kathua and unnao gang rape: What about other rape incident? | सिर्फ कठुआ या उन्नाव गैंगरेप पर ही खून क्यों खौल रहा है, देश की बाकी रेप पीड़िताओं का क्या?

कठुआ- उन्नाव गैंगरेप पर लेकर बहुत कुछ कहा जा रहा है, कोई कैंडल मार्च निकाल रहा है तो कोई अनशन कर रहा है। लेकिन इस बिमारी से छुटकारा कैसे पाया जाए इसपर कोई बहस नहीं कर रहा है? रेप जैसे जघन्य अपराध को भी आप हिन्दू-मुस्लिम से जोड़ रहे हैं? राजनीति कर रहे हैं? रेप एक ऐसा मानसिक रोग है , जिसका भुगतान वह मानसिक रोगी नहीं बल्कि एक रेप पीड़िता को करना पड़ता है। इसलिए इसको धर्म और राजनीति से जोड़ने की जगह इस बीमारी को हमें गंभीरता से से लेना चाहिए। 

जरा आप सोचिए, जम्मू कश्मीर के कठुआ में आठ साल की बच्ची के साथ गैंगरेप होता है। बच्ची को मार दिया जाता है। मरी हुई बच्ची से भी एक पुलिस वाला रेप करता है और पूरा मामला हिंदु- मुस्लिम हो जाता है। लोग रैली निकाल कर सड़क पर उतर आते हैं। हद तो यह है कि वकीलों ने चार्जशीट तक दाखिल होने में रोड़े अटकाए। वहीं, यूपी के उन्नाव में एक बीजेपी विधायक पर एक नाबालिग बच्ची के साथ रेप का आरोप लगता है। पूरा पुलिस प्रशासन मानों लगता है कि विधायक के बचाव में उतर आया है। रेप की यह दोनों घटनाएं बताती हैं कि राजनीतिक नेता और सत्ता के दबाव में प्रशासन किस तरह संवेदनहीन हो गया है। वैसे यह पहली बार नहीं है जब रेप पर राजनीति हो रही हो और इस राजनीति में हमारे देश की मीडिया भी अहम भूमिका निभा रही है।

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इसी मुद्दे पर पत्रकार सुवासित दत्त का कहना है, 'रेप जैसे ऐसे संवेदनशील मुद्दों में selective नहीं होना चाहिए। क्राइम क्राइम होता है जिसे किसी धर्म या जाति के नाम पर नहीं तौला जाना चाहिए। इस मुद्दे का मूल हल तलाशने पर काम किया जाना चाहिए ना कि मुद्दों को राजनीतिक रंग देने पर फोकस करना चाहिए। हमें आंदौलन के सेल्फीकरण से ऊपर उठ कर ऐसे मुद्दों पर गंभीर होना चाहिए और अपनी परिपक्वता दिखानी चाहिए।'

उन्होंने यह भी कहा, 'ये समझना पड़ेगा कि सिर्फ मोमबत्ती जला देने से या फेसबुक की प्रोफाइल पिक्चर बदल लेने से किसी समस्या का हल नहीं निकल सकता। हमें मिलकर राजनीति, धर्म और जाति से परे जाकर इन गंभीर मुद्दे को सरकार के सामने रखना होगा और रेप के गुनहगारों के खिलाफ मज़ूबत कानून बनाने के लिए सरकार पर दबाव डालना होगा, चाहे वह सरकार किसी की भी हो।' 

वहीं, इस मामले में पत्रकार जोयिता भट्टाचार्या का कहना है, 'भारत में रेप के केस बढ़ते ही जा रहे हैं। लोगों की मानसिकता इतनी गिर चुकी है कि वो 8 महीने के बच्चे को भी नहीं छोड़ती। ऐसे में सरकार को इसके लिए गंभीर कदम उठाने होंगे। ऐसे केस में 6 महीने में सुनवाई की जानी चाहिए।'

यहां एक बात यह भी है कि सिर्फ कठुआ या उन्नाव गैंगरेप पर लोग क्यों इतना जोर दे रहे हैं? क्या कठुआ जैसी आठ साल की बच्ची का रेप इससे पहले नहीं हुआ? इससे पहले तो छोड़िए कठुआ मामले के बाद ही गुजरात के सूरत और उत्तर प्रदेश के एटा में बच्ची के साथ रेप कर मौत के घाट उतार दिया गया। पर इन मामलों लोग चुप क्यों हैं? हालांकि इसके लिए भी सो-कॉल्ड मीडिया के पास कई सारे तर्क हैं। लेकिन जरा आम जनता इस सरल से सवाल को गंभीरता से सोचे तो आपको भी पता चलेगा कि रेप तो रेप ही होता है, चाहे वह उत्तर प्रदेश के एटा की आठ साल की बच्ची के साथ हो या फिर कठुआ की आठ साल की बच्ची के साथ हो...। दोनों  परिवारों ने अपनी बेटी खोई, दोनों परिवरों के दर्द को नापने का क्या कोई तराजू है?  यहां हम आपको यही बताना चाह रहे हैं कि रेप को सिर्फ रेप की तरह देखा जाना चाहिए और इस गंभीर बीमारी से समाज को कैसे बचाया जाए पूरा घ्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। सरकार को इतना विवश करना चाहिए कि वह रेप जैसी सजा के लिए कठोर से कठोर कानून बनाने के पर मजबूर हो जाएं। 

(लोकमत इस विचारधारा से संबंध नहीं रखता। ये लेखिका के अपने स्वतंत्र विचार हैं।)


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