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स्वतंत्र भारत का पहला वाद्य यंत्र ‘मोहनवीणा’ को 78 वर्षों बाद मिला ऐतिहासिक पेटेंट

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: March 9, 2026 12:38 IST

मोहनवीणा का निर्माण वर्ष 1948 में महान सरोद वादक संगीताचार्य पंडित राधिका मोहन मैत्रा ने किया था।

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ठळक मुद्दे कानूनी मान्यता मिलने तक की 78 वर्षों लंबी यात्रा अब पूर्ण हुई है।पंडित राधिका मोहन मित्रजी ने जिस यन्त्र का निर्माण 1948 में किया था, उसका पेटेंट पंडित जॉयदीप मुख़र्जी के सहारे सम्पन्न हुआ |

कोलकाता: भारतीय शास्त्रीय संगीत और बौद्धिक संपदा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज हुई है। स्वतंत्र भारत में निर्मित पहले वाद्य यंत्र “मोहनवीणा” को वर्ष 2026 में आधिकारिक रूप से पेटेंट प्रदान किया गया है। यह पेटेंट प्रसिद्ध मल्टी-इंस्ट्रुमेंटलिस्ट पंडित जॉयदीप मुखर्जी को मिला है, जो सेनिया शाहजहांपुर घराने के प्रमुख प्रतिनिधियों में से एक हैं। इस प्रकार, मोहनवीणा की रचना से लेकर कानूनी मान्यता मिलने तक की 78 वर्षों लंबी यात्रा अब पूर्ण हुई है।

विरासत की पुनर्प्राप्ति

मोहनवीणा का निर्माण वर्ष 1948 में महान सरोद वादक संगीताचार्य पंडित राधिका मोहन मैत्रा ने किया था। इस वाद्य यंत्र को बनाने के पीछे उनका उद्देश्य सरोद की लयात्मक विविधता को वीणा और सुरसिंगार की गहरी, गूंजदार ध्वनि के साथ जोड़ना था। हालांकि आज “मोहन वीणा” नाम को कई बार एक मॉडिफाइड स्लाइड गिटार से जोड़ा जाता है,

लेकिन 1948 में बनी मूल मोहनवीणा पूरी तरह अलग और विशुद्ध भारतीय वाद्य यंत्र है। यह एक फ्रेटलेस लकड़ी का वाद्य है जिसका किसी भी पश्चिमी वाद्य यंत्र से संबंध नहीं है। इस वाद्य का नाम जून 1948 में ऑल इंडिया रेडियो के तत्कालीन चीफ प्रोड्यूसर ठाकुर जयदेव सिंह ने रखा था। उन्होंने इसे पंडित राधिका मोहन मैत्रा के मध्य नाम “मोहन” के सम्मान में “मोहन वीणा” नाम दिया।

2026 तक की लंबी यात्रा

इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखने के बावजूद, मूल और पारंपरिक मोहनवीणा को दशकों तक कोई औपचारिक पेटेंट सुरक्षा नहीं मिल पाई। पंडित जॉयदीप मुखर्जी, जो पंडित राधिका मोहन मैत्रा के ग्रैंड-डिसाइपल हैं, पिछले लगभग 20 वर्षों से अपने घराने के खोए हुए वाद्य यंत्रों को पुनर्जीवित करने के मिशन पर काम कर रहे हैं।

इस उपलब्धि पर उन्होंने कहा, “यह सिर्फ एक वाद्य यंत्र का पेटेंट नहीं है, बल्कि भारतीय संगीत की पहचान की जीत है। मोहनवीणा स्वतंत्र भारत की संगीत जगत को दी गई पहली भेंट थी। 2026 में इसका पेटेंट मिलने से अब पंडित राधिका मोहन मैत्रा की तकनीकी नवाचार और इस वाद्य की मूल संरचना आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित हो गई है।”

उन्होंने यह भी बताया कि मोहनवीणा के अलावा पंडित मैत्रा के दो अन्य वाद्य – “दिल बहार” और “नबदीपा” को भी वर्ष 2025 में पेटेंट मिल चुका है।

तकनीकी विशेषताएं

पेटेंट प्राप्त मोहनवीणा की बनावट बेहद खास है। इसमें सरोद में इस्तेमाल होने वाली पारंपरिक बकरी की खाल की जगह लकड़ी का टॉप लगाया गया है, जबकि इसका ब्रिज सुरबहार से प्रेरित है। इस अनोखी संरचना के कारण इसमें ध्वनि की गहराई और स्थायित्व अधिक मिलता है, जिससे “बीन-बाज” शैली की गूंज उत्पन्न होती है, जो सामान्य सरोद में संभव नहीं थी।

आज जब भारतीय पारंपरिक शिल्प और विरासत को फिर से पहचान मिल रही है, ऐसे समय में मोहनवीणा का यह पेटेंट एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इसके साथ ही यह वाद्य अब उन दुर्लभ भारतीय वाद्यों की सूची में शामिल हो गया है, जिन्हें पंडित जॉयदीप मुखर्जी ने पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है — जिनमें सेनी रबाब, सुरसिंगार और सुर-रबाब जैसे ऐतिहासिक वाद्य भी शामिल हैं।

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