की तरह वह भी मतदान का अपना लोकतांत्रिक कर्तव्य निभा सके. लेकिन अब तक किसी भी स्तर पर उसकी कोई सुनवाई नहीं हो सकी है और उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर घुट जाती रही है.

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