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IIT जोधपुर के शोधकर्ताओं ने कोविड-19 के कई RNA वेरिएशन और उसके असर की पहचान की, जानिए इस बारे में

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: February 10, 2022 22:26 IST

कोरोना के नए-नए वेरिएंट के संभावित खतरे के बीच इससे निपटने की कोशिशें जारी हैं। वैज्ञानिक और शोधकर्ता इस काम में जुटे हैं। आईआईटी जोधपुर के नेतृत्व में एक टीम ने भी इस ओर कदम उठाते हुए एक अहम रिसर्च किया।

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नई दिल्ली: आईआईटी जोधपुर के नेतृत्व में बहु-संस्थागत टीम ने कोविड -19 वायरस के आरएनए में कई बदवाल की पहचान की है। इस टीम ने आरएनए में वेरिएशन की पहचान के लिए स्टेट-ऑफ-द-आर्ट जिनोम सिक्वेंसिंग तरीके का उपयोग किया।

आईआईटी जोधपुर में बायोसाइंस और बायोइंजीनियरिंग विभाग की प्रोफेसर और प्रमुख मिताली मुखर्जी ने इस स्टडी का सह-नेतृत्व किया। उन्होंने बताया, 'कोविड-19 महामारी पर काबू के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक वायरस की आनुवंशिक संरचना की पहचान करना और आगामी खतरे के संकेत को पकड़ना है। हमने वायरल जीनोम में फैले 16,410 iSNV साइट्स को देखा और पाया कि अहम जगहों में क्रमांतरण का उच्च घनत्व मौजूद था जो हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को तेजी से कम करने की क्षमता को प्रभावित करता है।

कोविड-19 वायरस की आरएनए संरचना अक्सर मूल कोशिकाओं ('इंट्रा-होस्ट वेरिएशन') के भीतर तेजी से मामूली बदलाव लेकर आती है। ये बदलाव न्यूक्लियोटाइड स्तर पर होते हैं। न्यूक्लियोटाइड आरएनए अणु का अहम निर्माण क्षेत्र होता है। 

इनमें से कई इंट्रा-होस्ट वेरिएशन मूल कोशिका में इम्यून रिस्पॉन्स के तौर पर मौजूद एंजाइम के कारण होते हैं। ऐसे में इनमें से ज्यादातर बदलाव या वेरिएशन हानिकारक नहीं होते हैं। कई बात तो ये वायरस के लिए मुश्किल का सबब बन जाते हैं। हालांकि वहीं कुछ वेरिएशन वायरस के बने रहने के मौके बढ़ा देते हैं और अतिरिक्त-होस्ट के तौर पर खुद को फिक्स कर लेते हैं। ऐसे में ये वेरिएशन चिंता पैदा करने वाले होते हैं।

रिसर्च करने वाली टीम ने सिक्वेंसिंग प्लेटफॉर्म ल्यूमिना (Illumina) का इस्तेमाल करते हुए इंटरा-होस्ट सिंगल न्यूक्लियोटाइड वेरिएशन (iSNV) का अध्ययन किया। साल 2020 में शोध के पहले चरण में वैज्ञानिकों ने चीन, जर्मनी, मलेशिया, यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत के विभिन्न उप-जनसंख्या से एकत्र किए गए वायरस के नमूनों की आरएनए संरचना का विश्लेषण किया ताकि वायरस की आरएनए संरचना में आईएसएनवी की पहचान जा सके।

वैज्ञानिकों ने इन इंट्रा-होस्ट वेरिएशन के एक्स्ट्रा-होस्ट वेरिएशन में निर्धारण (fixation) और म्यूटेशन का भी अध्ययन किया। iSNVs पर नजर रखने और इसे समझने से चिंता वाले वेरिएंट की भविष्यवाणी करने में आसानी होगी और उस हिसाब से उसके प्रकोप से बचाव के लिए तैयारी में भी मदद मिल सकती है। दो चरणों के अध्ययन के परिणाम न्यूक्लिक एसिड रिसर्च जर्नल में प्रकाशित किए गए हैं।

यह शोध नई दिल्ली में काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च-इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (सीएसआईआर-आईजीआईबी), में शुरू किया गया था और इसका नेतृत्व आईआईटी जोधपुर और इंस्टीट्यूट ऑफ लाइफ साइंसेज, भुवनेश्वर ने किया। 

आईआईटी जोधपुर से मुखर्जी और जीवन विज्ञान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक सुनील राघव के नेतृत्व वाली ये टीम अब iSNV आइडेंटिफिकेशन प्रोटोकॉल को भविष्य में पूरे जिनोम सिक्वेंसिंग के साथ जोड़ कर देखने की योजना पर काम कर रही है। इससे वायरल महामारी विज्ञान से संबंधित ज्यादा बेहतर और सटीक मॉ़डल मिलने की उम्मीद है। 

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