क्या ताइवान को हड़प जाएगा चीन ?

By विजय दर्डा | Updated: January 12, 2026 06:24 IST2026-01-12T06:24:12+5:302026-01-12T06:24:12+5:30

चीन के पास हड़पने का पुराना नुस्खा है. 1950-51 में उसने तिब्बत को हड़प लिया और दुनिया बस जुबानी जमा खर्च ही करती रही. और जहां तक ताइवान का सवाल है तो उसे अपने में समेट लेने की धमकी शी जिनपिंग हमेशा देते रहे हैं. 

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क्या ताइवान को हड़प जाएगा चीन ?

दुनिया में अभी जो हालात बने हुए हैं, उसमें हर किसी के मन में एक गंभीर सवाल तैर रहा है कि क्या चीन जल्दी ही ताइवान को हड़प लेगा और दुनिया देखती रह जाएगी? या फिर ताइवान को बचाने के लिए अमेरिका मैदान में कूदेगा? यदि ऐसा हुआ तो चीन की चाल क्या होगी? और सबसे बड़ा सवाल कि भारत पर इसका क्या असर होगा?

इस वक्त इस सवाल के गंभीर हो जाने का कारण यह है कि रूस ने यूक्रेन पर हमला कर रखा है और उसके सात हजार वर्ग किलोमीटर से ज्यादा इलाके पर कब्जा कर लिया है. अमेरिका जंग समाप्त कराने की जो कोशिश कर रहा है, उसमें कब्जे वाला इलाका रूस के पास ही रहने की बात हो रही है. 

इधर अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति को पकड़ लिया और स्पष्ट है कि वेनेजुएला पर अमेरिकी कब्जा हो चुका है. ऐसे में चीन के पास ताइवान को हड़पने का सुनहरा मौका है. चीन के पास हड़पने का पुराना नुस्खा है. 1950-51 में उसने तिब्बत को हड़प लिया और दुनिया बस जुबानी जमा खर्च ही करती रही. और जहां तक ताइवान का सवाल है तो उसे अपने में समेट लेने की धमकी शी जिनपिंग हमेशा देते रहे हैं. 

उन्होंने अपनी सेना को तैयार रहने को भी कहा है. हर साल चीन इस तरह का सैन्य अभ्यास भी करता है कि बस अब उस पर कब्जा करने ही वाला है. चीनी विमानों का ताइवान के आकाश में उड़ान भरना अब कोई नई बात नहीं रह गई है. चीन की चाहत है कि ताइवान उसके एक विमान को भी निशाना बनाए तो फिर हमले का बहाना मिल जाए. मगर ताइवान ने संयम बनाए रखा है. समझ लीजिए कि मामला बस यहीं रुका है!

आप में से बहुतों के मन में यह सवाल जरूर उठता होगा कि ताइवान को चीन आखिर क्यों हड़पना चाहता है? इसका जवाब पाने के लिए इतिहास में पीछे लौटना होगा. जापान ने 1931 में चीन पर कब्जा करना शुरू किया और 1945 तक चीन के बड़े हिस्से पर उसका कब्जा था. जापान के दो शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर अमेरिका ने बम गिराए तो दूसरा विश्वयुद्ध समाप्त हो गया. 

इसके साथ ही चीन आजाद हो गया. देश का नाम पड़ा रिपब्लिक ऑफ चाइना. मगर दो पार्टियों में सत्ता की लड़ाई शुरू हो गई.  सबसे पुरानी नेशनलिस्ट पार्टी कुओमिन्तांग थी. उसके नेता थे च्यांग काई-शेक. दूसरी थी कम्युनिस्ट पार्टी जिसके नेता थे माओ-त्से तुंग. दोनों के बीच जबर्दस्त लड़ाई हुई. 

माओ भारी पड़े और च्यांग काई-शेक ने भाग कर चीन के समुद्री इलाके में शरण ली जिसे उन्होंने आजाद घोषित किया और देश का नाम रखा रिपब्लिक ऑफ चाइना जिसे आम-फहम भाषा में ताइवान कहा गया. इधर माओ-त्से तुंग ने अपने नियंत्रण वाले देश का नाम रखा पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना. 

माओ चाह कर भी ताइवान पर कब्जा करने की स्थिति में नहीं थे क्योंकि चारों तरफ से समुद्र से घिरे ताइवान पर कब्जा करने के साधन उस समय उनके पास नहीं थे. कुछ छिटपुट लड़ाइयां हुईं लेकिन चीन को सफलता नहीं मिली.

वक्त ने करवट तब ली जब 1979 में चीन और अमेरिका के बीच व्यापार समझौता हुआ. अमेरिका को एक बड़े बाजार की जरूरत थी और चीन के तत्कालीन राष्ट्रपति देंग शिआयोपिंग ने अमेरिका को इस बात के लिए राजी कर लिया कि वह केवल पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को ही असली चीन माने. 

अमेरिका मान गया और तत्कालीन राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने रिपब्लिक ऑफ चाइना अर्थात ताइवान में अमेरिकी दूतावास बंद कर दिया. देंग शियाओपिंग ने तत्काल ताइवान को धमकी दी कि वो चीन में समा जाए. मगर यह हिम्मत नहीं हुई कि ताइवान पर हमला कर सकें. बाद में दोनों देशों के बीच विभिन्न स्तरों पर बातचीत होती रही और सच यही है कि तल्खी भी बढ़ती चली गई. 

आज तो पूरा ताइवान ही चीन के खिलाफ है. चीन हमले की कोशिश करेगा तो उसे भारी प्रतिरोध का सामना करना होगा. भीषण खून-खराबा होगा! वैसे चीन में शी जिनपिंग ने सत्ता में आने के बाद ही अपना इरादा स्पष्ट कर दिया कि वे ताइवान को चीन में मिला कर ही मानेंगे. यह उनके लिए इज्जत का सवाल बन चुका है. यदि वे ताइवान फतह कर लेते हैं तो चीन के वे सर्वकालिक सर्वशक्तिमान नेता बन जाएंगे.

वैसे दोनों देशों की सैन्य शक्ति में जमीन-आसमान का अंतर है. लेकिन ताइवान को भरोसा है कि अमेरिका उसका साथ देगा. अमेरिकी थिंक टैंक द्वारा अभी-अभी किए गए एक अध्ययन में कहा भी गया है कि चीन हमला करता है तो उसके लिए जीतना आसान नहीं होगा. उसके एक लाख सैनिक मारे जा सकते हैं. 

ताइवान के पचास हजार सैनिकों के साथ पचास हजार नागरिक तथा अमेरिका के पांच हजार सैनिक हताहत हो सकते हैं. रिपोर्ट का यह भी दावा है कि अंतत: चीन को पीछे हटना पड़ेगा. अध्ययन में अमेरिकी सैनिकों के जिक्र का क्या मतलब है? मतलब साफ है कि ताइवान का साथ देने के लिए अमेरिका तैयार है. 

इस बात को चीन समझ रहा है और यही कारण है कि वह ताइवान पर हमला नहीं कर पा रहा है. मगर वह रह-रह कर धमकी जरूर दे रहा है. यदि ये जंग हुई तो किसी के लिए भी अच्छा नहीं होगा. हम भी कहीं न कहीं जरूर प्रभावित होंगे. दुनिया के सारे देशों को समझना होगा कि जंग किसी समस्या का समाधान कभी नहीं हो सकता. लेकिन सिरफिरे नेताओं को कौन समझाए?
 

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