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बिहार चुनावः चिराग पासवान खुद डूबे और सीएम नीतीश सहित एनडीए को डुबा दिया, एक सीट जीते, 25 सीट पर नुकसान

By एस पी सिन्हा | Updated: November 11, 2020 00:56 IST

चिराग के दंभ को बिहार की जनता ने पानी-पानी कर दिया. चिराग पासवान की एक भी भविष्यवाणी सही साबित नहीं हुई. चिराग पासवान ने यह ऐलान किया था कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जेल भेज कर भाजपा के साथ सरकार बनायेंगे. लेकिन इस चुनाव परिणाम ने उन्हें न घर का छोड़ा और न वह घाट के रहे.

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ठळक मुद्देआगे वह क्या करेंगे उनकी अगली रणनीति क्या होगा, इसपर अब चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है.तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने में चिराग पासवान कामयाब तो नहीं हुए, लेकिन विधानसभा पहुंचने में उनकी जरूर मदद की. चुनाव में 'असंभव नीतीश' का नारा दिया था. यह उनका पहला चुनाव था.

पटनाः बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जेल भेजने का ऐलान करने वाले लोजपा सुप्रीमो चिराग पासवान अब चारों खाने चित हो गये हैं. अब आगे वह क्या करेंगे उनकी अगली रणनीति क्या होगा, इसपर अब चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है.

चिराग के दंभ को बिहार की जनता ने पानी-पानी कर दिया. चिराग पासवान की एक भी भविष्यवाणी सही साबित नहीं हुई. चिराग पासवान ने यह ऐलान किया था कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जेल भेज कर भाजपा के साथ सरकार बनायेंगे. लेकिन इस चुनाव परिणाम ने उन्हें न घर का छोड़ा और न वह घाट के रहे.

वहीं, तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने में चिराग पासवान कामयाब तो नहीं हुए, लेकिन विधानसभा पहुंचने में उनकी जरूर मदद की. उन्होंने चुनाव में 'असंभव नीतीश' का नारा दिया था. यह उनका पहला चुनाव था. बिना रामविलास पासवान के चुनावी रण में उतरे चिराग ने 'बिहार फर्स्‍ट, बिहारी फर्स्‍ट विजन डाक्यूमेंट' के बल पर नीतीश कुमार को सत्ता से बेदखल करने का हुंकार भरा था.

रामविलास पासवान के बाद चिराग का यह पहला चुनाव था और राजग से अलग होकर अकेले चुनाव लडने का उनका बडा फैसला था. भाजपा और जदयू को निर्णायक बहुमत मिलता देख चुनाव विश्लेषक भी मानने लगे हैं कि भाजपा के साथ लोजपा की सरकार बनाने का दावा करने वाले चिराग अपने पहले चुनाव में राजनीतिक फैसला लेने में चूक गए. वे जनता का मन-मिजाज को भांप नहीं पाए और केवल नीतीश कुमार का विरोध करते रहे. यह बात मतदाताओं को नागवार गुजरी और एकबार फिर भाजपा-जदयू पर भरोसा जताया.

चिराग पासवान की हठधर्मिता ने लोजपा की झोपड़ी में ही आग लग गई, क्योंकि चले थे सरकार बनाने लेकिन 2015 में भाजपा के सहयोग से जो लोजपा 2 सीटें जीती थी. लोजपा ने जदयू को दो दर्जन सीटों पर नुकसान जरूर किया है. खास बात यह है कि लोजपा को चुनाव में अच्छे प्रदर्शन की जो उम्मीद थी, वह असफलता में बदल गई.

चुनाव विश्लेषकों की अगर मानें  तो लोजपा के इस खराब प्रदर्शन के पीछे जो बड़ी जह मानी जा रही है, वह जनता के बीच 'खुद' का भरोसा न जगा पाना है. ऐसे में अब बड़ा सवाल यही है कि क्या वाकई में चिराग राजनीति के नौसिखुआ खिलाड़ी साबित हुए? इसतरह से अब सभी की निगाहें चिराग पासवान के अगले कदम पर टिक गई है.

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