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Gestational Diabetes के कारण, लक्षण, नुकसान और बचने के उपाय

By उस्मान | Updated: April 10, 2018 11:48 IST

एक अध्ययन के अनुसार, जन्म के समय जिस बच्चे की मां को जेस्टेनल डायबीटीज की शिकायत होती है, ऐसे बच्चे टाइप–2 डायबीटीज होने के खतरे भी बढ़ जाते हैं।

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डायबिटीज एक गंभीर समस्या है। भारत में यह बीमारी तेजी से बढ़ रही है। डायबिटीज किसी को भी अपनी चपेट में ले सकती है लेकिन गर्भावस्था में डायबिटीज होने का अधिक खतरा होता है। इस दौरान होने वाली डायबिटीज को जेस्टेशनल डायबिटीज यानी गर्भावस्था में होने वाली डायबिटीज कहा जाता है। इससे गर्भ में पल रहे बच्चे के विकास में बाधा आ सकती है। प्रेगनेंसी के दौरान महिला का वजन अधिक होने से भी जेस्टेशनल डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है। डॉक्टर के अनुसार, यह जरूरी नहीं है कि प्रेगनेंसी के दौरान ही डायबिटीज हो, कई बार इससे पहले ही आपको डायबिटीज हो जाती है लेकिन नियमित जांच ना कराने से आपको पता नहीं चल पाता, जिससे प्रेगनेंसी के बाद ये और अधिक बढ़ जाती है। गाजियाबाद स्थित अटलांटा हॉस्पिटल में डायबिटोलोजिस्ट डॉक्टर फतेह सिंह आपको जेस्टेशनल डायबिटीज और इसके लक्षण व नुकसान के बारे में बता रहे हैं।

जेस्टेशनल डायबिटीज का मुख्य कारण

इसका मुख्य कारण है कि प्रेगनेंसी के दौरान कई हार्मोंस जैसे प्रोजेस्टेरोन, प्लासेंटल लेक्टोजन इत्यादि निकलते हैं जोकि शरीर द्वारा निर्मित इंसुलिन के विपरीत काम करना शुरू कर देते हैं जिससे डायबिटीज के होने की आशंका बढ़ जाती है। जाहिर है डायबिटीज एक जेनेटिक समस्या भी है, ऐसे में जो महिलाएं पहली बार गर्भ धारण करती हैं उनको भी गर्भ में डायबिटीज होने का खतरा रहता है।

जेस्टेशनल डायबीटीज के लक्षण

गर्भावस्था के दौरान होने वाले जेस्टेशनल डायबीटीज के कोई विशेष लक्षण नहीं होते हैं, जिसे देखकर इस बीमारी का पता लगाया जा सके। इसे ब्लड टेस्ट द्वारा ही किया जा सकता है, हालांकि कुछ लक्षण इस बीमारी में दिखाई दे सकते है।

यह भी पढ़ें- डायबिटीज के कारण, लक्षण, बचने के उपाय और इलाज

ऐसी महिलाओं को होता है जेस्टेशनल डायबीटीज का अधिक खतरा

- जिन महिलाओं की उम्र 30 के पार हो गई हो उनमें इस बीमारी के खतरे अधिक होते है ।- जिन महिलाओं के डायबीटीज की बीमारी जेनेटिक है।- महिलाओं में मोटापा और अधिक वजन होने से भी यह खतरे बढ़ सकते हैं ।

जेस्टेशनल डायबिटीज से बचने के लिए क्या करें

- इससे बचने के लिए डायबिटीज की नियमित जांच करवाते रहें।- इस दौरान इंसुलिन या अतिरिक्त दवाओं का सेवन करने से बचना चाहिए।- प्रेगनेंसी के बाद भी डायबिटीज है या नहीं, इसका पता ब्लड टेस्ट से पता लगाया जा सकता है।- शुगर का सेवन कम करें और संतुलित डाइट लें। - डॉक्टर की सलाह पर रोजाना एक्सरसाइज करें। 

जेस्टेशनल डायबिटीज से पीड़ित महिलाओं की डाइट

- आपकी डाइट में फैट, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट संतुलित हो- डाइट में फल, सब्जियां और कार्बोहाइड्रेट जैसे (रोटी, अनाज, पास्ता, और चावल) में होना चाहिए। - चीनी वाली चीजें और शीतल पेय, फलों के रस, और पेस्ट्री से बचें।- डाइट में उच्च फाइबर, पूरे अनाज वाले कार्बोहाइड्रेट खाने चाहिए। - गहरे हरे और पीले रंग की सब्जियां जैसे पालक, ब्रोकोली, गाजर, टमाटर खाएं।- फ्रोजन या डिब्बा बंद फलों की तुलना में ताजा फलों को वरीयता दें क्योंकि उनमें अधिक पोषक तत्व बरकरार रहते हैं।- कम वसा वाला दूध या दही लें। दूध और दूध से बने उत्पाद प्रोटीन, कैल्शियम और फास्फोरस के प्रचुर स्रोत हैं।- मछली और मुर्गी की बजाए मीट को वरीयता दें। ये खाद्य पदार्थ विटामिन बी , प्रोटीन, लौह और जस्ता के प्रचुर स्रोत हैं।  - मिठाई का सेवन सीमा में करें क्योंकि इनमें वसा और शर्करा अधिक होती है।

जेस्टेशनल डायबिटीज से बच्चे को खतरा

टाइप 2 डायबीटीज

एक अध्ययन के अनुसार, जन्म के समय जिस बच्चे की मां को जेस्टेनल डायबीटीज की शिकायत थी ऐसे बच्चों को बढ़ने के साथ उनमें टाइप–2 डायबीटीज होने के खतरे भी बढ़ जाते हैं।

यह भी पढ़ें- डायबिटीज के मरीज क्या खाएं क्या नहीं खाएं

मोटापा

जिन गर्भवती मां को गर्भावस्था के समय जेस्टेनल डायबीटीज की शिकायत थी उन्हें मोटे बच्चे होने की संभावना तो रहती ही है, लेकिन संभव है कि ऐसे बच्‍चे पैदा होने के बाद और भी मोटे हो जाएं।

विकास में बाधा

जिन गर्भवती मां में जेस्टेशनल डायबीटीज की समस्याएं होती हैं, हो सकता है कि उनके पैदा होने वाले शिशु में शारीरिक संतुलन की समस्या उत्पन्न हो सकती है और इस वजह से बच्चे खड़े होने और चलने फिरने में काफी ज्यादा समय ले सकते है।

(फोटो- पिक्साबे) 

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